जीवन की चौथी दुनिया- 8

मृत्यु के तीन टुकड़े

क्या मरे हुए लोगों को पहले से पता होता है कि उनके साथ कब, क्या होने वाला है? क्या वहां की दुनिया में कोई उनकी मदद करता है? क्या मरे हुए लोग वहां एक दूसरे की मदद करते हैं? क्या वहां उनकी मुलाकात पहले मर चुके रिश्तेदारों से होती है? मैने ये सवाल अपनी मर चुकी पत्नी प्रीती की सूक्ष्म चेतना से पूछे। जो मृत्यु के उस पार की दुनिया में थीं। सूक्ष्म चेतना के द्वारा वहां से उनके जवाब आ रहे थे। प्रीती जी मृत्युंजय योग के साधकों की गुुरू माता थीं। साधक उनकी सूक्ष्म यात्रा को जानने के उत्सुक हैं। इसलिये हम उनका वृतांत शेयर करते चल रहे हैं।

नही। पहले से कुछ पता नही होता। उनका जवाब आया। शरीर छोड़ कर जीव उस दुनिया में सूक्ष्म शरीर के रूप में पहुंचता है। काफी समय तक वह खुद को ही पहचान पाता। पता नही नही चलता है कि वह मर गया है। वहां कोई बताने वाला भी नही होता। खुद ही अहसास करना होता है कि अब जिंदा नही हैं। कोई उसकी मदद नही करता। कहीं से कोई जवाब नही मिलता। इसी कारण शरीर छूटने पर जीव बुरी तरह बेचैन होता है। इधर उधर भागता है। दोबारा अपने शरीर में घुसने की कोशिश करता है। नही जा पाता। रोते-बिलखते रिश्तेदारों, दोस्तों, परिचितों को चुप कराने की कोशिश करता है। नही कर पाता। उनसे बात करने की कोशिश करता है। नही कर पाता। उन्हें छूने की कोशिश करता है। नही कर पाता।

मृत्यु जैसी अनचाही घटना। अनजानी दुनिया। अनदेखे रहस्य। अनसुलझे सवाल। कुल मिलाकर बड़ी बेबसी। कहीं से कोई जवाब नही। कोई सहायता नही। कोई सलाह नही। कोई सांत्वना नही। कोई अपना नही। अपनेपन के लिये बार बार धरती पर लौटना पड़ता है। मगर बिना शरीर यहां किसी से कोई सम्पर्क नही हो पाता।

आत्मा, सूक्ष्म शरीर और शरीर।
तीन टुकड़ों में हुई मृत्यु तीनों को अलग कर देती है।
आत्मा पहले निकलती है। सेफ जोन में चली जाती है। स्थुल शरीर को पंचतत्व में मिला दिया जाता है।
सब कुछ भुगतने के लिये बचा सूक्ष्म शरीर।
सूक्ष्म शरीर ही जीव है। आत्मा की तरह यह भी मरता नही है। यह आत्मा नही है। बल्कि आत्मा का शरीर है।
आत्मा इसी में आकर जीवात्मा के रूप में जीवन (शरीर) धारण करती है।

सूक्ष्म शरीर के अलग होते ही शरीर मर जाता है। ब्रह्मांडीय उर्जाओं से बना यह वायवीय शरीर है। पारदर्शी होने के कारण इसके आर पार देखा जा सकता है। मन की स्पीड से चलता है। किसी भी चीज के आर पार चला जाता है। रहने के लिये इसे किसी घर, जगह की जरूरत नही। अंतरीक्ष में उड़ता या लटका रहता है। सोचने या बुलाने पर आ जाता है। भेजने पर वापस चला जाता है। बिना बुलाये कहीं नही जा सकता।
खाना, पानी सब तक पहुंच सकता है। किन्तु बिना अनुमति किसी भी वस्तु को ग्रहण नही कर सकता।

वंशजों द्वारा जब कुछ अर्पित किया जाता है। तब सूक्ष्म शरीर रूपी जीव उसे अक्षय उर्जा के रूप में ग्रहण करता है। एक दुनिया से दूसरी दुनिया तक जाने में सक्षम अक्षय उर्जा सूक्ष्म शरीर को उपचारित करती है। उसका पुनर्निमाण करती है। 10 दिन में उर्जाओं का नया शरीर तैयार हो जाता है।

पहले दिन सूक्ष्म शरीर के सिर की उर्जायें उपचारित होती हैं। सिर और उसके उर्जा अंग बनकर तैयार हो जाते हैं। उसी समय जीव को पता चल जाता है कि वंशज उनके लिये निर्धारित कर्म सम्पन्न कर रहे हैं। उनकी बेचैनी, भटकन थम जाती है। वे प्रेत पंक्ति से बाहर निकलने को तत्पर हो जाते हैं।
इसी तरह दूसरे दिन चेहरा नाक, आंख आदि। तीसरे दिन गला, बाहें, छाती आदि। चौथे दिन पेट आदि। पांचवे दिन कमर, जननांग आदि। छठे दिन जांघें, पैर आदि। सातवें दिन मुंह व शरीर के रोम रोम का उर्जा उपचार होता है। उनका पुनर्निमाण होता है। आंठवे से नवें दिन तक सूक्ष्म शरीर तैयार हो जाता है। दसवें दिन सूक्ष्म शरीर पूरी तरह सक्रिय हो जाता है। 11 वें दिन सक्रियता के कारण उसे भोजन की इच्छा होती है। 13 वीं के दिन वह खूब खाकर पुष्ट होता है।
तब देवता उसे आत्मा के साथ मिला देते हैं। आत्मा से मिलकर जीवात्मा बन जाता है।
अगले जन्म के लिये तैयार।

मृत्यु के समय अक्सर सूक्ष्म शरीर क्षतिग्रस्त होकर घायल हो जाते हैं। बहुत बार जीते जी बामारियों के कारण सूक्ष्म शरीर पहले से ही बीमार होते हैं। इसको भय, लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार जैसी भावनात्मक बीमारियां भी लगती हैं। इस कारण भी वे अगली यात्रा पर जाने में सक्षम नही बचते।
ऐसे घायल, बीमार, अक्षम सूक्ष्म शरीरों को प्रेत श्रेणी में रखा जाता है। प्रेत मतलब वे सूक्ष्म शरीर जिन्हें उर्जा उपचार की जरूरत है।
सबसे पहले उन्हें वंशजों से मदद की उम्मीद की जाती है।

आत्मा, जीवात्मा और जीव को लेकर बड़ा भ्रम हैं।
भगवान विष्णु गरुण पुराण में बताते हैं कि आत्मा को कर्मों का फल भुगतना पड़ता है। यमदूतों द्वारा उसे आग में जलाया जाता है। आरी से काटा डाता है। पीटा और मारा जाता है।
दूसरी तरफ गीता में भगवान कृष्ण ने बताया है आत्मा अमर है। वह किसी भी स्थिति में प्रभावित नही होती। उसे बनाया, बिगाड़ा नही जा सकता। काटा, जलाया नही जा सकता। मारा, पीटा नही जा सकता।
विकट भ्रम।
श्रीकृष्ण अनुसार जब आत्मा को मारा, काटा, जलाया नही जा सकता। तो यमदूत कर्मों की सजा किसे देते हैं।
शास्त्रों में बार बार जिस आत्मा, जीवात्मा को सजा दिये जाने की बात लिखी है। वह कौन है?
दरअसल शास्त्र सूक्ष्म शरीर या सूक्ष्म चेतना की बात कर रहे हैं। अनुवादकों ने बोलचाल की भाषा में मरणोपरांत उसे ही जीवात्मा या आत्मा नाम दे दिया। जबकि वे बात सूक्ष्म शरीर की कर रहे हैं।

जब यमदूत बुरे कर्मों की सजा दे चुके। तो 84 लाख योनियों में जन्म की मजबूरी क्यों आती है ? जब 84 लाख योनियों को भोग लिया। तो प्रारब्ध किस बात की सजा देते हैं ? इस सवालों पर आगे चर्चा करेंगे।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या