जीवन की चौथी दुनियाः 16

गरीब, बीमार, नशेबाज, क्रोधी, बिगड़े चरित्र वाले माता पिता को कैसे सुधारा जाये

देवताओं ने भी यही सलाह दी। अमीरी गरीबी न देखो। अपने छूटे कामों को पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित करो। और जीवात्मा ने लक्ष्य का निर्धारण कर लिया। उसने जहां जन्म लेने का फैसला किया वह परिवार गरीबी में था। माता, पिता गरीब। भाई बंधु गरीब। रिश्तेदार गरीब। सगे सम्बंधी गरीब। गरीबी ऐसी कि न परविश में बराबरी कर सकें। न पढ़ाई लिखाई में। धनाभाव के कारण जीवन के हर क्षेत्र में पिछड़ापन। गरीबी में जन्म लेने का फैसला खुद का था। तब इसकी परवाह न थी। निभाये जाने वाले संकल्प कुछ और थे। जिसके अवसर इसी परिवार में थे। देवताओं ने भी अपनी सलाह में इस बार यहीं जन्म को सर्वश्रेष्ठ बताया।

सवाल। गरीब परिवार में जन्म लेने के बाद लोग क्या अपने इस फैसले के लिये पछताते हैं? क्या वे इसके लिये सलाहकार देवताओं को भी कोसते हैं? ये सवाल कई साधकों ने पूछे हैं। सो इस विषय पर दोबारा थोड़ी चर्चा का औचित्य बनता है।

जवाब। पहली बात तो उन्हें याद ही नही होता कि जन्म के लिये गरीब परिवार उन्होंने खुद चुना। ऐसा नही है कि उनकी वो वाली याददास्त मिटा दी गई। जिस विचार जिस चुनौती के साथ उन्होंने नया जन्म लिया। होश सम्भालने से पहले तक उनके भीतर वैसे विचार और संकल्प थे। जैसे जैसे वे बढ़ते गये। दुनियादारी और सामाजिक बराबरी की छटपटाहट दिमाग पर हावी होती गईं। बराबरी वाली योजनायें आगे आती गईं। वो वाली याददास्त पीछे जाती गई। दिमाग में दुनियादारी बढ़ती गई। जिसका जन्म के उद्देश्य से कुछ लेना देना नही।

इस तरह जन्म लेने के अपने फैसले को भूल जाने के कारण लोग परिस्थियों के लिये दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं। यही नही वे ईश्वर और देवी देवताओं को भी कोसते हैं।

कुछ समय पहले मेरी पत्नी प्राति देवी की मृत्यु हुई। यम लोक को पार करके वे पितृ लोक गईं। वहां से उन्हें देवताओं की दुनिया में आने जाने की अनुमति मिली। विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिये उन्होंने अभी नया जन्म न लेने का निर्णय लिया। देवताओं द्वारा उन्हें इसकी अनुमति दी गई। साथ ही आत्मा उत्थान का लक्ष्म भी दिया गया। जिसके लिये वे मुझसे आध्यात्मिक सहयोग ले रही हैं। जीवन काल में उन्होंने भगवान शिव को अपना गुरू धारण किया था। उनसे ही अधिकांश सवालों के जवाब लेती थीं। बचे सवाल मुझसे भी पूछती थीं। मुझे भी गुरू समान मानती थीं। सूक्ष्म चेतना के उत्थान की शास्त्रीय तकनीक और उर्जा विज्ञान के प्रयोग से हम पुनः एक दूसरे के सम्पर्क में आये। अपनी अपनी दुनिया में रहकर एक दूसरे से जानकारियां लेते देते हैं। मृत्यु से लेकर नये जन्म तक की यात्रा के विषय पर मुझे उनसे काफी जानकारियों मिल रही हैं। तमाम रहस्य खुल रहे हैं। उन्हें मृत्युंजय योग के साधकों के साथ शेयर करता चल रहा हूं। क्योंकि मृत्युंजय योग के साधक उन्हें अपनी गुरू मां मानते हैं। उनके बारे में, उनकी बताई बातों के बारे में जानने के इच्छुक रहते हैं।

मरने के बाद लोग यम लोक जाते हैं। वहां की परिस्थितयों से निपट कर पितृ लोक पहुंचते हैं। पितृ लोक से जीवन की चौथी दुनिया यानी चौथे आयाम में पहुंचते हैं। जिसे देवताओं की दुनिया कहा जाता है। अगले जन्म का निर्णय वहीं होता है। आत्मा के उत्थान की स्थिति के अनुसार जन्म के स्तर तय होते हैं। आत्मा का उत्थान कर्मों के अनुसार मृत्यु से पहले ही हो चुका होता है। उसी स्तर नये जन्म की स्थितियों और जिम्मेदारियों का निर्णय होता है। देवताओं के समूह जीवात्मा को नई जिम्मेदारियों से अवगत कराते हैं। पिछले जन्मों के छुटे कामों के बारे में सजग करते हैं। वे काम जो परमात्मा के थे। जीवात्मा को पूरे करने थे। किन्तु नही कर पाये। इस तरह कई जन्मों के अनेकों काम पिछड़ गये।

ऐसे में जीवात्मा कन्फ्यूज होती है। छूटे कामों में से किसे पहले करें। किसे बाद में। देवता आगे आते हैं। बताते हैं ऐसे में क्या करना ज्यादा जरूरी होगा। उसके लिये कहां जन्म लेना उचित होगा। उस वक्त सिर्फ ये दिखता है कि छूटे काम करने का अवसर किस परिवार में है। वहीं जन्म का निर्णय ले लिया जाता है। भले ही वहां धनाभाव या दूसरी समस्यायें मौजूद हों।

हम इनको भी ठीक कर लेंगे और परमात्मा के छूटे कार्य भी पूरे करेंगे। इस दृढ़ संकल्प के साथ वहां जन्म ले लिया है। ऐसा भी नही है कि जीवात्मा नये जन्म वाले परिवार की गरीबी दूर न कर सके।

धीरू भाई अम्बानी जैसे अनेकों उदाहरण हैं जो प्रमाणित करते हैं कि जन्म की गरीबी को हटाया जा सकता है। साथ ही परमात्मा के कामों को बड़े स्तर पर पूरा किया जा सकता है। यदि जन्म के बाद व्यक्ति को बराबरी की सनक न चढ़े तो वह जन्म लेने के सारे उद्देश्य पूरे कर सकता है। क्योंकि परमात्मा द्वारा निर्धारित जिम्मेदारियों में से 99 प्रतिशत से अधिक को पूरा करने में धन, साधन की जरूरत ही नही होती।

जीवात्माओं का काम बराबरी करना नही होता। यदि लोग दूसरों की बराबरी की न सोचें तो परमात्मा के सारे काम पूरे कर डालेंगे। हर जीवात्मा की अपनी क्षमता होती है। उसी के अनुसार दायित्व निर्वाहन और उपलब्धि होती है। यह बात जन्म से पहले देवताओं द्वारा खूब अच्छे तरह से बता समझा दी जाती है। किसी भी व्यक्ति के जन्म का उद्देश्य ऐसा नही होता जिसे वह पूरा न कर सके। वहां ओवर वर्डन का फार्मूला नही चलता। किन्तु लोग बराबरी की आपाधापी में खुद ही ओवर वर्डन के शिकार हो जाते हैं। तब न वे इस लोक की जिम्मेदारियों को ठीक से निभा पाते हैं और न उस लोक की।

एक उदाहरण और समझतें हैं। जन्म के समय जीवात्मा नया परिवार तलाश रही थी। एक परिवार में दो बेटे थे। माता पिता बीमारी के शिकार थे। धन भी अधिक नही था। मगर गरीबी भी नही थी। उन्होंने अपने जन्म का उद्देश्य माता पिता को बीमारी से मुक्त कराने का रखा। क्योंकि उस परिवार का पिता बीमारी के कारण अपने जन्म का उद्देश्य पूरा नही कर पा रहा था। पहले बेटे ने जन्म लिया। जब तक छोटा था तब तक उसे बीमार माता पिता की बहुत फिक्र थी। बड़ा हुआ तो लोगों से बराबरी की योजनाओं में लग गया। माता पिता की बीमारी के प्रति उदासीन होता गया। उनकी फिक्र छोड़ दी। यानी अपने जीवन का उद्धेश्य छोड़ दिया।

उसी बीच एक और जीवात्मा का ध्यान उस परिवार की तरफ गया। उसने माता पिता की बीमारी के साथ ही बड़े भाई को भी सही दिशा में लाने संकल्प लिया। उसी परिवार में जन्म ले लिया। छोटा था तब तक पूरे परिवार के हित की बातें करता था। बड़ा हुआ तो बड़े भाई से ही कम्पटीशन कर बैठा। उससे अधिक धन कमाने की बराबरी में बह गया। उसका भी जन्म का उद्देश्य छूट गया। दोनो भाई हमेशा ही अमीर न होने के लिये पिता व दूसरे लोगों को जिम्मेदार ठहराते थे। देवों को कोसते थे। दोबारा मरे। तब तक उनकी आत्मा का काफी पतन हो चुका था। 84 लाख योनियों का सामना करना पड़ा। उनमें पहला जन्म मिला लाल चीटी का। किसी ने मसल कर मार डाला। क्योंकि उसे काट लिया था।

गरीब, बीमार, नशेबाज, क्रोधी या बिगड़े चरित्र वाले माता पिता को चुनने के बाद उनका उद्धार कैसे हो। उनकी सहायता कैसे हो? जन्म का उद्देश्य कैसे पूरा हो? ऐसे में क्या किया जाये? इस पर हम आगे बात करेंगे। तब तक मान कर चलिये कि यह सब न सिर्फ सम्भव है बल्कि सरल भी है। ऋषियों और शास्त्रों ने इसके लिये सटीक राह दी है। हम आपको बताएंगे भी और सिखाएंगे भी।
क्रमशः


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या