शिवलोक से अलग है शिव की दुनिया

कैलाश धाम में शिव की दुनिया नही है। शिव की दुनिया ब्रह्मांड के सबसे हायर डाइमेंशन में है। वहां जाने की क्षमता देवी देवताओं में भी नही। ब्रह्मा, विष्णु को भी शिव की दुनिया में जाने के लिये अतिरिक्त शक्ति खर्च करनी होती है। वहां देवताओं का प्रवेश नही। वहां मृत्यु का प्रवेश नही। वहां काल (समय) का प्रवेश नही। वहां प्रलय का प्रवेश नही। वहां ग्रह-नक्षत्रों का प्रवेश नही। वहां दुखों का प्रवेश नही। वहां पाप का प्रवेश नही। वहां इंद्र का प्रवेश नही। जो वहां जाता है विशेष अनुमति लेकर ही जा पाता है।
मुझे शिवलोक जाना है। क्या करना होगा? देवताओं की दुनिया में मौजूद मेरी पत्नी प्रीति देवी ने सावन के पहले दिन अपनी कामना जताई। कुछ सवाल भी पूछे। शिवलोक की यात्रा में ऐसा क्या है जिसे देवता भी पार नही कर पाते? कैलाश पर्वत और शिव लोक में क्या अंतर है? गुरू पूर्णिमा के दिन उन्होंने भगवान शिव को दोबारा गुरू स्वरूप में धारण किया। अब उनके लोक जाने की इच्छा ले बैठीं। मृत्यु से पहले भी उन्होंने भगवान शिव को गुरू धारण किया था। शरीर के साथ धरती की यादें मिट गईं। बीती गुरू पूर्णिमा से 2 दिन पहले मैने उनसे गुरुओं के गुरु शिव गुरु के बारे में चर्चा की और बताया कि उन्होंने भी भगवान शिव को अपना गुरू बना रखा था। उनसे बातें करती थीं। अपने सवालों के जवाब लेती थीं। कामनायें पूरी कराती थीं। समस्याओं के समाधान लेती थीं।
क्या बिना शरीर के भी सूक्ष्म शरीर के द्वारा भगवान शिव को गुरू रूप में धारण किया जा सकता है। जवाब हां में मिलने पर प्रीति ने मुझसे शिव गुरु को धारण करने का विधान सम्पन्न कराने का आग्रह किया। मैने जब तक उन्हें दोबारा शिव शिष्यता का विधान नही कराया तब तक रोज कई बार कहती रहीं। भगवान शिव को दोबारा गुरू रूप में धारण करके बहुत खुश हैं। अब उन्हें पक्का विश्वास हो गया है कि देवताओं से किया संकल्प हर हाल में पूरा कर लेंगी। साथ ही उनके मन में शिव गुरू से मिलने की इच्छा जाग गई।
सावन के पहले दिन मुझसे शिवलोक जाने की इच्छा जताई। उन्हें लग रहा था कैलाश पर्वत पर आना जाना कोई मुश्किल काम नहीं। क्योंकि देवताओं की दुनिया तक पहुंची अन्य जीवात्माओं की तरह उन्हें भी मन की गति से कहीं भी आने जाने की क्षमता प्राप्त है। बस कैलाश के उन गुप्त रास्तों के बारे में जानना है जो पहाड़ों के भीतर भगवान शिव की दुनिया में जाते हैं।
शिव लोक और शिव की दुनिया दोनो अलग हैं। मैने उन्हें बताया। देवताओं की दुनिया में उन्होंने इस बात का सत्यापन किया। कैलाश पर्वत जिसे हम शिव लोक कहते हैं। वह धरती पर भगवान शिव के कार्य क्षेत्र का मुख्यालय है। सुरक्षा कारणों से वहां आवाजाही प्रतिबंधित है। सामान्यतः देवी देवता भी बिना काम के आ जा नही सकते। उन्हें भी कैलाश आने का उचित कारण बताना पड़ता है। शिव व्यवस्था में भक्ति से शिव को प्राप्त करने वालों का स्थान देवताओं से भी ऊपर होता है। किन्तु उनको भी वहां जाना मना है। क्योंकि इससे शिव जी का कामकाज प्रभावित होता है। उनका ध्यान भक्तों की तरफ चला जाता है।
जो लोग कैलाश की यात्रा पर जाते हैं। वे दरअसल पहाड़ों की यात्रा पर जाते हैं न कि शिव लोक में। इसे ऐसे समझें जैसे कोई देश के प्रधानमंत्री से मिलना चाहे। उसे बताया गया दिल्ली देश की राजधानी है। प्रधानमंत्री का मुख्यालय है। वहीं वे मिलेंगे। वह दिल्ली गया। किन्तु इसका मतलब यह नही कि वह सीधे प्रधानमंत्री के पास पहुंच गया। सुरक्षा कारणों से प्रधानमंत्री तक पहुंचने के लिये उन्हें तमाम कठिन पड़ाव पार करने पड़ेंगे। जो सबके लिये सम्भव नही। सिर्फ दिल्ली घुम कर लौट गये लोग यह नही कह सकते कि प्रधानमंत्री उन्हें मिल गये।
इसी तरह सिर्फ कैलाश पर्वत चढ़कर लौट गए लोग यह नही कह सकते कि उन्हें शिव मिल गये। वैसे तो शिव को पाना बहुत सरल है। उसके लिये किसी दुर्गम जगह जाना बिल्कुल भी जरूरी नही। बस मनोभावों को निर्मल करें। मन को शिव पर फोकस करें। गारंटी के साथ शिव मिल जाएंगे। इसके लिये पर्वतारोहण अनिवार्य नही। किन्तु कैलाश जाना निरर्थक है ऐसा भी नही। कार्मिक लिहाज से यह अध्यात्मिक पराक्रम है। जिसके अपने फायदे हैं। ज्ञान और धार्मिक यात्रायें मिलकर ऋषि मन का निर्माण करते हैं। जो जीवन की श्रेष्ठ उपलब्धियों में से एक है।
अगर कैलाश धाम में शिव की दुनिया नही है तो कहां है? प्रीति जी का सवाल था।
कैलाश धाम में शिव की दुनिया नही है। मैने बताया। शिव की दुनिया ब्रह्मांड के सबसे उच्च आयाम में है। वहां जाने की क्षमता देवी देवताओं में भी नही। ब्रह्मा, विष्णु को भी शिव की दुनिया में जाने के लिये अतिरिक्त क्षमता अर्जित करनी होती है। वहां देवताओं का प्रवेश नही। वहां मृत्यु का प्रवेश नही। वहां काल (समय) का प्रवेश नही। वहां प्रलय का प्रवेश नही। वहां ग्रह-नक्षत्रों का प्रवेश नही। वहां दुखों का प्रवेश नही। वहां पाप का प्रवेश नही। वहां इंद्र का प्रवेश नही। जो वहां जाता है विशेष अनुमति लेकर ही जा पाता है।
वह शंकर की दुनिया नही। वह शम्भू की दुनिया नही। वह कैलाश पति की दुनिया नही। वह साम्ब सदाशिव की दुनिया है। जहां के शिव (कर्पूर गौरम्) कपूर की तरह गोरे हैं। इतने गोरे कि उनके भीतर से निकलने वाले प्रकाश से शिव की दुनिया प्रकाशित होती है। इस कारण वहां रोशनी के लिये सूर्य-चंद्र की जरूरत नही। बाकी जगहों पर शिव की क्षवि नीले वदन वाली दिखाई देती है। ये उस दुनिया के शिव नही हैं।
जब ब्रह्मांड प्रलय का शिकार होता है तब भी शिव की दुनिया पर कोई असर नही होता। शिव की दुनिया अविनाशी है। वहां सांस लेने के लिये प्राण वायु की जरूरत नही होती। पीने के लिये पानी की जरूरत नही होती। शीतलता के लिये हवा की जरूरत नही होती। ताप के लिये अग्नि की जरूरत नही होती। अंतरीक्ष को ढकने के लिये आकाश की जरूरत नही होती। चलने के लिये वाहनों की जरूरत नही होती। खाने के लिये भोजन की जरूरत नही होती। जीने के लिये औषधियों की जरूरत नही होती। आराधना के लिये देवों की जरूरत नही होती। क्योंकि वहां देवों के देव महादेव हैं।
वह दुनिया शानदार है। वह ब्रह्मांड की सबसे मंहगी दुनिया।
तो वहां कौन जा सकता है? मेरी पत्नी प्रीति जी की जिज्ञासा चरम सीमा तक पहुंच गई। वे शिव की दुनिया के सारे रहस्य जाने लेने को आतुर हो गईं। पूछने लगीं। किन चीजों से बनी है वह दुनिया? वहां का वातावरण कैसा है? जब हवा नही वहां के वातावरण में क्या बहता है? पेड़ पौधे कैसे पनपते हैं? लोग कैसे रहते हैं? किसके लिये बना है वह लुभावना संसार? और सबसे बड़ा सवाल जब देवी देवता नही तो कौन जा सकता है वहां? आगे हम शिव की दुनिया के इन्ही रहस्यों पर चर्चा करेंगे।
शिव शरणं।
Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या