जीवन की चौथी दुनियाः 27

विदाई की तड़पन

मै तो योग करुंगी। योगिनी बनुंगी। प्रीति की आत्मा ने अपना फैसला सुनाया। सूक्ष्म शरीर से की जा रही उनकी साधनायें सिद्ध होने को हैं। ऐसे में विकल्प चुनना है। मोक्ष चुनें। या शिव भक्ति से युक्त नया जन्म चुनें। या योगिनी स्वरूप चुनें। देवताओं की दुनिया में रुकने के बदले उन्होंने अपनी आत्मा के उत्थान का संकल्प लिया था। आत्मा उत्थान करके योग-साधना से योगिनी बनें। योगिनी बनकर देव सेवा करें। लोक सेवा करें।

खूब सोच समझ कर फैसला लो। मैने कहा, कोई मजबूरी नही है। कोई जल्दी नही है। शिव शिष्या होने के नाते तुम्हें आराम से निर्णय लेने की आजादी है। प्रीति मेरी पत्नी थी। मृत्युंजय योग के हजारों साधकों की गुरू मां थीं। 29 मई 2026 को शरीर छोड़ गईं। अब पितृ लोक पार कर देवताओं की दुनिया में हैं। अगने जन्म के लिये सभी को वहां जाना होता है। प्रीति ने तुरंत अगला जन्म लेने की बजाय आत्मा उत्थान का विकल्प चुना। वहां सभी को इसका मौका मिलता है। आत्मा उत्थान का उद्देश्य और मार्गदर्शक बताना पड़ता है। वहां साधना कराने वाले मार्गदर्शक उपलब्ध नही होते। प्रीति ने उद्देश्य योगिनी स्वरूप में देव सेवा बताया। मार्गदर्शक के रूप में मेरा परिचय दिया। देवताओं की दुनिया में उनकी बात मान ली गई। तभी से वे मेरे सम्पर्क में हैं। मेरी बताई सूक्ष्म साधनायें कर रही हैं।

शरीर छोड़ गये लोगों में जो मोह-माया से मुक्त होते हैं। जीवन में सदाचरण अपनाया होता है। उन्हें ऐसे अवसर मिलते हैं।
या फिर धरती पर जिनके वंशज मृतात्मा की उर्जाओं के उत्थान हेतु अनुष्ठान करते हैं। उन्हें ऐसे अवसर मिलते हैं। प्रीति के सूक्ष्म शरीर को सक्षम बनाने के लिये हमने हर दिन अनुष्ठान सम्पन्न किये। अभी भी कर रहे हैं। जिसके द्वारा उनसे सम्पर्क सम्भव हुआ।

इसी सावन उनकी शिव धाम जाने की तैयारी है। उसके लिये लोभ, मोह, अहंकार रहित शिव भक्ति और ध्यान साधना निरंतर जारी है। उन्होंने भगवान शिव को गुरू रूप में धारण किया है। शिव गुरू के समक्ष पहुंचकर आगे की यात्रा तय होगी।

अगर मुझसे कोई गलती हो गई तो क्या होगा? प्रीति ने आशंका व्यक्त की। जोकि स्वाभाविक थी। शिव की दुनिया में पहुंचना देवताओं के लिये भी असम्भव सा होता है। ऐसे में एक जीवात्मा का वहां पहुंचने का इरादा हजारों सवाल खड़े कर सकता है। मनोबल विचलित हो सकता है।

ऐसा क्यों सोच रही हो। मैने पूछा। जो विधान तुम्हें बतायें हैं उन्हें तो कर रही हो न। फिर तुम अपना कांफीडेंस कमजोर क्यों कर रही है। क्या उनके अभ्यास में कुछ छूट गया।

नही छूटा कुछ नही। वे बोलीं। बस मन में अलग सा डर आ जा रहा है।

डरने की कोई बात नही, मै हूं न। मैने बताया। तुमने ग्यारहवें चरण तक की सारी प्रैक्टिस एकदम सटीक की है। अब जब तुम मेरे पास आती हो तो तुम्हारे साथ देव सुगंध होती है। कई बार तुम्हारे साथ देव संगीत सुनाई देता है। इसका मतलब 11वें चरण तक की सिद्धियां तुम्हें मिल चुकी हैं। अब एक ही चरण तो बचा। उसमें सिर्फ शिव गुरू को ही तो मनाना है। वे तो मान ही जाएंगे।

मेरी बातों से प्रीति का हौसला बढ़ गया। थोड़ी अचम्भित सी बोली सच में मेरे से देव सुगंध आने लगी है! मेरे पास देव संगीत सुनाई देता है! मुझे तो पता ही नही चला। बस जो मंत्र आपने कराये हैं हर समय लगता है वे मेरे आस पास बज रहे हैं। अक्सर उन्हीं में खो जाती हूं।

हांजी, मैने बताया। ये सब हो रहा है तुम्हारे साथ। तभी तो अब आते ही मुझे पता चल जाता है तुम यहीं हो। मैने बताया। पहले पता ही नही चलता था कब आई, कब गई। जासूसों की तरह दबे पांव आ जाती थी। कोई बात बुरी लगी तो बिना पता लगे चली जाती थी।

ए जी आपने ही तो मुझे सिखाया था जब कोई बात अच्छी न लगे तो बहस करने की बजाय चुप हो जाओ या वहां से हट जाओ। उन्होंने जीवित अवस्था में मेरी बताई बात कही।

अच्छा जी, ये तो बड़ा ही अच्छा है। जीते जी भी और मरने के बाद भी। मैने कहा। मगर क्या तुम्हें जिंदा रहने के समय की बातें याद हैं।

सब तो नही। किन्तु मन पर जोर पड़ने पर कुछ बातें याद आ जाती हैं। फिर वे याद रहती हैं। उन्होंने बताया।

बढ़िया है। मैने पूछा। अब कोई आशंका या दुविधा तो नही।

नही कोई दुविधा नही। उन्होंने कहा। आपके कराये विधान सिद्ध हो चुके हैं तो शिव दूतों की और उनके विमान की सहायता मिल ही जाएगी। उसके बाद शिव गुरू की कृपा से सब कुछ अपने आप हो रहा होगा। मुझे तो कुछ करना ही नही। फिर भी कुछ समझ नही आएगा तो आपसे समझती जाउंगी।

ये नही हो सकेगा। मैने बताया।

अरे, क्यों ये क्यों नही हो सकेगा। मेरी बात ने उन्हें चौंकाया।

क्योंकि शिव धाम के विमान में जाते ही तुम मुझे भूल जाओगी। तुम्हारी भक्ति की कमांड पूरी तरह शिव गुरू के हाथ में होगी। मैने बताया। उनकी सत्ता में वही सम्पूर्ण गुरू होंगे। वहां मेरी जरूरत नही।

क्या कह रहे हैं आप? वे विचलित सी हो गईं। पूछा, तो आप मुझे याद रखेंगे या नही।

क्या फर्क पड़ता है? जिसे तुम भूल गई हो, उसकी यादों में रहो या न रहो। मैने कहा।

बच्चे, साधक ये सब मुझे याद रहेंगे या नही। उन्होंने पूछा।

वे सब याद रहेंगे। मैने बताया। जरूरत पड़ने पर तुम उनसे मिल भी सकोगी। उनकी सहायता और सुरक्षा भी कर सकोगी। मगर मुझे भूल जाओगी। एक साथ दो गुरू सक्रिय रहे तो तुम्हारी आगे की यात्रा प्रभावित हो सकती है। शिव गुरू से बड़ा तो कोई है नही। इसलिये उनके रहते तुम्हारी यादों से मै हमेशा के लिये मिट जाउंगा। तुम्हारे हित के लिये यह जरूरी होगा।

गुरू न सही पति स्वरूप में तो आप मुझे याद रह ही सकते हैं। उन्होंने ब्याकुलता के साथ पूछा। आपने सात जन्मों तक साथ निभाने का मुझसे वादा किया था।

नही, इसकी सम्भावना नही। मैने बताया। हम कभी मिले थे। जीवन साथी थे। गुरू- शिष्या भी थे। तुम्हें कुछ याद नही रहेगा।

तो मुझे कुछ नही चाहिये। वे एकदम बिफर पड़ी। न भगवान चाहिये. न मुक्ति चाहिये, न नया रूप चाहिये। मै आपके बिना नही रह सकती। न ही मै कहीं जाउंगी। भले ही भूत-प्रेत बनकर भटकना पड़े। किन्तु आपसे दूर नही जा सकती। आपको नही भूल सकती।

मुझे पता था, अब चली चला की बेला है। मेरे लिये मन में जो लगाव है उसके खत्म हुए बिना उनका शिव की दुनिया में प्रवेश नही होगा। मुझे भूले बिना सद्गति नही होगी। इसीलिये आठवें चरण के अनुष्ठान में उनको बताये बिना उनसे वे विधान कराये। जिससे जरूरत पड़ने पर उनके मन से मेरा मोह खत्म हो जाये। बिना छटपटाहट वे मुझे भूल जायें।

अरे ठकुराइन ऐसे नही करते। उनका मन बिगड़ गया था। ऐसे में उन्हें शांत कराना बड़ा मुश्किल था। सो मैने उन्हें ठकुराइन कहकर सम्बोधित किया। अपने लिये ठकुराइन शब्द सुनकर वे खुश हो जाती हैं।

किस बात की ठकुराइन। वे बोलीं, आपको भूल जाउंगी तो मै ठकुराइन हूं ये भी भूल जाउंगी।

मुझे लगा वे रो पड़ेंगी। पूछा तुम रो रही हो क्या?

हां। थोड़ा ठहरीं। और कहा मै कहीं नही जाउंगी।

परेशान न हो। मैने कहा, जब तुम योगिनी स्वरूप पा जाओगी। तब मै तुम्हें पत्नी रूप में सिद्ध करूंगा। सिद्ध होते ही तुमको मै याद आ जाउंगा। फिर हम जब तक चाहें पति पत्नी की तरह साथ रह सकेंगे।

नही, मुझे कोई देवी रूप नही लेना। वे रो रही थीं। बोलीं, आपको छोड़कर कहीं नही जाउंगी।

और फिर खामोशी। देव सुगंध चली हो गई। देव संगीत बंद हो गया।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या