मृत्यु के बाद देव तरंगों की आहट

देवी-देवता।
जिन्हें पाने, मनाने के लिये जीवन भर लगे रहते हैं। पूजा पाठ, ध्यान, साधना, अनुष्ठान, जप. तप। सबके पीछे देव कृपा प्राप्ति ही उद्देश्य होता है।
मृत्यु।
देवताओं को बिना पूजा पाठ, ध्यान, साधना, अनुष्ठान, जप. तप जीवात्मा की तरफ खींच लाती है। मृत्यु होते ही देव तरंगों की आहट मिलने लगती है। जल्दी ही देव शक्तियां खुद सम्पर्क साध लेती हैं। यह सब देव कृपा नही बल्कि देव कर्तव्य के तहत होता है। जीवात्मा की सहायता करना देवताओं की जिम्मेदारी है। यही उनका काम है।आज के सवाल मृत्यु के उस पार की अदृश्य दुनिया से मेरी पत्नी प्रीति की सूक्ष्म चेतना पूछ रही थी। जवाब इस दुनिया से मै दे रहा था। प्रीति जो मृत्युंजय योग संस्थान के साधकों की गुरू मां है। कुछ समय पहले उन्होंने शरीर छोड़ दिया। सूक्ष्म दुनिया में वे अपनी क्षमताओं को बढ़ाकर देव पक्ति में स्थापित हो रही हैं। जिंदा थीं तब और अब भी मुझे वे अपना अध्यात्मिक मार्गदर्शक मानती हैं। आज उन्होंने मृत्यु से बाद के कई सवाल पूछे। जवाब में जो बातें सामने आईं उन्हें हम आपके साथ भी शेयर कर रहे हैं।
मृत्यु के बाद कुछ जीवात्मायें तुरंत आगे बढ़ जाती हैं। कुछ लम्बे समय तक अदृश्य दुनिया में भटकती रहती हैं। यह भटकन देव लोक की बड़ी समस्या है। इससे वहां अव्यवस्था पैदा होती है। अराजकता पैदा होती है। अनुशासनहीनता पैदा होती है। अकर्मन्यता (बेकारी) पैदा होती है। इसी कारण मृत्यु होते ही देवता जीवात्मा की सहायता के लिये सतर्क हो जाते हैं।
ताकि वह भटकने न पाये।
किन्तु आत्मा मृत्यु के बाद जो मांगती है उसे जीवन में ही पाया जा सकता है।
मृत्यु के बाद उसे दे पाना देवताओं के लिये भी सरल नही होता।
इसीलिये देव व्यवस्था के तहत जीवात्मा के भटकाव को रोकने का काम मृत्यु से पहले ही शुरू कर दिया जाता है।
मुक्ति, मोक्ष की राह बताकर कर्मफल के सिद्धांत को सबसे अधिक प्रचारित किया जाता है।
बुरे कर्मों के बदले नर्क की प्रताड़नायें भी कुछ शास्त्रों का प्रमुख विषय हैं।
दूसरी तरफ अगर कर्म बिगड़ ही गये तो भी जीवात्मा को भटकाव से रोकने की कई देव व्यवस्थायें बनी हैं।
कर्म सिद्धांत के विपरीत धरती पर कई तरीकों से जीवात्मा के भटकाव को रोकने के दैवीय इंतजाम हैं।
उन्हें भी अचूक कहा गया है।
फिर कर्म कैसे भी रहे हों।
शास्त्र कहते हैं मृत्यु के वक्त दैवीय इंतजाम हो जायें तो आत्मा बिना रुकावट मुक्ति की तरफ बढ़ जाती है। जैसे मृत्यु के समय ईश्वर नाम का स्मरण, मुंह में गंगा जल डालना, तुलसी पत्ती डालना, बनारस जैसी जगहों पर मृत्यु होना।
प्रत्यक्ष रूप से देखने पर कर्म फल सिद्धांत और मुक्ति के अतिरिक्त दैवीय इंतजाम एक दूसरे को काटते हैं।
विपरीत प्रतीत होते हैं।
कर्म फल कहता है कि बुरे कर्म किये हैं तो भटकाव मिलेगा ही। सजा मिलेगी ही।
मुक्ति की अतिरिक्त दैवीय व्यवस्था भी खूब प्रचारित है।
शास्त्रों में लिखी कहानियां बताती हैं बुरे से बुरे कर्म करने वाले लोग भी मृत्यु के समय ईश्वर का स्मरण कर लें। तो उन्हें मुक्ति मिल ही जाएगी। मुत्यु के समय मुंह में गंगा जल डाल दिया जाये। या तुलसी पत्ती डाल दी जाये। राम नाम जप करा दिया जाये। तो मुक्ति मिल ही जाएगी। उन्हें ईश्वर सीधे अपना लेते हैं।
ऐसी ही युगों पुरानी दैवीय व्यवस्था में एक है बनारस में मृत्यु।
कहा जाता है बनारस भगवान शिव की नगरी है। वहां जो मरता है। शिव कृपा से उसे मुक्ति मिल ही जाती है।
कालांतर में इस पर सवाल उठते रहे हैं।
कबीरदास जैसे लोगों ने इसे चैलेंज भी किया। और मौत के समय बनारस छोड़ कर चले गये। सिर्फ यह दिखाने के लिये कि यह सब अंधविश्वास की बातें हैं। वे इसे नही मानते।
दरअसल यह अंधविश्वास नही है। धरती के वास्तु की उर्जाओं का कमाल है। जब कभी वैज्ञानिक इस पर गहन शोध करेंगे तब पाएंगे कि बनारस के कुछ क्षेत्रों में ब्लैक होल और वार्म होल बने हैं। जो अदृश्य दुनियाओं के रास्ते हैं।
इनमें मृत्यु बाद की दुनिया भी शामिल है।
हम थर्ड डाइमेंशन के जीव है। इसलिये उच्च आयाम के ये रास्ते हमें नही दिखते।
योगी, साधक इन्हें देख सकते हैं।
जब कभी नजदीक से ब्लैक होल देखने वाली मशीनें बनेंगी तब वैज्ञानिक भी देख पाएंगे।
इन अदृश्य रास्तों से अनेकों दुनिया के लोग बनारस आते जाते रहते हैं। जिनमें कुछ के इरादे खतरनाक भी हो सकते हैं।
उनसे रक्षा के लिये ब्लैक होल, वार्म होल वाले अदृश्य दरवाजों की गहन सुरक्षा व्यवस्था है।
बोलचाल की भाषा में लोग उन्हें बनारस के कोतवाल कालभैरव के नाम से पुकारते हैं।
ब्लैक होल या वार्म होल होने भर से जीवात्मा की मुक्ति का क्या वास्ता ?
स्वाभाविक सवाल है। जवाब के लिये हमें मृत्यु के सभी भागों को अलग अलग समझना होगा।
दरअसल मृत्यु सिर्फ शरीर के मर जाने भर की घटना नही है।
इसके साथ आत्मा और सूक्ष्म शरीर की स्थिति भी बदलती है।
तीनों की सक्रियता की बात करें। तो मरने वाला स्थुल शरीर पंच तत्वों से बना है। यह सूक्ष्म शरीर के लिये काम करता है। सूक्ष्म शरीर ब्रह्मांडीय उर्जा (देवी शक्ति) से बना है। यह आत्मा के लिये काम करता है। आत्मा परमात्मा (देव शक्ति) से बनी है। इसे काम करने के लिये सूक्ष्म शरीर अनिवार्य रूप से चाहिये। उसके बिना आत्मा कुछ भी नही कर सकती। अगर कहा जाये कि सूक्ष्म शरीर के बिना आत्मा एक मरा हुआ तत्व है तो अनुचित न होगा। इसीलिये अनेकों विद्वान शक्ति के बिना शिव को शव जैसा मानते हैं। शक्ति मतलब प्रकृति को उत्पन्न करने वाली उर्जा।
जन्म – मृत्यु के खेल में परमात्मा ने खुद को बहुत स्मार्ट मोड में रखा है। उन्होंने घोषित कर दिया कि उनसे बनी आत्मा को प्रभावित नही किया जा सकता। बनाया, बिगाड़ा नही जा सकता। काटा, जलाया नही जा सकता। यहां तक कि दुनिया में होने वाले किसी भी काम का दोष उन्हें नही लगेगा। लोगों द्वारा किये जाने वाले कामों का पाप, पुन्य उन्हें नही लगेगा।
अगर हम इसे भौतिक रूप से समझें तो हमारे देश के राष्ट्रपति का उदाहरण लें। देश की हर छोटी बड़ी व्यवस्था के लिखित मालिक राष्ट्रपति ही होते हैं। वही शपथ दिलाकर प्रधानमंत्री तक को शक्तियां सौंपते हैं।
किन्तु किसी के भी किये कार्यों का दोष उन्हें नही लगता।
अगर कोई गड़बड़ होगी तो प्रधानमंत्री या शक्तिशाली पदों पर बैठे अन्य लोग होंगे।
इसी तरह सूक्ष्म शरीर है। जो कमांड कर रही आत्मा के सभी कार्य करता है।
माया, मोह, लोभ, क्रोध, इर्शा, अहंकार, अपराध, अन्याय सहित सारे दोष इसे ही लगते हैं। इसी को सजा इसी को इनाम मिलता है।
इसी में जन्मों के कर्मों का लेखा जोखा होता है।
जिन्हें प्रारब्ध के रूप में इसे ही भुगतना पड़ता है।
मृत्यु के समय सूक्ष्म शरीर यदि भावनात्मक रूप से बीमार हुआ। या आभामंडल, उर्जा चक्रों की टूट फूट के रूप में क्षतिग्रहस्त हुआ। तो भटक जाता है।
प्रेत श्रेणी में आ जाता है।
मृत्यु होते ही शरीर से निकली आत्मा अपने निर्धारित स्थान पर पहुंच जाती है। उसे कोई दोष नही लगता। और कोई हिसाब किताब नही देना होता। वह सेफ जगह रुककर सूक्ष्म शरीर का इंतजार करती है।
एक आत्मा को हमेशा के लिये एक सूक्ष्म शरीर ही आवंटित होता है।
उसी का इंतजार करना होता है।
मृत्यु के बाद की दुनिया में जाते ही देवताओं द्वारा सूक्ष्म शरीर को अपने संरक्षण में ले लिया जाता है।
परीक्षण किया जाता है। बीमार या क्षतिग्रस्त सूक्ष्म शरीर का इलाज किया जाता है।
पूरी तरह ठीक होने के बाद ही सूक्ष्म शरीर को आत्मा से मिलवाया जाता है।
क्योंकि बीमार या क्षतिग्रस्त सूक्ष्म शरीर अगले जन्मों के काम ठीक से नही कर सकता।
पैदा होते ही वहां बीमारी, बेबसी का शिकार होगा।
ऐसे में ईश्वर द्वारा निर्धारित कामों को नही कर पाएगा।
इसका असर ब्रह्मांड की पूरी व्यवस्था पर पड़ता है।
पूरी तरह ठीक होने के बाद आगे की यात्रा के लिये सूक्ष्म शरीर को आत्मा से मिला दिया जाता है।
दोनो मिलकर जीवात्मा का नाम पाते हैं।
अगली यात्रा पर निकल पड़ते हैं।
अक्सर क्षतिग्रस्त सूक्ष्म शरीर ही भटकाव का कारण बनते हैं। मृत्यु के समय शरीर से आत्मा निकली। सूक्ष्म शरीर निकला। स्थुल शरीर को पंचतत्व में विलीन कर दिया गया। आत्मा अपने सेफ जोन में चली गई। बचा सूक्ष्म शरीर जिसे आत्मा के साथ चले जाना था। मगर अपने शरीर को, रिश्तेदारों को, सम्पतियों, साधनों को देखकर वह अटक जाता है। उस पार की दुनिया में उसका इंतजार हो रहा होता है। कुछ समय इंतजार के बाद ब्लैक होल के रूप में सूक्ष्म दुनिया का रास्ता खुलता है। उसे बल पूर्वक खींच लिया जाता है।
ब्लैक होल का फोर्स बहुत अधिक होता है। जिसके कारण सूक्ष्म शरीर बुरी तरह तोड़ मरोड़, खींचतान का शिकार होता है।
आभामंडल, उर्जा चक्र आदि उसके अंग टूट फूट जाते हैं।
इस तरह अधिकांश का सूक्ष्म शरीर क्षतिग्रस्त होकर घायल हो जाता है।
घायल सूक्ष्म शरीर को वहां की दुनिया में प्रेत कहा जाता है।
प्रेत मतलब ताजी मृत्यु वाला ऐसा सूक्ष्म शरीर जिसको उपचार की जरूरत है।
दुर्घटनाओं का शिकार हुए कई लोगों के सूक्ष्म शरीर यहीं मृत्यु से पहले ही क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।
इसीलिये कहा जाता है कि वे प्रेत बनेंगे।
अब वापस लौटते हैं बनारस में मृत्यु और मुक्ति की बात पर।
बनारस में ब्लैक होल व वार्म होल के रुप में जो अदृश्य दरवाजे हैं। वे मृत्यु के पार की उस दुनिया में भी खुलते हैं। वहां मरे लोगों के सूक्ष्म शरीर उनसे होकर आराम से उधर की दुनिया में पहुंच जाते हैं। उनके साथ खींचतान नही होती। उनके सूक्ष्म शरीर घायल होने से बच जाते हैं। उन्हें उपचार की जरूरत नही पड़ती। देवताओं द्वारा वे जल्दी ही आत्मा के पास भेज दिये जाते हैं। बिना भटकाव आगे की यात्रा पर जाने को भी मुक्ति कहा जाता है।
मृत्यु के बाद आत्मा जो मांगती है उसे जीवन में ही पाया जा सकता है। जिसे दे पाना देवताओं के भी वश की बात नही। वह क्या है ? बीमार और क्षतिग्रस्त प्रेतों का इलाज कौन करता है? वे कैसे ठीक किये जाते हैं ? देव व्यवस्था के बीच यमदूतों का क्या रोल होता है ? वे किसे और क्यों प्रताड़ित करते हैं ? धरती पर जिनके परिवार गरीब हैं उन प्रेतों को मुक्ति कैसे मिलती है ? इन सबके बारे में हम आगे जानेंगे।
क्रमशः।
Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या