देवताओं की दुनिया से आया मौत का जवाब

तुम जलकर क्यों मरी ? देवताओं की दुनिया से क्या तुम्हे इस बात का कोई जवाब मिला ?
मैने अपनी पत्नी प्रीति की सूक्ष्म चेतना से पूछा।
उनका जवाब चौंकाने वाला था। बताया कि यह मौत तीन जिंदगी पहले हुई मेरी गलती की सजा थी। जिस कारण एक योगिनी साधिका जल गई और उसकी मृत्यु हो गई।
मेरे मन में उनसे मिले अदृश्य जवाब को विस्तार से जानने की उत्सुकता पैदा हुई। उनसे 3 जन्म पहले घटी घटना को विस्तार से बताने का आग्रह किया। जिसकी जानकारी उन्हें देवताओं की दुनिया से मिली।
पिछले महीने उनकी मृत्यु हुई।
21 मई 2026 को पूजा का दीपक जलाते समय वे जल गईं। देहरादून के मेडिकल कालेज हास्पिटल में इलाज चला। बर्न वार्ड की प्लास्टिक सर्जरी आई सी यू में 29 मई तक डाक्टरों ने कोशिश की। वहीं उनकी अंतिम सांस पूरी हुई।
उस बीच कई चीजें थीं जो सामान्य से अलग थीं। 27 मई की रात जब हम आई सी यू में उनसे मिलने गये। तब उन्होंने बताया कुछ एनर्जी उनसे सम्पर्क की कोशिश कर रही हैं। उनके पास आ जा रही रही हैं। उनमें कुछ के आने जाने से उलझन हो रही है। मुझसे कहा कि मै उन्हें हटा दूं। जो एनर्जी ठीक हैं उन्हें वहीं रहने दूं।
उस समय हमारे साथ शिव साधिका शालिनी भी थीं। हजारों साधकों की तरह वे भी वे प्रीति को गुरू मां मानती हैं।
पति के साथ हमारा उनसे अध्यात्मिक गुरू- शिष्य का भी रिश्ता था। वे संजीवनी उपचार, हीलिंग, आभामंडल, उर्जा चक्र व सूक्ष्म शरीर मुझसे सीखती थीं। लम्बे समय से मंत्र संजीवनी उपचार कर रही थीं। सो उन्हें अदृश्य उर्जाओं की जानकारी थी। उन्हें महसूस कर सकती थीं। देख सकती थीं। छू सकती थीं। नाप सकती थीं। बढ़ा, घटा सकती थीं।
मृत्युंजय योग के साधकों के आभामंडल से नकारात्मक उर्जायें हटाकर उन्हें समस्याओं से राहत देती थीं। उनके पास आते ही साधकों की नकारात्मकता हट जाती थी। सकारात्मकता और उत्साह-उमंग बढ़ जाता था। लोगों की खुशियां बढ़ जाती थीं। वे मृत्युंजय योग संस्थान से जुड़े साधकों को अपने ही बच्चे मानती थीं।
इसी कारण मृत्युंजय योग के साधक उन्हें गुरू मां कहते हैं।
उस रात हास्पिटल की आई सी यू में जब उन्होंने उर्जाओं द्वारा सम्पर्क की बात बताई तो मैने चेक किया। कई तरह और रंगों की उर्जायें थीं। जिनमें नीली और कत्थई रंग अदृश्यों उर्जाओं से उन्हें असुविधा हो रही थी।
हमने उन्हें हटाया। कुछ मंत्रों की उर्जायें आमंत्रित कीं।
तभी उन्होंने कहा अपने लेफ्ट पैर में घुटने के नीचे देखिये अभी आप पर किसी का हमला हुआ।
हमारे बीच लाइफ में ऐसी बातें कभी नही हुई थीं। सो मै थोड़ा अचम्भित था।
शालिनी को कुछ क्षण के लिये वार्ड के बाहर भेजा। ताकि पैर खोलकर चेक कर सकूं।
अब मै और अधिक अचम्भित था। बायें पैर में घुटने के नीचे लगभग 2 इंच दायरे में फैला ताजा लाल निशान था। जैसे किसी ने दातों से काटा हो।
वे खुद बेड पर हिल भी नही सकती थीं। फिर पैर पर आये निशान को कैसे देख लिया। मै मन में सोच रहा था।
आप चिंता न करें। मै आपको कुछ नही होने दूंगी। आपको बच्चे सम्भालने हैं। परिवार सम्भालना है। संस्थान के साधकों को भी बच्चों की तरह सम्भालना है। उन्होंने कहा।
डाक्टरों के मुताबिक 90 प्रतिशत जली होने के बाद भी उन्होंने बोलना बंद नही किया। अंत तक बोलती बतियाती रहीं।
मै बस उनकी तरफ देखता रहा। क्या बोलूं, कुछ सूझ नही रहा था।
वे खुद बोलीं आप मेरे पास से एक को छोड़कर बाकी सब एनर्जी हटा दीजिये।
किस एनर्जी को रहने दूं? मैने पूछा।
हरी वाली को। उन्होंने कहा जो राधा जी की चुन्नी की तरह है।
मैने मंत्रों का आवाहन शुरू कराया। उनको राहत देने वाली हरी उर्जा राम नाम जाप में मिली। मैने उन्हें राम नाम जाप शुरू कराया।
उस रात वार्ड की नर्स ने देखा कि हम बहुत देर से वहां हैं औऱ कुछ खास कर रहे हैं। आई सी यू वार्ड में कुछ मिनटों से ज्यादा रुकना एलाउ नही होता। सो वह हमें बाहर जाने को कहने आई थी।
वह चुपचाप आकर पीछे खड़ी गई। उस समय मैने शालिनी को राम नाम जप कराने के लिये लगा रखा था। नर्स ने सहयोग किया। उसने कहा आप चाहें तो मोबाइल पर बजाकर भी इन्हें राम राम सुनायें। कोई कुछ नही कहेगा। हम आपके साथ हैं। तब शरू हुआ उनका राम नाम जप 29 मई अंतिम सांस तक चलता रहा।
उसी रात प्रीति ने मुझसे कहा मै थक गई हूं। अब आप मुझे जाने दीजिये। किसी तरह बच भी गई तो ये शरीर अब मेरे काम का नही रहेगा। सो प्लीज मुझे जाने दीजिये। जैसे उन्हें पक्का यकीन था कि मै कुछ ऐसा करूंगा जिससे उन्हें पीड़ा दे रहे शरीर से मुक्ति मिल जाएगी। उनके शब्दों में बेबसी नही बल्कि नयी यात्रा की तैयारी सी लगी।
मैने उनके सिर पर हाथ फेरा।
वे बोली जरा ध्यान से मेरे माथे की बिन्दी न हटने पाये। सिंदूर न मिटने पाये। मै सुहागन वेष में ही जाउंगी।
उनके जख्मी हाथ सफेद पट्टियों में लिपटे थे। बहुत जोर लगाया और अपने पट्टी वाले हाथों में मेरा हाथ भर लिया। अपने चेहरे के पास ले गईं। उनकी एक आंख रिसी। एक टुकड़ा आंसू मेरी उंगली को गीला कर गया।
मै उनकी विदाई की मानसिक तैयारी करने लगा।
हलांकि हास्पिटल पहुंचने पर मुख्य डाक्टर ने पहला सेंटेंस बोला था 90 प्रतिशत जली हैं। बचने की उम्मीद नही। आपको सच्चाई बताते चलना हमारा फर्ज है।
ऐसी सच्चाई जो सीना चीर कर रख दे। दिमाग सुन्न कर दे। मैने उस सच्चाई को मानने से इंकार कर दिया। बच्चों और साधकों पर यह सच्चाई जाहिर न होने दी। चेहरे पर बनावटी तसल्ली ओढ़ ली। ताकि मुझ पर भरोसा किये लोग टूट न जायें।
उस रात जब उन्होंने कहा अब थक गई हूं। मुझे जाने दें। तब लगा कि समय ने करारी चोट कर दी है।
अब उनकी मुक्ति की बात सोचने थी।
बंधन मोचन यंत्र तैयार कराया। जिसका अध्यात्मिक परिणाम होता है, बंधनों से मुक्त करना।
बंधन मतलब जहां व्यक्ति बेबसी में रहे। अपनी मर्जी से कहीं आ जा न सके। चाहे कस्टडी हो या अस्पताल। बंधन मोचन यंत्र इस तरह के बंधनों से मुक्त कराता है। हमने उसे तैयार करा लिया।
किंतु जीवन की उम्मीद न छोड़ी। इसलिये उसका उपयोग नही किया।
अगली रात उन्होंने फिर कहा मुझे भेज दीजिये। अब शरीर बहुत परेशान कर रहा है।
रात भर उनके साथ बिताये जीवन के पल आंखों में छाये रहे। कभी होठ मुस्करा पड़ते तो कभी आंखें नम हो जातीं।
अगली सुबह तकलीफ और बढ़ गई। डाक्टरों ने बताया फेफड़े और दिल बिना सपोर्ट काम नही कर रहे। अब कोई गुंजाइश नही। उस वक्त वार्ड में मसूरी वाली साधिका नीलम गुरू मां के साथ थीं। उनके हाथों यंत्र स्थापित करा दिया।
कुछ समय बाद वे विदा हो गईं।
ऐसी मृत्यु क्यों ? यह सवाल उसी वक्त से मुझे उलझाये था। इसका जवाब मुझे हर हाल में चाहिये। जवाब के लिये मैने उन्हें ही चुना।
अगले अंक में उनका जवाब बताउंगा। देवताओं की दुनिया से उन्हें जवाब क्यों और कैसे मिल रहे हैं। यह भी आगे जानेंगे।
क्रमशः।
Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या