भगवान के अवतारों की दुनिया

आज प्रीति के सवाल ब्रह्मांड की संचालक शक्तियों के बारे में थे। दुनिया चलाने वालों के बारे में थे। क्या भगवान और देवता में फर्क होता है? अवतार लेने के लिये भगवान को किन शक्तियों की जरूरत होती है? देवताओं को शक्तियां कहां से मिलती हैं? क्या देवता अपने लिये मनुष्यों की शक्तियों का उपयोग करते हैं? क्या देवता खुद को सिद्ध कराने के लिये साधकों को स्वयं चुनते हैं। हां तो क्यों? वे किन लोगों को अपने लिये चुनते हैं? ब्रह्मांड चलाने के लिये किसकी जिम्मेदारी सबसे अधिक होती है। डार्क एनर्जी देवताओं की दुश्मन है या दोस्त?
ब्रह्मांड चलाने के लिये सबसे अधिक जिम्मेदारी भगवान की होती है। त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश भगवान हैं। उनमें ब्रह्मा का काम अत्यधिक संवेदनशील है। उन पर कब्जा हो जाये तो सृष्टि का माडल बनाया बिगाड़ा जा सकता है। सब कुछ उलट पुलट किया जा सकता है। इसलिये उन्हें यह कहकर पर्दे के पीछे डाल दिया गया कि ब्रह्मा दोषयुक्त हैं। उनकी पूजा नही होगी। ध्यान रखें पूजा-पाठ, साधना, तप से भगवान को कब्जे में यानी अपने अधीन किया जा सकता है।
बोलचाल की भाषा में समझने के लिये मान लीजिये परमात्मा ब्रह्मांड के मालिक हैं। भगवान एक पद है। परमात्मा ने ब्रह्मांड संचालन के लिये अपने से निकली तीन आत्माओं को भगवान के पद के लिये चुना। उन्हें खास ब्रह्मांडीय उर्जाओं से तैयार किया। क्षमतावान बनाया। उन्हें डार्क एनर्जी (विपरीत उर्जायें) और डार्क मैटर ( विलोम तत्व) का भी उपयोग सिखाया। जो स्रजन, पालन, संहार में जरूरी होती हैं। उसके बाद वे उर्जायें किसी और आत्मा को नही मिलीं। इसलिये उनके अलावा कोई और भगवान नही बन सका। भगवान के पद पर नियुक्ति के बाद परमात्मा उन्हें तपस्या में लगा देते हैं। युगों तक तप से वे शक्तियां (ब्रह्मांडीय उर्जायें) अर्जित करते हैं। उनकी चेतना का उत्थान होता है। उनकी आत्मा भगवान वाले स्तर तक पहुंचती है। उसके बाद ही उन्हें भगवान की क्षमता मिलती है।
शिव पहली आत्मा अर्थात परम आत्मा अर्थात परमात्मा हैं। अरबों खरबों साल उपयोग के बाद जब ब्रह्मांड अत्यधिक प्रदूषित हो जाता है। लोगोॆं के मन भी दूषित हो जाते हैं। उनमें शुद्धता की गुंडाइश नही बचती। तब शिव ब्रह्मांड की सफाई शुरू करते हैं। सब कुछ खत्म करके नये सिरे से ब्रह्मांड की शुरूआत करते हैं।
बोलचाल की भाषा में समझने के लिये ब्रह्मांड को एक बड़ा वन मान लीजिये। वह वन एक सुंदर दुनिया सा है। जिसमें सुदर फूल, पौधे, तितलियां, चिड़िया, लोग हैं। सब कुछ मनमोहक, सुंदर। लम्बे उपयोग के बाद वहां भारी प्रदूषण हो गया। फूल, पौधों की जगह कंटीले पेड़ हर तरफ फैल गये। उनके बीच सांप बिच्छु और खतरनाक जानवर रहने लगे। अब बगीचे में जाना, रहना जानलेवा हो गया। जानवरों को हटाने का विरोध करने पशु संरक्षण वाले संगठन आ गये। कुछ कानून वाले कटीले पेड़ों को काटने से मना करने लगे। उपवन को ठीक करने के रास्ते बंद से हो गये।
ऐसे में वन के मालिक ने वन में आग लगा दी। सब जला दिया। पानी की धारायें लाकर सब बहा दिया। इस तरह उस जगह का शोधन हुआ। पूरा इलाका दोबारा स्रजन के लिये तैयार हो गया। इसे महा प्रलय जैसा मानो। उपवन की तरह ब्रह्मांड की सफाई के लिये शिव को मजबूरी में सब खत्म कर देना पड़ता है। संहार करना पड़ता है। दरअसल यह संहार नही शोधन है। अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से न निभा पाने के कारण इसमें सब मारे जाते हैं। भगवान भी, देवता भी, बाकी सब भी। कुछ बचता है तो वे होते हैं अंत से भी अंतिम शिव। अंतिम आत्मा। अकेली आत्मा। संहार की थकान और भावनात्मक पीड़ा का बोझ लिये शिव आंखें बंद कर लेते हैं। तप में लीन हो जाते हैं। फिर हजारों युगों बाद प्रथम आत्मा के रूप में आंखें खोलते हैं। स्रजन की सोचते हैं। ब्रह्मांड फिर बनता है। संचालनकर्ताओं की नियुक्त फिर होती है। भगवान फिर बनते हैं। त्रिदेव फिर बनते हैं।
त्रिदेव में महेश को शिव का रूप माना जाता है। इसी तरह शंकर, शम्भू, आशुतोष, रुद्र सहित शिव के अनेकों रूप हैं। अर्थात् वे शिव नही बल्कि उनके रूप हैं। रूप यानी अवतार। यही अवतार की धारणा है।
हर आत्मा को जरूरत पड़ने पर खुद को विस्तारित करने का अधिकार प्राप्त है। जिस तरह आत्मा परमात्मा का अंश हैं। उसी तरह कोई भी आत्मा अपने अंश निकालकर उनसे काम ले सकती है। किसी आत्मा से निकली अंश आत्माओं में भी वही गुण होते हैं जो परमात्मा से निकली आत्मा में होते हैं। किंतु उनकी क्षमताओं में फर्क होता है। किसी आत्मा से निकली अंश आत्मा की चेतना व कार्य क्षमतायें मूल आत्मा के समतुल्य होती हैं।
यही अवतार का विज्ञान है। मान लीजिये भगवान विष्णु ने अपनी आत्मा से एक अंश निकाला। उसे श्री राम के रूप में धरती पर भेजा। तो श्री राम में भगवान विष्णु वाले गुण, कार्य क्षमता और चेतना स्तर होगा। श्री राम को भगवान विष्णु का रूप कहा जाएगा। यानी श्री राम भगवान विष्णु के रूप हुए न कि विष्णु। इसलिये अवतारों को शक्तियां प्राप्त करने के लिये युगों तक तपस्यायें नही करनी होंती। उनकी मूल आत्मा यह काम पहले ही कर चुकी होती है। इसी तरह जरूरत के मुताबिक भगवान समय समय पर अवतार लेते हैं।
अवतार का यही सिंद्धांत आदि शक्ति व अन्य देवी देवताओं पर भी लागू होता है। यही नही हम आप पर भी यह नियम लगता है। हमारे आप के भी कई रूप ब्रह्मांड में मौजूद हैं। हो सकता है उनमें कोई मूल आत्मा हो। या यहां हम उनकी मूल आत्मा हैं। विज्ञान इसे पैरलर वर्ड (समानांतर दुनिया ) के रूप में मानती है।
आगे हम देवताओं की शक्तियों पर चर्चा करेंगे। जानेंगे कि वे धरती पर अपने साधक क्यों और कैसे चुनते हैं। साथ ही डार्क एनर्जी और डार्क मैटर की शक्तियों पर बात करेंगे।
क्रमशः।
Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या