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हिमालयन रहस्यः टाइम ट्रेवलिंग साधना-4

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शिवप्रिया भी समय यात्रा के लिये वार्म होल का उपयोग करती हैं

हम इन दिनों टाइम ट्रेवलिंग साधना की तरफ बढ़ रहे हैं। उसके लिये समय यात्रा की बारीकियों से परिचित हो रहे हैं। पहले हमने जाना कि आधुनिक विज्ञान ब्लैक होल और वार्म होल के जरिये समय यात्रा की सम्भावनाओं पर काम कर रहा है। सक्षम साधक समय यात्रा के लिये युगों से वार्म होल के रास्तों का उपयोग कर रहे हैं। इन दिनों गहन साधना कर रही शिवप्रिया भी वार्म होल के रास्ते अदृष्य मार्गदर्शकों के साथ ऋषियों तक पहुंचती हैं। इसके लिये उनकी सूक्ष्म चेतना चंदन की सुगंध को अपने माध्यम के रूप में अपनाती है। यहां माध्यम का मतलब है सवारी। जैसे कोई प्लेन या अंतरीक्षयान।

कल की पोस्ट पढ़कर आज कई साधकों ने वार्म होल के रास्ते समय यात्रा के बारे में अधिक विस्तार से बताने का आग्रह किया। साथ ही इसके उदाहरण जानने चाहे। उदाहरण के रूप में हम शिवप्रिया की गहन साधना पर चर्चा करेंगे। क्योकि आप में से अधिकांश लोगों ने उनकी गहन साधना का वृतांत पढ़ा है। इसलिये यह उदाहरण अधिक सटीक और समझ में आने वाला होगा।
पहले आपने जाना कि गहन साधना के दौरान शिवप्रिया की सूक्ष्म चेतना उच्च आयामों में चली जाती है। वहां कई ऋषियों के सम्पर्क में अध्यात्म विज्ञान की बारीकियों को सीखती हैं। जिसमें अथर्व वेद प्रमुख है।
शिवप्रिया का सम्पर्क ऋषियों से होता है यह प्रमाणित करते हुए आगे बढ़ें तो अधिक उपयुक्त होगा। पिछले साल ही शिवप्रिया ने मनोविज्ञान की उच्च शिक्षा पूरी की। अब वे भारत सरकार की संस्था और ब्रिटिश की संस्था से मनोरोगियों के इलाज के लिये अधिकृत हैं। दुनिया भर में कहीं भी साइकोलाजिस्ट के रूप में वे मनोरोगियों को उपचारित कर सकती हैं। एकाडमिक शिक्षा पूरी करने के बाद मुम्बई के एक अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ के पद पर नियुक्त हुईं। वहां मानसिक रूप से कमजोर बच्चों का उपचार करने की जिम्मेदारी मिले। इस बीच उन्हें कभी वेद, पुराण, ऋषियों मुनियों, आयुर्वेद, योग के बारे में जानने समझने का समय नही मिला और न ही उन्हें इसकी जरूरत पड़ी।
पिछले 8 साल से वे मेरे द्वारा बताई एक शिव साधना करती आ रही थीं। जिसके लिये पढ़ाई के बीच हर दिन 2 से 4 घंटे का समय नियमित निकालती थीं। उन्होंने शिव शिष्यता धारण की है।
फरवरी 2020 के पहले हफ्ते में उन्हें शिवगुरू की तरफ से अपनी इस साधना को गहन करने का निर्देश मिला। 15 फरवरी 20 से उन्होंने गहन साधना आरम्भ की। जिसमें अदृश्य मार्गदर्शकों का साथ मिला। उनके साथ वे ऋषि वशिष्ठ, ऋषि दधीचि, ऋषि अथर्वा, ऋषि वामदेव, ऋषि परासर सहित कई अन्य ऋषियों की सूक्ष्म चेतना के सम्पर्क में आईं।
उसी बीच कोरोना भारत पहुंचा। शिवप्रिया का 19 मार्च की गहन साधना में ऋषि दधीचि से सम्पर्क हुआ। उन्होंने ऋषि से कोरोना बीमारी का इलाज बताने का आग्रह किया। ऋषि ने उन्हें इसके लिये नीम, सफेद स्वेत (एक तरह की तुलसी), अश्वगंधा, कपूर तेल से इस बीमारी का इलाज करने की जानकारी दी। शिवप्रिया ने इससे पहले अश्वगंधा, स्वेत सेज का नाम नही सुना था। उन्हें नही पता था कि ये क्या चीज हैं। उन्हें आयुर्वेद का कोई ज्ञान नही था।
औरिक उपचार के तहत कोरोना बचाव के लिये उन्होंने 20 मार्च को एक वीडियो जारी करके उक्त चारों चीजों की उर्जाओं से सुरक्षा कवच बनाने की विधि बताई। जिसका साधकों ने लाभ उठाया।
आज दिल्ली आई.आई.टी. के वैज्ञानिक और एक जपानी संस्था के वैज्ञानिक कोरोना उपचार के लिये अश्वगंधा पर काम कर रहे हैं। उन्होंने अब पता लगाया है कि इससे कोरोना का इलाज सम्भव है।
अश्वगंधा और स्वेत सेज के नाम तक से अनभिज्ञ शिवप्रिया ने विश्व में सबसे पहले कोरोना के लिये अश्वगंधा के उपयोग की जानकारी दी। जो उन्हें ऋषि द्वारा सूक्ष्म रूप से बताई गई। यह प्रमाण है कि उनका सम्पर्क ऋषियों से हो रहा है। इस तरह के कई और प्रमाण हैं। जिन पर हम कभी और बात करेंगे।
अभी हम यह जानते हैं कि शिवप्रिया ऋषियों तक पहुंचती कैसे हैं।
इसके लिये उनकी सूक्ष्म चेतना वार्म होल का उपयोग करती है। उन्होंने चंदन की सुगंध को वार्म होल में प्रवेश का माध्यम बनाया है। ठीक उसी तरह जैसे सामान्य लोग प्लेन या वैज्ञानिक अंतरीक्षयान को दूरी तय करने के लिये अपना माध्यम बनाते हैं। इसकी राह उन्हें उनके अदृश्य मार्गदर्शक ने बताई।
नये पाठकों के लिये बताते चले कि वार्म होल क्या होते हैं। सन् 1935 में विख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन तथा नाथन रोजन ने मिलकर एक खोज की। उन्होंने सापेक्षता के सिद्धांत के आधार पर गणितीय रूप में ये सिद्ध किया कि ब्रह्माण्ड में उपस्थित किन्ही दो बिंदुओं के बीच शार्ट कट रास्ता होता है। जो स्पेस और टाइम दोनों को कम कर देता है। इस शॉर्ट कट रास्ते को ही वार्म होल कहते हैं।
अंतरीक्ष तीन आयामों से मिलकर बना होता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इसके अलावा एक और आयाम होता है। वह चौथा आयाम है समय यानि टाइम। स्पेस के तीनों आयामों में आंखों से न दिखने वाले सूक्ष्म छेद होते हैं। इन्ही तीनों आयामों की तरह चौथे आयाम समय में भी छेद होते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि इन छेदों के रास्ते वार्म होल में प्रवेश करके टाइम ट्रेवलिंग की जा सकती है।
वैज्ञानिकों के लिये सूक्ष्म छिद्रों में घुसना चुनौती है किंतु अध्यात्म विज्ञान इनका उपयोग युगों से कर रहा है। इसके लिये साधक अपने सूक्ष्म शरीर का उपयोग करते हैं। वे स्थुल शरीर यहीं छोड़कर वार्म होल के रास्ते दूसरी दुनिया, दुसरे आयामों में या भूत-भविष्य में चले जाते हैं। वहां की जानकारियां, ज्ञान ले आते हैं।
इसके लिये समय के सूक्ष्म छिद्र और वार्म होल कहां हैं यह जानना जरूरी होती। तभी उन तक पहुंचकर उपयोग किया जा सकता है। इनका पता लगाना विज्ञान के लिये अभी असम्भव जैसा काम है।
किंतु इस मामले में अध्यात्म विज्ञान अत्यंत समृद्ध है। अध्यात्ममिक विद्वानों ने अपने उपयोग के वार्म होल हो आकर्षित करके अपने पास ले आने का रास्ता निकाल लिया। इसे एेसे समझे कि मोबाइल पर किसी से वीडियो सम्पर्क करना है। इसके दो रास्ते हैं। एक तो हम चलकर मोबाइल तक जायें, दूसरा मोबाइल को अपने पास ले आयें।
सक्षम साधक दूसरे रास्ते का उपयोग करते हैं। वे वार्म होल को अपने पास बुला लेते हैं। इसके लिये मंत्र शक्ति का उपयोग करते हैं। जिस आयाम में जाना होता है उससे सम्बंधित मंत्र का निर्धारित विधि से प्रयोग करते हैं। (बताते चले कि अध्यात्म में उच्च आयामों को देवी देवता के नाम से परिभाषित किया जाता है)। मंत्र शक्ति अपने आयाम तक जाने वाले समधर्मी (समान पृक्रति के) वार्म होल को आकर्षित करके साधक तक लाती है। साधक उसमें प्रवेश करके समय यात्रा करते हैं। सूक्ष्म शरीर से वार्म होल में प्रवेश करने के लिये साधक किसी तरह के माध्यम का उपयोग करते हैं। जैसे दीपक की लौ, किसी तरह की सुगंध, किसी पुष्प की उर्जा, किसी सिद्ध मूर्ति की उर्जा, कलश में स्थापित पानी, सामने स्थापित यंत्र, चावलों की ढेरी, भोग-प्रसाद सामग्री आदि।
अब हम शिवप्रिया पर वापस लौटते हैं। अपनी गहन साधना के दौरान वे चंदन की सुगंध का उपयोग करती हैं। सुगंध के माध्यम से उनका सूक्ष्म शरीर वार्म होल में प्रवेश करता है। फिर शुरू हो जाती है समय यात्रा।
कई साधकों ने जानना चाहा है कि समय यात्रा के आरम्भ होने का पता कैसे चलता है।
जब किसी साधक की सूक्ष्म चेतना एक आयाम से दूसरे आयाम में जाती है तो बंद आंखों के सामने एकदम से तेज रोशनी प्रतीत होती है। फिर मामूली या तेज झटके की अनुभूति होती है। जैसे किसी गाड़ी का गेयर बदला गया हो। फिर कुछ क्षण घुप अंधेरा महसूस होता है। मन मस्तिष्क सुन्न हो जाता है। कुछ याद नही रहता। यही वह समय होता है जब सूक्ष्म चेतना एक से दूसरे आयाम के रास्ते में होती है। कुछ क्षणों, कुछ मिनटों, कुछ घंटों बाद चेतना दूसरे आयाम में पहुंच जाती है। तब सब कुछ क्लीयर दिखने लगता है, सुनने लगता है। वहां के लोगों से सम्पर्क स्थापित हो जाता है। बातचीत शुरू हो जाती है। जानकारी का आदान प्रदान शुरू हो जाता है। सूक्ष्म चेतना वहां के सारे काम करने की स्थिति में होती है। किंतु किसी घटना को रोक नही सकती। क्योंकि घटनाओं का कंट्रोल कहीं और से होता है। वे पहले से सुनिश्चित होती हैं। उन्हें भूत या भविष्य में जाकर बदला नही जा सकता। हां जानकारियों या ज्ञान का उपयोग करके होने वाली घटनाओं के प्रभाव को बदला जा सकता है।
अदृश्य मार्गदर्शक शिवप्रिया को अब प्रकाश का उपयोग करके समय यात्रा की तकनीकी की तरफ ले जा रहे हैं। सक्षम साधक सूर्य की किरणों के सहारे समय यात्रा कर लेते हैं। इस पर हम आगे चर्चा करेंगे।
क्रमशः।
शिव शरणं।।