देवताओं द्वारा साधकों का चुनाव

एक श्रेणी के होने के बाद भी देवता मनुष्यों से ऊपर उठ गये। क्योंकि उनका प्रारब्ध मजबूत है। पूर्व जन्मों के कर्म उनका साथ दे रहे हैं। कर्मों की उर्जायें उनकी शक्ति बन गईं। वे विशेष हो गये। वे देवता हो गये। फिर भी मनुष्यों के बिना उनका काम नही चलता। इसलिये वे अपने लिये सक्षम साधकों का चयन करते हैं। उनसे खुद को सिद्ध कराते हैं।
आत्मा के रूप में मेरी पत्नी प्रीति का सवाल था कि मनुष्य तो देवताओं की सहायता लेते हैं। परन्तु क्या देवताओं को भी मनुष्यों की सहायता लेनी पड़ती है? हां तो वे इसके लिये किन लोगों को चुनते हैं?
हां देवताओं को भी मनुष्यों की सहायता की जरूरत पड़ती है। अक्सर पड़ती है। मैने बताया। दरअसल देवता भी मनुष्यों की ही श्रेणी के प्राणी हैं। शास्त्र बताते हैं कि 84 लाख योनियों में 4 लाख प्राणी मनुष्य श्रेणी के हैं। देवता भी उन्हीं में हैं। वे मनुष्य से देवता बने। किन्तु सारे लोग देवता बन जायें। ऐसा नही है।
देवता बनना आसान नही। उसके लिये प्रारब्ध बहुत मजबूत होना चाहिये। जन्मों की संचित उर्जायें देवता बनाती हैं। यह सच है कि मनुष्यों द्वारा किये गये पूजा, पाठ, होम, यज्ञ, जप साधनाओं से दवताओं की उर्जायें बढ़ती हैं। उनकी शक्तियां बढ़ती हैं। बदले में देवी, देवता लोगों की कामनायें पूरी करते हैं। अपने भक्तों के रूप में उनकी हिफाजत करते हैं।
इसका मतलब यह नही कि देवतागिरी सिर्फ मनुष्यों के बलबूते ही चलती है। उनका मुख्य आधार प्रारब्ध की उर्जायें होती हैं। जो देवताओं द्वारा युगों तक अच्छे कर्म करके जुटाई गईं। प्रारब्ध में जुड़ी सकारात्मक उर्जाओं के खत्म हो जाने पर देवता शिथिल होने लगते हैं। भगवान द्वारा उन्हें जो जिम्मेदारियां सौंपी गईं उनसे देवता अपना ध्यान नही हटा सकते। इसलिये उनके पास अपनी उर्जाओं, शक्तियों को बढ़ाने के लिये साधना, तपस्या का पर्याप्त समय नही होता।
तब वे मनुष्यों के बीच अपने साधक चुनते हैं। जो उनकी साधना करें। उन्हें सिद्ध करें। देवता उनकी कामनायें पूरी करें। बदले में साधकों द्वारा की पूजा, पाठ, साधना, मंत्र जप, होम, यज्ञ आदि से देवताओं को उर्जा अंश मिलता है। वे उनसे संतुष्ट और उर्जाओं के स्तर पर पुष्ट होते हैं। साथ ही सिद्ध साधकों के द्वारा देवता लोक कल्याण कराते हैं। जिनके लाभार्थियों की सदभावनाओं (दुवाओं) की उर्जायें भी देवताओं को मिलती हैं। उनसे भी श्कितयों में बढ़ोत्तरी होती है।
साधनायें तो तमाम लोग करते हैं। किन्तु जिनका चयन खुद देव शक्तियां करती हैं। उनकी सिद्धि लगभग तय होती है। साथ ही वे लम्बे समय तक सिद्धियों से लोगों की सेवा करते हैं। उनके देवता लगातार उनकी सहायता करते हैं। अहंकार उत्पन्न होने पर देवता साधक को छोड़ देते हैं।
देवता किन साधकों को चुनते हैं? वे उनमें किन खास बातों को देखते हैं? प्रीति ने पूछा।
साधक की सरलता देवताओं की पहली पसंद होती है। मैने बताया। धार्मिक होना, ध्यान करना, मंत्र जप की विधि आना, घंटों आसन पर बैठे रहना, पूजा, पाठ, विधि विधान का पक्का होना। यह सब देवताओं की पसंद का हिस्सा नही। ये क्रियायें हैं। जो साधकों को आनी ही चाहिये।
देवताओं द्वारा साधक के चयन का यह आधार नही होता। वे साधक की चेतना का स्तर देखते हैं। उसका धैर्य देखते हैं। उसकी विनम्रता देखते हैं। उसकी सेवा भावना देखते हैं। उसके दया भाव देखते हैं। उसकी क्षमा क्षमता को देखते हैं। इन गुणों वाले साधक देवताओं की पहली पसंद होते हैं। वे उन्हें साधना के लिये प्रेरित करते हैं। उनकी साधना की परिस्थितियों का निर्माण करते हैं। साधन तैयार करते हैं। सिद्धि हेतु खुद प्रस्तुत होते हैं। देवता साधकों की परीक्षा नही लेते सिर्फ उनके धैर्य का स्तर नापते हैं।
कैसे पता चले कि किसी देवता ने किसी साधक को अपनी साधना के लिये चुना है? प्रीति ने पूछा।
ऐसे साधकों के अंदर ढ़ेरों बदलाव आ जाते हैं। मगर बाहर से वे पहले जैसे ही दिखते हैं। मैने बताया। उनकी चेतना का स्तर अचानक उठ जाता है। लोगों को दुनिया चीजों, वस्तुओं के रूप में दिखती है। किन्तु ऐसे साधकों को दुनिया का उर्जा स्वरूप दिखने लगता है। उनका रहन सहन बदल जाता है। दिखावा, बराबरी की बजाय वे प्राकृतिक जरूरतों पर फोकस करते हैं। कीमत की बजाय वे चीजों का आकलन गुणवत्ता के आधार पर करने लगते हैं। उन्हें कुछ भी मंहगा, सस्ता नही लगता। जो पहुंच में है उसे स्वीकार करते हैं। जो पहुंच में नही उनकी तरफ ध्यान ही नही देते।
साधनायें तो लाखों करोड़ों करते हैं। किन्तु देवताओं द्वारा चुना गया साधक करोड़ों में एक होता है। देवता खुद उनकी अध्यात्मिक क्षमताओं का उत्थान करते हैं।
क्या कोई भी साधक खुद को देवताओं की पसंद का साधक बना सकता है? प्रीति ने पूछा।
हां। मैने कहा। फिर उन्हें इसका तरीका बताया।
क्रमशः।
Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या