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मेरी पहली उच्च साधना….6

प्रणाम मै शिवांशु

मेरी नासमझी के कारण शिवगुरु से सवालों के जवाब पाने की सिद्धी शांत हो गई. गुरुदेव को बताया तो उन्होंने उच्च साधना का आदेश दिया. ताकि ब्रह्मांड से सवालों के जबाव प्राप्त हो सकें. जिसकी तैयारी एक माह चलनी थी. उस दौरान मौन व्रत रखा जाना था. साथ ही 27 दिन भोजन नही करना था. सिर्फ दूध और बादाम खाकर ही काम चलाना था. उच्च साधना बिना मंत्र के आंतरिक शरीर विज्ञान की तकनीक को लेकर की जानी थी. जिसके तहत गुरुदेव ने मानव तंत्रिका तंत्र से जुड़े दो चार्ट दिये. जिन्हें अच्छी तरह याद कर लेना था।

अब आगे…

मैने दोनों चार्ट याद कर लिये. नौ दिन लगे. फिर आगे का अभ्यास शुरू हुआ.

आगे की साधना पद्धति बताने से पहले मै आप सभी को सावधान करना चाहुंगा. पढ़ने में सरल लगने के बावजूद बिना उपयुक्त मार्गदर्शन के आप में से कोई भी खुद इस साधना को न करें. इससे मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाला एक संवेदनशील तत्व असंतुलित हो सकता है. मेडिकल की भाषा में इसे सेरोटोनिन हार्मोन कहा जाता है. इसके असंतुलन से मानसिक संतुलन बिगड़ता है. जिसके परिणाम स्वरूप लोग डिप्रेशन या पागलपन के शिकार हो जाते हैं. और बेतुकी गतिविधियां करने लगते हैं.

यही कारण है कि तमाम लोग जिनकी उच्च साधनायें बिगड़ी वे मानसिक रूप से असंतुलित हो जाते हैं. और जीवन भर इधर उधर भटकते रहते हैं। यदि उन्हें मनोचिकित्सक के पास ले जाया जाये तो, वहां  वे मनोरोगी घोषित कर दिये जाएंगे.

इसी कारण गुरुदेव हमेशा सक्षम मार्गदर्शन में संतुलित साधना आराधना करने की बात कहते हैं.  

अगर आप में से कोई इस साधना को करना चाहें. तो पहले गुरुवर से आकर मिलें. य़दि आपकी पात्रता हुई तो गुरुवर आपको साधना करा देंगे.

आगे के अभ्यास के तहत मुझे अपनी नाक पर सबसे आगे सफेद रंग का एक निशान लगाकर उसे देखना था. निशान हर दो दिन के अंतराल में छोटा होता जाना था. और एक दिन उसका आकार पेन प्वाइंट सेभी छोटा हो जाना था. सुनने में आसान लगने के बाद भी ये अभ्यास काफी कठिन साबित हुआ.

सफेद निशान को खुली आंखों से अपलक देखना होता था. जो कि त्राटक की एक क्रिया है. इससे पहले गुरुवर ने मुझे कई तरह का त्रटक करा रखा था. सो आंखें तो सेट थीं मगर अपनी ही नाक के ऊपर निशान देखने के दौरान शुरुआत में बहुत ही असुविधाजनक लगा.

आंखें और भौंहे भारी खिंचाव और दबाव के शिकार हो जाते थे. कई बार माथे और सिर में  भायानक दर्द का अनुभव होता. जिसके कारण दिन में कई बार अपना संजीवनी उपचार करना पड़ता था.

कुछ समय बाद दूसरी तरह की समस्या सामने आई. जैसे ही अभ्यास शुरू करता. कुछ ही देर बाद निशान तो क्या नाक भी दिखनी बंद हो जाी थी. उसकी जगह सफेद रोशनी दिखती थी. ये त्राटक क्रिया की सामान्य प्रतिक्रिया है.

जहां आप अपलक और एकटक ध्यान लगाकर देखते हैं वहां संजीवनी शक्ति आकर्षित होकर इकट्ठा होने लगती है. धीरे धीर उसका एकत्रीकरण इतना ज्यादा होता है कि वहां की वस्तुवें दिखनी बंद हो जाती हैं, उनकी जगह सिर्फ प्रकाश दिखता है. यही कारण हैं कि त्राटक करने वालों को लक्ष्य पर रंग बिरंगी रोशनी का जमावड़ा नजर आता है. कई बार ये प्रकाश विभिन्न आकारों में दिखता है. कुछ लोगों को त्राटक के दौरान देवी देवताओं के प्रतिरूप दिखते हैं. जिसे वे दर्शन होने की संज्ञा देते हैं.

मुझे संजीवनी इकच्ठा होने की इस भूलभुलइया से बाहर निकलकर अभ्यास आगे बढ़ाना  था. एक हफ्ता लगा इस क्रिया के सामान्य होने में. अब मै नाक के आखिरी सिरे पर लगे सफेद बिंदु को ठीक से देख पा रहा था. धीरे धीरे सफेद बिंदु को छोटा करते जाना था. इतना छोटा कि सामान्य आंखों से दिखे ही न. अभ्यास जारी रहा.

आगे के अभ्यास में सांस के लिये नाक की तरफ आने वाली आक्सीजन के कण देखने थे.

क्यों, ये मै आपको आगे बताउंगा.

तब तक की राम राम