जीवन की चौथी दुनियाः 31

न भगवान बचे, न देवता

मानो सरसों के एक दाने में तमाम दुनियायें समा गई हों। शिव की दुनिया, विष्णु की दुनिया, ब्रह्मा की दुनिया, आदि शक्ति की दुनिया, स्वर्ग की दुनिया, नर्क की दुनिया सबको निगल लिया गया। अरबों खरबों साल बीत गये। अंधेरे में गुम आत्मा मानो सोती रही। फिर जागी। अलसायी सी इधर उधर देखा। कुछ न था। फिर से सब खत्म हो चुका था।

न भगवान बचे, न देवता। न धरती बची, न पहाड़। न आकाश बचा, न पाताल। न ग्रह बचे, न नक्षत्र। न लोक बचे, न परलोक। न स्वर्ग बचा, न नर्क। न काल बचा , न समय। न दिन बचा, न रात। न साल बचे, न युग। न हवा बची , न पानी। न आग बची, न बर्फ। न सूरज बचा, न प्रकाश। न नदियां बचीं , न समुद्र। न दिशायें बचीं, न दूरी। न पेड़ बचे, न पौधे। न इंशान बचे, न जीव। कुछ बचा तो हर तरफ घनघोर अंधेरा। उसमें गुम एक अकेली आत्मा।

कौन निगल गया इन सबको? प्रीति की आत्मा ने अचम्भित होकर पूछा। उन्हें यकीन ही नही हो रहा था इन बातों पर। मेरी पत्नी प्रीति जो कुछ समय पहले तक मेरे साथ बैठकर दुनियादारी की बातें करती थीं। मेरे लिये उनका बिना शर्त प्रेम मृत्यु तक कम न हुआ। उनकी अथक सेवा आज भी मेरी यादों को नम कर देती है। उनका रुठना और खुद ही मुझे मनाना। प्रेम की उल्टी धारा थी। किन्तु सच्चा प्रेम तो यही है। मै उन्हें मनाऊं। इस बात का वे कभी इंतजार नही करती थीं। खुद ही आकर Sorry बोलतीं। इसका मतलब यह नही कि मेरी गल्ती नही होती थी। पति पत्नी के रिश्ते में सही गलत दोनो तरफ से घटता रहता है। अहम का टकराव होता ही रहता है। उन्हें पता था मै लडुंगा नही। चाहे मेरी गलती हो या न हो। बात बढ़ी तो चुप हो जाउंगा। ऐसे में रुठने का मतलब है Love Time का नुकसान। ये नुकसान उन्हें बड़े घाटे वाला लगता था। कहतीं आपसे बात किये बिना मै बिल्कुल नही रह सकती।

शरीर छूट गया। अभी भी मुझसे बात किये बिना वे रह नही पातीं। शिव शिष्या होने के नाते उन्होंने सूक्ष्म शरीर से शिव धाम में जाने की तैयारी की है। मैने इसके लिये उन्हें सम्बंधित अनुष्ठान सम्पन्न कराये हैं। हमारे बीच दुनियाओं की दूरी है। मै धरती लोक में हूं। वे देव लोक में। हमारे शास्त्र बहुत समृद्ध हैं। उनके विधानों को अपनाकर हम दोबारा एक दूसरे के सम्पर्क में आये। मेरे सहयोग से उन्होंने सूक्ष्म चेतना के द्वारा शिव गुरू को प्राप्त करने के अनुष्ठान पूरे कर लिये। अब आगे की यात्रा को तैयार हैं। उनके प्रस्थान में कुछ समय बाकी है। सो फुर्सत के समय मेरे पास आ जाती हैं। लोक परलोक की बातें करती हैं। कुछ वे बताती हैं। कुछ मुझसे पूछती हैं। इस बार उन्होंने पूछा देवी देवता कैसे पैदा होते हैं? क्या कभी वे खत्म भी होते हैं। हम उसी विषय पर चर्चा कर रहे हैं।

उन्होंने पूछा सारे संसार को कौन निगल गया। कौन ऐसा है जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश को खत्म कर गया? किसने आदि शक्ति को गायब कर दिया?

जिसने सबको बनाया, उसी ने खत्म कर दिया। मैने बताया। फिर बनाया, फिर खत्म किया। ऐसा बार बार होता जा रहा है। पहले इसे शास्त्र ही बताते थे। अब साइंस भी मानता है। साइंस इसे बिग बैंग थ्योरी बताता है। किन्तु विज्ञान के पास इस विषय में वास्तविक जानकारी की बहुत कमी है। साथ ही उनकी जानकारी में कल्पनायें ज्यादा हैं। जबकि शास्त्रों में बहुत विस्तार से जानकारी उपलब्ध है। सो हम शास्त्रों के हिसाब से बात करेंगे।

पिछले महाप्रलय के बाद हजारों युगों से हर तरफ घुप अंधेरा था। उसके बीच गुमनाम सी एक आत्मा कहीं खोई या कहिये सोई पड़ी थी। अनंत अंधकार के बीच फंसा बहुत छोटा अस्तित्व। माने तो उसे सरसों के आकार का भी मान सकते हैं। विद्वान उस पहली आत्मा को पहली चेतना के रूप में मानते हैं।

नन्ही आत्मा कुनमुनाई। फिर जागी। अलसायी सी इधर उधर देखा। कुछ न था। फिर से सब खत्म हो चुका था। हर तरफ हत्यारिन डार्क एनर्जी फैली थी। आत्मा ने याददास्त पर जोर डाला। अपनी उर्जा, अपनी शक्तियां याद आईं। मिट चुकी भरी-पुरी दुनिया याद आई। सोचा फिर से दुनिया बसाई जाये। लेकिन शैतान की काली छाया सी फैली डार्क एनर्जी को कैसे चीरा जाये। उसके बीच दुनिया की नीव कैसे रखी जाये। बड़ी चुनौती थी।

आत्मा ने आत्मबलिदान का सा साहसी निर्णय लिया। एक से अनेक हो जाने की कामना के साथ खुद में विस्फोट कर दिया। दो भागों में बंट गई। अर्ध अर्धनारीश्वर हो गई। आधा पुरुष आधी नारी। स्रष्टि निर्माण के लिये अनिवार्य तत्व। डार्क एनर्जी के खिलाफ अब दो शक्तियां खड़ी हो गईं। आत्मा रुकी नही। एक से अनेक हो जाने के अपने इरादे को विस्तार दिया। इसके लिये डार्क एनर्जी को ईंधन के रूप में इश्तेमाल किया। और विस्फोट हुए। पहली आत्मा से अनेकों आत्मायें निकलने लगीं। विद्वानों ने पहली आत्मा को परम आत्मा और फिर परमात्मा के नाम से पुकारा। उससे निकलने वाले अन्य उर्जा पुंजों को परमात्मा का अंश आत्मा बताया।

अर्धनारीश्वर में से जो उर्जायें पुरुष तत्व से निकल रही थीं। उनके सभी गुण परम आत्मा वाले ही थे। अविनाशी, अकाट्य। इसी कारण आत्मा आज भी अजर, अमर, अकाट्य, अप्रभावी है। हम, आप भी उन्हीं में से एक हैं। विस्तार की प्रक्रिया में डार्क एनर्जी को शामिल कर लिया गया था। सो उग्र स्वभाव के मुताबिक उसने विस्फोटों को अनियंत्रित कर दिया। परमात्मा के भीतर से आत्मायें निकलती चली जा रही थीं। अनियंत्रण और अफरा-तफरी का खतरा पैदा हो गया।

अर्धनारीश्वर का नारी तत्व आदि शक्ति के रूप में सक्रिय हुआ। विद्वानों ने प्रथम रचनात्मक उर्जा होने के कारण नारी तत्व को आदि शक्ति कहा। आदि शक्ति की स्रजनात्मक उर्जाओं ने कमाल की जिम्मेदारी निभाई। अपनी उर्जाओं से सूक्ष्म शरीर बनाने शुरू किये। हर आत्मा के लिये एक सूक्ष्म शरीर अधिकृत किया गया। इस तरह आत्मायें जीवात्मा में बदलीं। अब वे जन्म और जिम्मेदारी के लिये तैयार थीं।

जीव निर्माण के साथ ही आदि शक्ति की उर्जाओं से ही स्रष्टि निर्माण भी हुआ। डार्क एनर्जी के अंधकार को चीरते हुए ग्रह, नक्षत्र, आकाश गंगायें, तारे, सितारे अंतरीक्ष में चमकने लगे। लोक, परलोक बनें। उनमें जीवन विस्तार हुआ। जीवन के लिये सभी जरूरी चीजें बनीं। एक बार फिर संसार बन कर तैयार हो गया।

अब बारी थी संसार चलाने की। यह संसार बनाने से भी अधिक संवेदनशील काम था। पहली आत्मा यानी परमात्मा ने अपनी तप उर्जाओं से संसार के संचालक बनाने शुरू किये। उसके लिये कुछ आत्मायें अलग कीं। उनके भीतर अलग क्षमताओं की उर्जायें स्थापित कीं। एक आत्मा को बड़ी उर्जाओं से सुसज्जित किया। उसने पहली आत्मा यानी परमात्मा से अपना परिचय पूछा। परमाात्मा ने उनका नामकरण विष्णु नाम से किया। संसार संचालन के लिये उन्हें विशेष तप से उर्जायें अर्जित करने की सलाह दी। वे तब को चले गये। उनमें डार्क एनर्जी के उपयोग की भी क्षमता डाली। जिसके कारण वे भी आसमानी रंग के हो गये। वे त्रिदेवों में शामिल हुए।

डार्क एनर्जी के उपयोग की क्षमता के कारण स्वयं परमात्मा भी आसमानी रंग के हो गये। विद्वानों ने उन्हें शिव नाम दिया। महेश के नाम से वे त्रिदेव बनें। सृष्टि निर्माण उनकी प्रेरणा से विष्णु जी ने ब्रह्मा नाम की शक्ति उत्पन्न की। उन्हें त्रिदेवों में स्थान मिला। वे विधाता कहलायें।

त्रिदेवों के बाद अन्य जिम्मेदारियों के लिये कुछ अन्य आत्माओं को विशेष उर्जाओं से भरा गया। जिससे इंद्र, सूर्य, अग्नि, जल, वायु, आकाश, पृथ्वी सहित अन्य देवताओं की उत्पत्ति हुई। उन्हें अपनी जिम्मेदारियां निभाने के लिये अलग अलग तरह के तप करने को कहा गया। तप से प्राप्त उर्जाओं से ही वे देव जिम्मेदारियों को निभाने में सक्षम हुए। सभी देव तप से प्राप्त ब्रह्मांडीय उर्जाओं द्वारा ही देव कार्य करते हैं।

देवता अपनी सुविधानुसार अपनी दुनिया, अपने लोक का निर्माण करते हैं। शिव की दुनिया, विष्णु की दुनिया, ब्रह्मा की दुनिया, आदि शक्ति देवी की दुनिया, शिव लोक, बैकुंठ लोक, इंद्र लोक, स्वर्ग लोक, नर्क लोक, यमलोक, देव लोक सहित अनेकों लोक, परलोक बसाये जाते हैं। देव शक्तियां वहां से अपने काम करती हैं।

संसार बना। संसार चल पड़ा। पहली आत्मा फिर तप में लीन हो गई। लाखों युगों तक ऐसे ही चलेगा। किसी भी चीज या स्थान के निरंतर उपयोग से प्रदूषण पैदा होता है। भौतिक भी, मानसिक भी। जो बढ़ते बढ़ते कभी ऐसे स्तर तक पहुंच जाता है, जहां से खत्म नही हो सकता। भयानक प्रदूषण के चलते संसार चलना मुश्किल होने लगता है। तब पहली आत्मा खुद को छोटा करके अंधकार में छिपा लेती है। फिर महाप्रलय करती है। सब सिकुड़ने लगता है। सब पहली आत्मा में समाने लगता है। सारा संसार समा जाता है। हर तरफ फिर घनघोर अंधकार।

लाखों युगों का फिर इंतजार।
अंधकार के बीच नन्हीं अकेली आत्मा में फिर कुनमुनाहट। विस्फोट। संसार निर्माण फिर शुरू।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या