जीवन की चौथी दुनियाः 18

जब भगवान शिव को परिवार सहित काशी से निकाल दिया गया

जहां देवी-देवताओं से काम नही चलता वहां योगिनियों को तैनात किया जाता है। ब्रह्माजी के पुत्र दिवोदास ने भगवान शिव सहित सभी देवताओं को काशी से निकाल दिया। दुखी मन से शिवजी परिवार सहित मंदार पर्वत पर रहने चले गये। उनका मन काशी में ही अटका था। काशी उन्हें बहुत पसंद है। वे दोबारा काशी को जीतना चाहते थे। गणेश सहित महारथियों को भेजा। सभी देवता गये। देवियां गईं। सभी को दिवोदास के समक्ष हार माननी पड़ी। तब योगिनियों को मोर्चे पर लगाया गया।

ब्रह्माजी के एक पुत्र दिवोदास थे। वे बड़े ही धर्मात्मा और कुशल शासक थे। उनके राज्य में अन्याय और अभाव बिल्कुल न था। सब खुश रहते। सबको समान अधिकार मिलते। उनके राज में अपराध, अहंकार, अनैतिकता नही होती। कुशल राजा और धर्मात्मा की उनकी छवि सारे संसार में फैली थी।

उन्हीं दिनों काशी के राजकाज में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं। जिसका बड़ा कारण देवताओं का अहंकार था। काशी में शिव का वास था। देवता बेरोक टोक उनसे मिलने काशी में आते। काशी की दवत्व वाली उर्जाओं को ग्रहण करने के लिये विचरण करते। अपने को महत्वपूर्ण दर्शाने के लिये अहम दिखाते। लोग उनका विरोध न कर पाते। जिसका सीधा असर राज्य की व्यवस्था पर पड़ा।

इस बात की चिंता हुई। तो भगवान शिव ने कुशल राजा की नियुक्ति के निर्देश दिये। ब्रह्मांड में उन दिनों सबसे कुशल राजा दिवोदास ही थे। उन्हें काशी का राज पाठ सम्भालने का निमंत्रण दिया गया। वे काशी पहुंचे। अपने जासूसों को सक्रिय किया। तो राज पाठ में गिरावट का कारण सामने आया। दिवोदास ने राज सिंहासन सम्भालने से पहले कुछ शर्तें रखीं। शिव भगवान ने बिना सुने उन्हें हां कर दिया।

दिवोदास ने कहा शिवजी को काशी से निकाला जा रहा है। उन्हें परिवार सहित काशी छोड़कर जाना होगा। उनके साथ ही सभी देवताओं को भी काशी से निकाला जा रहा है। वे यहां नही रह सकते। दिवोदास को काशी में अव्यवस्था का असली कारण मालुम हो गया था। वह था शिव जी की उदारता में देवताओं द्वारा अपनाया जाने वाला अहंकार और राजकाज में उनके द्वारा अहंकार वश की जा रही तानाशाही। देवताओं को काशी से निकाल कर दिवोदास समस्या की जड़ खत्म करना चाहते थे। उन्हें मालुम था कि भगवान शिव वहां रहेंगे तो देवताओं का आना जाना लगा रहेगा। जिससे यही हाल बार बार होगा। सो उन्होंने शिव जी को सबसे पहले काशी छोड़कर चले जाने की शर्त रखी।

शर्त मानी गई। भगवान शिव को दुखी मन से काशी छोड़नी पड़ी। सारे देवता चले गये। दिवोदास ने काशी का सिंहासन सम्भाला। कुछ ही समय में काशी संसार के सर्वोत्तम राज्यों में पहले नम्बर पर आ गया। प्रजा से लेकर राजा तक सब सुखी। सब खुश। सब धर्माचरण की राह पर। राज और प्रजा पर दिवोदास की पकड़ बड़ी ही मजबूत बन गई। जिसके कारण अब उन्हें सिंहासन से हिलाया भी नही जा सकता था।

उधर भगवान शिव का मन बेचैन था। काशी का राजकाज अच्छा हो गया इस बात से वे खुश थे। किन्तुं काशी के असली राजा होकर भी वे वहां रह नही सकते थे। यह बात उन्हें परेशान किये थी।

कुछ समय बाद शिवजी ने दिवोदास को संदेश भेजा। अब जब सब ठीक है। तो सिंहासन वापस शिवजी को सौंप दें।

दिवोदास ने मना कर दिया। कहा बहुत प्रयासों से यहां एसा राज स्थापित हो पाया है। उनके आने और देवताओं के निवास करने से फिर गड़बड़ होगी। सो शिवजी को अब यहां कभी नही आना है।

शिवजी को काशी की याद बहुत सताती थी। वे हर हालत में काशी वापस जाना चाहते थे। किन्तु दिवोदास इसके लिये बिल्कुल तैयार नही हुए। नौबत युद्ध तक पहुंच गई। भगवान शिव ने दिवोदास के साथ लड़ाई की बजाय अध्यात्मिक युद्ध का निर्णय लिया। क्योंकि दिवोदास की अध्यातिमिक शक्तियां विशाल थीं। उनके सामने युद्ध जीतना कठिन था। साथ ही वे एक धर्मात्मा के विरुद्ध खून खराबे वाली लड़ाई नही चाहते थे।

उन्होंने पहले अपने गणेश जी सहित सभी गणों को, भक्तों को दिवोदास को जीतने के लिये भेजा। फिर देवताओं को भेजा। फिर ब्रह्मा जी को भेजा। जो भी देवता काशी जाता, वह राजा दिवोदास की प्रजा-वत्सलता और शहर की दिव्यता देखकर वहीं का होकर रह जाता। राजा दिवोदास एसा क्या करते हैं कि सब उनके होकर रह जाते हैं। दिवोदास को हराने का रहस्य जानने के लिये देवताओं को लगाया गया। कोई फायदा नही हुआ। उल्टे वे भी दिवोदास के होकर रह गये।

तब भगवान शिव ने युद्ध की कमान 64 योगिनियों को सौंपी। तंत्र विद्या में माहिर, रहस्यों को खोलने में निपुण, कण कण की जानकारी रखने वाली योगिनियां दिवोदास की सारी जानकारी लेकर आएंगी। यह भी बताएंगी कि दिवोदास को परास्त करने के रास्ते क्या हैं। साथ ही मौका मिलते ही दिवोदास की उस व्यवस्था को ध्वस्त कर देंगी जिसके कारण दिवोदास जनप्रिय राजा बने हैं।

योगिनियों ने जासूसी का काम पूरी लगन से सम्भाला। भगवान शिव को उन पर देवी देवताओं से अधिक भरोसा था। तभी उन्होंने सबके असफल होने के बाद दिवोदास को हराने की तरकीब ढुंढ़ने के लिये काशी भेजा। इसके लिये उन्हें अपनी सभी तरह की शक्तियों का प्रयोग करने की छूट दी। योगिनियों ने काफी महत्वपूर्ण जानकारियां एकत्र कीं।

बाद में भगवान विष्णु की अध्यात्मिक युद्ध में इंट्री हुई। उन्होंने मायाजाल का प्रयोग किया। फिर दिवोदास को अहसास कराया कि वह माया मोह में फंस गये हैं। उन्हें काशी का राज इसलिये दिया गया था ताकि वहां की व्यवस्था सर्वोत्तम हो सके। वह उद्देश्य पूरा हो चुका है। इसके बाद भी काशी के सिंहासन को न छोड़ना माया मोह में फंसना है। जिससे उनके धर्म का क्षरण होगा। भगवान विष्णु सफल हुए। भगवान शिव को काशी वापस मिल गया।

योगिनियों की किन शक्तियों के कारण भगवान शिव ने उन्हें देवताओं से अधिक महत्व दिया। योगिनियों को शक्ति कहां से मिलती है। वे अपनी शक्तियां दूसरों को कैसे देती हैं। वे कहां रहती हैं।

मृत्यु के बाद शरीर छोड़कर देवताओं की दुनिया में गई मेरी पत्नी प्रीती किस तरह योगिनी बनने की दिशा में अग्रसर हैं। इसके लिये उन्हें अपनी दिव्य चेतना का उत्थान किस स्तर तक करना होगा। इस बारे में हम आगे बात करेंगे।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या