जीवन की चौथी दुनियाः 28

बैकुंठः जहां कल्पवृक्ष लोगों से बातें करते हैं

बैकुंठ पहुंचते ही भगवान विष्णु की तरह तुम्हारे चार हाथ हो जाएंगे। अप्सरायें पीताम्बरी पहनाकर तुम्हारा श्रंगार करेंगी। रास्ते में इंद्र आएंगे। सम्मान में अपना मुकुट उतार कर तुम्हें अभिवादन करेंगे। ब्रह्मा आएंगे। शुभकामनायें देंगे। देखोगी वहां अधिकांश पेड़ कल्पवृक्ष हैं। वे बोल रहे हैं। राम राम कहकर तुम्हारा स्वागत कर रहे हैं। पूरी करने के लिये कोई कामना हो तो बतायें। वे ऐसा पूछेंगे। नदियां भी बोलती मिलेंगी। उनमें पानी के साथ विष्णु नाम की धारायें बह रही हैं। हवायें गुनगुनाती मिलेंगी। उनमें वेद मंत्र और देव संगीत की लहरें होंगी। वन-उपवन से निकलती देव सुगंध हर तरफ सम्मोहन पैदा कर रही होगी। विष्णु से पहले मां रूप में लक्ष्मी माता मिलेंगी। तुम उनकी ममता में डूब जाओगी।

चार हाथों वाले लोग अपने निजी सोने के विमानों से यहां वहां आते जाते दिखेंगे। वे सब विष्णु जैसे दिखेंगे। फर्क सिर्फ कौश्तिक मणि का होगा। सिर्फ भगवान विष्णु के गले में कौश्तिक मणि होगी। इसके साथ ही भगवान विष्णु की छाती पर मृगु चरण की छाप होगी। बाकी लोगों के नही होगी। इसके अलावा दिखने में लोगों में और भगवान विष्णु में कोई अंतर नही दिखेगा। बैकुंठ पहुंचते ही सब विष्णु जैसे हो जाते हैं। उन्हें सब तरह के वैभव और सुविधायें मिल जाती हैं।

देखोंगी वहां भगवान और भक्त में कोई भेद नही करता। वहां लोग मरते नही हैं। बैकुंठ में कोई बूढ़ा नही होता। कोई बीमार नही होता। कोई अपाहिज नही होता। कोई कमजोर नही होता। सभी लोग 16 साल के किशोर युवा जैसे दिखते हैं। युगों तक वैसे ही रहते हैं। भगवान विष्णु की तरह उनकी उम्र भी लम्बी हो जाती है। संसार में लाखों स्रष्टि और प्रलय हो जाने के बाद भी वे जिंदा रहते हैं। इसी कारण इंद्र, ब्रह्मा सहित अनेकों देवी देवता उनसे मिलने आते हैं। उन्हें बैकुंठ वासी बनने की शुभकामनायें देते हैं।

बैकुंठ के रास्ते में देखोगी इंद्र ऐरावत हाथी पर सवार होकर आएंगे। अपना मुकुट उतार कर सम्मान जताएंगे। कहेंगे बैकुंठ वासी हो जाने के नाते आप हमसे बहुत बड़े हो गये हैं। हमें बार बार जीवन- मरण के चक्र में पड़ना होगा। बार बार जन्म लेना होगा। बार बार मरना होगा। किन्तु आप इन सबसे मुक्त हो गये हैं। आपको अनेकों शुभकामनायें।

इसी तरह ब्रह्मलोक में ब्रह्मा आएंगे। तुम्हारा अभिवादन करेंगे। बैकुंठ वासी होने की शुभकामनायें देंगे। कहेंगे अब आप आवागमन से मुक्त हैं। मेरी बनाई स्रष्टि अनेकों बार प्रलय का शिकार होगी। साथ ही मै भी बनुंगा, मिटुंगा। किंन्तु आप ऐसे ही रहेंगे। भगवान विष्णु द्वारा सौंपी जिम्मेदारियों को निभाते रहेंगे। इसी तरह प्रजापित सहित अनेकों देवता अपने अपने लोक में आएंगे। तुम्हें अहसास कराएंगे कि अब तुम देवताओं से भी बड़े पद पर पहुंच गयी हो। वे तुम्हारी भक्ति का गुणगान करें। क्योंकि यह सब भक्ति की उर्जाओं से ही सम्भव होगा। बैकुंठ वास का अधिकार देवताओं को भी तरह सम्भव नही।

आज मै अपनी पत्नी प्रीति की सूक्ष्म चेतना को बैकुंठ धाम और बैकुंठ वासियों के बारे में बता रहा था। भगवान शिव की शिष्या, मृत्युंजय योग के साधकों की गुरू मां और मेरी पत्नी। वे पितृ लोक पार कर अभी देवताओं की दुनिया में हैं। हमारा सूक्ष्म सम्पर्क बना है। उन्होंने इसी सावन शिव धाम जाने की तैयारी की है। इसके लिये भक्ति मार्ग चुना है। शिव धाम जाने के 12 चरणों के अनुष्ठान अभ्यास पूरे कर लिये हैं।
आज मैने उनके द्वारा सम्पन्न सभी साधना अभ्यास का परीक्षण किया। सब ठीक मिला। अब मंत्र जप के अलावा उनके पास कोई काम नही। सो फुर्सत में मेरे पास आ गईं। बोली कुछ अलौकिक बताइये। जिसे जानकर मन शांत हो। भावनाओं में उमंग उठे। उत्साह बढ़े।

बहुत जरूरी है कि शिव धाम यात्रा तक वे शांत रहें। मन में उत्साह, उमंग, उत्सव बना रहे। ताकि पहले ही प्रयास में वे वहां पहुंच सकें। मैने प्रीति से कहा चलो आज मै तुम्हें बैकुंठ की यात्रा पर ले चलता हूं। बहुत अच्छे से समझने के लिये खुद को बैकुंठ से इन्वाल्व कर लो। सोचो तुम भगवान विष्णु की वो भक्त हो जिसे बैकुंठ जाने का अधिकार मिला है। सबसे पहले तो मै तुम्हें बता दूं बैकुंठ सिर्फ सच्चे विष्णु भक्तों के लिये ही है। अन्य लोगों की वहां इंट्री नही है। दूसरे बैकुंठ वास का अवसर देवताओं को भी नही मिलता।

यह कोई काल्पनिक कथा नही। ब्रह्मांड की अकाट्य सच्चाई है। बस विज्ञान इसे प्रूफ नही कर पाता। क्योंकि जब ब्रह्मांड बना तब विज्ञान था ही नही। सो ब्रह्मांडीय मामले में विज्ञान के पास जानकारी का बड़ा अभाव है।

भगवान विष्णु मृत्यु के समय से ही अपने भक्त पर नजर रखते हैं। एक तरफ जहां लोगों के प्राण लेने यमपाश लिये यमराज आते हैं। वहीं भगवान विष्णु अपने भक्त के लिये सुदर्शन चक्र भेजते हैं। जहां दूसरे लोगों को मृत्यु के भय और पीड़ा से गुजरना पड़ता है। वहीं विष्णु भक्त मृत्यु को जेल बंधन से छुटने वाले उत्सव की तरह मनाते हैं। वे उत्कांति से नही डरते।

उत्क्रांति क्या होती है? प्रीति ने सवाल पूछा।

उत्क्रांति का मतलब है प्राणों का सिकुड़ना। मैने बताया। मृत्यु से पहले मृत्यु के अहसास का सामना करना पड़ता है। तुमने तो खुद ही मरने से पहले ऐसा महसूस किया होगा। मृत्यु का अहसास भय पैदा करता है। पीड़ा पैदा करता है। संघर्ष पैदा करता है। संघर्ष इंद्रियों को शिथिल कर देता है। तब व्यक्ति मृत्यु के सामने समर्पण कर देता है। मौन हो जाता है। उसकी वाणी मन में विलीन हो जाती है। मन प्राणों में विलीन हो जाता है। प्राण जीवात्मा में विलीन हो जाते हैं। अनाहत चक्र में ईश्वर हैं। यह जानकर जीवात्मा हृदय की तरफ चल पड़ती है। जो सदाचारी, मोह रहित या सच्चे भक्त होते हैं। उनकी जीवात्मा गुरुत्वाकर्षण यानी मोह माया के विपरीत ऊपर की तरफ बढ़ जाती है। हृदय में ईश्वरीय शक्ति से मिलकर शुषुम्ना नाड़ी के द्वारा सहस्रार की तरफ चल पड़ती है। जो मृत्यु से डरे हुए, मोह-माया में लिपटे हुए, संसारिक विषयों में भटके हुए होते हैं उनकी जीवात्मा ऊपर नही चढ़ पाती। वह गुरुत्वाकर्षण की दिशा में लुढ़क कर नीचे के किसी अंग द्वार से शरीर छोड़ देती है।

सदाचारी, मोह माया से मुक्त या भक्त मृत्यु से नही डरते। उनकी जीवात्मा ऊपर बढ़ती हुई सहस्रार या ऊपर के किसी अंग मार्ग से बाहर निकलती है। सूक्ष्म शरीर के रूप में सदोगति की तरफ चली जाती है। शास्त्र बताते हैं जीवात्मा को सूक्ष्म शरीर का सहारा चाहिये। उसी के द्वारा आगे की यात्रा पूरी करती है। सूक्ष्म शरीर में पाप, पुण्य सब संचित रहते हैं। उन्हीं के मुताबिक कर्मों का हिसाब होता है। किन्तु सच्चे शिव भक्तों की तरह सच्चे विष्णु भक्तों को भी कर्म फल भुगतने की मजबूरी से नही गुजरना पड़ा। मैने बताया। प्रीति बातों को ध्यान लगाकर सुन और समझ रही थीं।

इसके लिये मृत्यु के बाद यमराज वाली व्यवस्था सक्रिय होने से पहले ही भगवान विष्णु अपने भक्त को सुदर्शन चक्र के माध्यम से बैकुंठ की तरफ बुलाते हैं। मैने प्रीति को बताया। बैकुंठ धाम स्वर्ग से भी ऊपर के डाइमेंशन में है। इसे भगवान विष्णु का परम धाम कहा जाता है। यहां पहुंचकर आत्मा आवागमन से मुक्त हो जाती है। क्योंकि बैकुंठ में स्थित विरजा नदी जीवात्मा के सभी प्रारब्ध धो कर खत्म कर देती है। जब प्रारब्ध या संचित कर्म ही नही बचे तो बार बार जन्म लेने की क्या जरूरत ही खत्म हो जाती है। बैकुंठ यानी बिना कुंठा। वहां किसी का मन कभी खराब नही होता। जीवात्मा की सारी यादें मिट चुकी होती हैं। सारे कर्म मिट चुके होते हैं। सारे दुख मिट चुके होते हैं। सारी चिंतायें मिट चुकी होती हैं।

बड़े सौभाग्य वालों को बैकुंठ वास मिलता है। मैने बताया। शरीर छोड़ कर सुदर्शन चक्र के साथ चली भक्त की जीवात्मा का अर्चिरादि मार्ग में देव परिवार जगह जगह स्वागत है। वहां अधिवाहिक देवता जीवात्मा को अपने हाथ में ले लेते हैं। और हाथों हाथ एक लोक से दूसरे लोक में पहुंचाते हैं।

अर्चिरादि मार्ग क्या है और अधिवाहिक देवता कौन होते हैं? प्रीति ने पूछा।

शरीर से निकल कर बैकुंठ तक जाने वाले रास्ते को जीवात्मा के लिये अर्चिरादि मार्ग कहा जाता है। अर्चि का मतलब प्रकाश या तेज। ऐसा रास्ता जहां अलग अलग देवता अपना तेज लेकर मौजूद हों। वहां रहने वाले देवता जीवात्मा के लिये अधिवाहक होते हैं। ये वे देवता हैं जो सुदर्शन चक्र के साथ जीवात्मा को देखकर पहचान लेते हैं कि यह सच्चा विष्णु भक्त है। भविष्य का बैकुंठ वासी है। मैने बताया। फिर वे देवता जीवात्मा को हाथों हाथ एक लोक से दूसरे लोक पहुंचाते हैं। साथ ही जीवात्मा में कुछ दोष हुए तो उसके सूक्ष्म शरीर को उपचारित करते हैं। उनका पुनर्जनन करते हैं। दोष मुक्त करते हैं। बैकुंठ तक पहुंचने में सक्षम बनाते हैं।

सूर्य लोक, चंद्रमा लोक, आकाशीय विद्धुत लोक, दिन (काल) लोक, शुक्ल पक्ष लोक, उत्तरायण लोक, संवत्सर लोक, देवलोक, वायु लोक, वरुण लोक, इन्द्र लोक और प्रजापति का लोक। और अंत में ब्रह्मलोक या सत्य धाम। वृहदारण्यक उपनिषद के मुताबिक ये सब अर्चिरादि मार्ग में पड़ने वाले लोक और वहां के अधिवाहिक देवता हैं।

अब सोचो तुम बैकुंठ की यात्रा पर निकल पड़ी हो। अधिवाहक देवता में सूर्य ने तुम्हारे सूक्ष्म शरीर को तपाया। उसकी सारी अशुद्धियां जलाकर खत्म कर दी हैं। इसमें तपन की पीड़ा हुई किन्तु यह जरूरी था। यमलोक में यही काम यमदूत करते हैं। इसी तरह अन्य देवता तुम्हारे सूक्ष्म शरीर को उपचारित कर रहे हैं। सभी अंगों का पुनर्जनन कर रहे हैं। देवताओं ने सूक्ष्म शरीर से पंचतत्वों की उर्जाओं को भी निकाल दिया है। उसके बिना आगे की यात्रा सम्भव नही। अंत में इंद्र, प्रजापति, ब्रह्मा जी की सदभावनायें लेकर तुम बैकुंठ के द्वार पर पहुंच गई। वहां सात सुरक्षा द्वार पार किये। जिनमें काम, क्रोध, कुंठा, लोभ, मोह, अहंकार, ईष्या की परीक्षा हुई। तुमने सारी परीक्षायें पार कर लीं।

बैकुंठ लोक में इंट्री हुई। गुनगुनाती हवा ने तुम्हे छुआ। देव संगीत की लहरें कानों को छूकर गुजर गईं। वेद मंत्र गूंज गये। पास से आवाज आई राम राम, आपका स्वागत है। वह कल्पवृक्ष था। जो बोला और तुम्हारा अभिवादन किया। फिर पूछा, कोई कामना हो तो बताइये। हम यहां आपके लिये ही हैं। ऐसा वहां सबके साथ होता है। तभी पास के दूसरे पेड़ पौधों ने तुम्हारा ध्यान खींचा। उनमें फूल, पत्तियों के साथ रत्न, मणियां लटक रही थीं। तुम्हारा ध्यान नीचे गया। वहां मिट्टी, पत्थर की जगह सोने और रत्नों की जमीन दिखी। सब कुछ दिव्य और अलौकिक देखकर तुम्हारा मन खुश हो रहा है। कल्पना से बाहर की दुनिया। तभी देव सुगंध ने तुमको सम्मोहित कर लिया। सुगंध बाग, बगीचों से आ रही थी। उधर देखा तो परियां, अप्सरायें उड़ती, मचलती नजर आईं।

तुम्हारा ध्यान नदियों की कलकल ने खींचा। वहां पानी के साथ विष्णु धारायें बहती दिखीं। जिनमें हौले हौले वासुदेवाय… वासुदेवाय स्वर की लहरें तैर रही हैं। नदी में बह रहे वासुदेवाय… जप ने तुम्हें सम्मोहित करके अपनी तरफ खींचा। तुम पास गई। तो नदी की शीतलता, स्वच्छता, सुंदरता देकर प्यास लग पड़ी। नदी का पानी पिया। प्यास बुझने की बजाय बढ़ गई। यह प्यास वासुदेवाय… जप की है। जितना पानी पियो उतना जप मन के भीतर चलने लगता है। ऐसा यहां सबके साथ होता है।

चारो तरफ प्रकाश ही प्रकाश है। शीतल, मनभवान प्रकाश। सदाबहार मोहक मौसम। वहां सूर्य, चंद्रमा, तारे नही नजर आ रहे। न प्रकाश करने वाले कोई उपकरण। फिर भी सब उज्जवल है। प्रकाशित है। यह रोशनी भगवान विष्णु के तेज से उत्पन्न हो रही है। बैकुंठ लोक भगवान के तेज से स्वयं प्रकाशित है। स्वयं उर्जा सम्पन्न है। वहां किसी थी बाहरी साधन या ईंधन की जरूरत नही।

दिव्य, अलौकिक, सम्मोहक, अवर्णीय। यही तो है बैकुंठ। युगों तक घूमो फिर भी मन न भरे। तुम आगे बढ़ी। सब तरफ चार भुजाओं वाले लोग हैं। सबका रंग विष्णु की तरह आसमानी नीला है। सब विष्णु जैसे ही दिख रहे हैं। सब अपने काम में व्यस्त। तुमको देखकर वे अपनेपन से मुस्करा देते हैं। और अपने काम की तरफ चले जा रहे हैं। वहां का अधिकांश आवागमन हवा में है। सबके पास सोने से बने जहाज हैं। वे उनके निजी विमान हैं।

हर जगह तुम्हें सहयोग करने वाले लोग मिल रहे हैं। बड़ा अपनापन, बड़ी कोमलता, बड़ी मधुरता, बड़ी विनम्रता। अचालक तुम्हें एक बुलावा सा आया। दिख कोई नही रहा। मगर मन कर रहा है उधर जायें। चलती गई। एक नदी किनारे पहुंची।

यह है बैकुंठ की विरजा नदी। गंगा जी में नहा कर पाप धुल जाते हैं। ऐसा तो सुना ही होगा। किन्तु विरजा में नहाकर प्रारब्ध धुल जाते हैं। तुन्हें विरजा में डुबकियां लगवाई गईं। हर डुबकी में सूक्ष्म शरीर का एक अंश पुरानी यादों, भावनाओं से मुक्त होता गया। अंत में पुराना कुछ नही बचा। यहां तक की सूक्ष्म शरीर ही घुल कर खत्म हो गया। उसी में जन्मों के पाप, पुण्य का हिसाब था। सब खत्म। आवागमन से मुक्त।

सूक्ष्म शरीर की उर्जायें अपने धाम (देवी धाम) को लौट गईं। उनकी जगह 4 भुजा वाला शरीर सामने आ गया। जो कि भगवान विष्णु की आसमानी उर्जाओं से बना है। वहां ऐसा सबके साथ होता है। अपसराओं की एक टोली गीत गाती हुई तुम्हारे पास पहुंची। तुम्हें घेर लिया। तुम्हारा श्रंगार किया। पीतांबरधारी चार भुजा वाला स्वरूप सजाया गया।

मनमोहक श्रंगार के बाद अप्सरायें तुम्हें माता लक्ष्मी के भवन में ले गईं। माता ने तुम्हें देखा। मुस्कराईं। जैसे पूछ रही हों, इतने युगों से कहां थी? हम सब तुम्हारा इंतजार कर रहे थे। मां लक्ष्मी की चितवन ने तुम्हें जड़ कर दिया। तुम उनकी ममता में खो गई। क्या कहूं, क्या बोलूं? कुछ सूझ नही रहा तुम्हें। माता लक्ष्मी से उर्जाओं का तेज पुंज निकला। तुम्हारे भीतर समा गया। खुशी में तुम अविचल हो गई।

होश आया तो अब भगवान विष्णु के सामने हो। वे तुम्हें ऐसे देख रहे हैं जैसे तुम ही उनकी सबसे सगी हो। तुम्हारा सारा अस्त्तित्व विष्णु में समा गया। उनकी कमल जैसी आंखों से निकली उर्जा ने तुम्हें ब्रह्मांड के गिने चुने लोगों की पंक्ति में शामिल कर दिया। जिन्हें बैकुठ वासी होने का गौरव प्राप्त है। मैने बताया वहां ऐसा सबके साथ होता है।

जल्दी ही तुमसे पूछा जाएगा बैकुंठ में तुम क्या जिम्मेदारी निभाओगी।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या