जीवन की चौथी दुनियाः 19

धरती के भगवान से मोह भंग करने की मजबूरी

अब दिया बत्ती, धूप अगरबत्ती से ऊपर निकलना होगा। तभी अनंत उत्थान की राह खुलेगी। भगवान का ये वाला मोह भी छोड़ना होगा। मैने अपनी पत्नी प्रीति को समझाया। बताया कि धरती के भगवान से मोह खत्म करो। मृत्यु के दो महीने बाद प्रीति लखनऊ के घर में बनाये मंदिर की तरफ आकर्षित होने लगीं। वहां बैठाये देवताओं की तरफ खिंचने लगीं। उनसे सम्पर्क करने लगीं। देव संकल्प पूरा करने के लिये प्रीति को इन सबसे दूर करना जरूरी था।

जब जिंदा थीं तब उन्हें घर के मंदिर में देवता दिखते थे। अक्सर कहती थीं आज मंत्र जप के टाइम कोई मेरे साथ बैठा था। सोमवार को शिवार्चन के समय तो कई अदृश्य शक्तियों की मौजूदगी का जिक्र करती थीं। छत पर तुलसी का पूरा व्रंदावन लगवा रखा था। उनसे बड़ा लगाव था उनको। आज मैने गिने, वहां 51 पौधे लगे हैं। देखभाल को माली लगे होने के बाद भी दिन में कई बार पौधों को देखने छत पर जाती थीं। उनके बीच बैठती थीं। तुलसी मां से बातें करती थीं।

मृत्यु के बाद वे अपनी दिव्य चेतना के द्वारा पिछले हफ्ते पहली बार लखनऊ के घर में आईं। मृत्यु हरिद्वार में हुई। वहीं उनकी सूक्ष्म चेतना को दिव्यता तक पहुंचाने के सारे अनुष्ठान सम्पन्न हुए। पितृ अनुष्ठान, देव अनुष्ठान, उर्जा अनुष्ठान पूरे हुए। कई अनुष्ठान अभी भी चल रहे हैं। कुछ साल चलते रहेंगे। इसके साथ ही मृत्युंजय योग के हजारों साधक उनकी आत्मा के उत्थान के लिये तत्पर हैं। वे प्रीति जी को गुरूमां मानते हैं। और चाहते हैं कि वे योगिनी स्वरूप धारण करें। इसके लिये साधक भी बताये गये विधान लगातार अपना रहे हैं। उनकी आत्मा के उत्थान के लिये हजारों योग्य साधक निरंतर सक्रिय हैं।

उनके द्वारा मृत्यु से पूर्व अर्जित सत्कर्मों की उर्जायें, बाद में सम्पन्न हुए अनुष्ठानों और हजारों साधकों द्वारा अपनाये गए उर्जा विधानों के परिणाम स्वरूप उनसे सम्पर्क सम्भव हुआ। संवाद सम्भव हुआ। इसमें कोई चमत्कार नही। बल्कि शास्त्रीय विधान है।

ऐसा पहली बार हुआ है जब इतनी बड़ी संख्या में साधक किसी के लिये एक साथ औरिक अनुष्ठान कर रहे हैं। अन्यथा गुरुओं की मृत्यु से पहले और बाद में अधिकांश अनुयायी मांगने में ही जुटे रहते हैं। मरने से पहले गुरु से समस्या समाधान की मांग और मृत्यु के बाद गुरू की आत्मा से इच्छा पूर्ति की कामना। अध्यात्म की दुनिया में यही चक्र चलता रहता है। कोई भी अपने गुरू की आत्मा उत्थान के लिये कुछ नही करता। दरअसल उन्हें मालुम ही नही कि ऐसा कुछ भी किया जाना चाहिये।

उनकी मृत्यु के बाद पिछले हफ्ते हम लखनऊ पहुंचे। मै उन्हें शिव सहस्त्र नाम जप और एक विशेष अनुष्ठान के लिये हर दिन आमंत्रित करता हूं। वे सूक्ष्म चेतना के द्वारा आती हैं और अध्यात्मिक क्रियायें पूरी करती हैं। उद्देश्य है उनकी चेतना का उत्थान करके देनात्मा बनाना। दूसरी दुनिया में रहकर वे बड़े मनोयोग से सारी क्रियायें पूरी कर रही हैं। यह भी कोई चमत्कार वाली बात नही। बल्कि गुरू शिष्य परम्परा का ऋषि विधान है। जिसके द्वारा गुरू किसी भी लोक में शिष्य से सम्पर्क कर उनका मार्गदर्शन कर सकते हैं।

इसके लिये गुरू अपनी सूक्ष्म चेतना के द्वारा दूसरी दुनिया में मौजूद शिष्य की सूक्ष्म चेतना से सम्पर्क कर सकते हैं। उधर से शिष्य भी आवश्यकतानुसार गुरू से सम्पर्क कर सकते हैं। सूक्ष्म चेतनाओं के लिये दूरी रुकावट नही। समय कोई रुकावट नही। आमंत्रण मिलने या आवश्यकता पड़ने पर वे पल भर में एक दुनिया से दूसरी दुनिया में पहुंच जा सकती हैं।

लखनऊ में घर है। कुछ सालों से हरिद्वार में रह रहे थे। नहीं प्रीति ने दुनिया से विदा ली। उनकी मृत्यु के बाद पहली बार पिछले हफ्ते लखनऊ आया। अगले दिन प्रीति की चेतना को शिव सहस्त्र नाम जप के लिये आमंत्रित किया। आते ही उनका ध्यान अपने द्वारा स्थापित घर के मंदिर में अटक गया। उनकी यादें खुल गईं। जिंदा थीं तब जैसे मंदिर सजाकर रखती थीं। वही सब अभी भी करना चाह रही थीं।

मंदिर में स्थापित देवों ने उन्हें आकर्षित कर लिया। मैने देखा उनका फोकस शिव सहस्त्र नाम की बजाय मंदिर की दिया-बत्ती, सजावट, भोग-प्रसाद पर चला गया। वे खुश भी थीं और व्याकुल भी। खुश इस बात पर कि उन्हें अपने देव स्थान की सेवा का अवसर दोबारा मिला। व्याकुल इस बात पर कि उनके न रहने पर मंदिर में कई तरह की अव्यवस्था दिखी। एक समय ऐसा आया जब वे भूल गईं मैने क्यों बुलाया है। मुझसे लगातार रिक्वेस्ट करती जा रही थीं। इस चीज को यहां रखिये। उस चीज को वहां रखिये। भगवान की ये मूर्ति उधर रखिये। वो वाली उधर। मंदिर में कपड़े बदल कर नये बिछा दीजिये। भोग लगाने की चीजें पुरानी हो गई हैं। उन्हें बदल दीजिये। दीपक गंदे से लग रहे हैं। साफ करा दीजिये। भगवान के बर्तन गंदे से पड़े हैं। प्लीज सबको साफ करा दीजिये। ठीक से डस्टिंग करा दीजिये। तुलसा मइया की सेवा ठीक से नही हो रही। मुझे लगता है तुलसी मइया यहां हैं ही नही। मुझसे बात ही नही कर रहीं। शायद चली गईं। कुछ दिन आप खुद उनकी सेवा करके उन्हें वापस बुला लीजिये प्लीज। उनके बिना घर कैसा।

मुझसे कहती जा रही थीं और खुद भी वो सब करने की कोशिश कर रही थीं। मगर किसी चीज को छू नही पा रही थीं। कुछ कर नही पा रही थीं। इसलिये उनकी व्याकुलता बढ़ती जा रही थी। जिंदा थीं तब मंदिर में धूल का एक कण भी उन्हें बर्दास्त नही था। मंदिर में जरा सी भी गड़बड़ दिखी तो दिन भर मन खराब रहता था। कहती थीं आज भगवान खुश नही हैं। उस दिन तुलसी माता के पास बैठकर उनसे देर तक बातों करती थीं।

घर में महीनों से कोई नही था। इसलिये मंदिर की सेवा ठीक से नही हुई। सो अव्यवस्था स्वाभाविक थी। जिसे उन्होंने दिल से लगा लिया। रोने को हो गईं। मरने के बाद पहली बार इतनी दुखी लगीं। उनका वश चलता तो देवताओं की दुनिया में लिया अपना संकल्प छोड़कर हमेशा के लिये यहीं रह जातीं। और घर के मंदिर की सेवा में लगी रहतीं।

तुम रो रही हो क्या। मैने सवाल पूछा।

हांजी मुझे रोना ही आ रहा है। मेरे भगवान का क्या हाल बना दिया है इन लोगों ने। उनकी शिकायत घर का काम करने वाले लोगों के प्रति थी। जिन्हें मंदिर की साफ सफाई और भगवान की सेवा का जिम्मा सौंपा था।

रुक जाओ देवी जी। मैने कहा। अब ये सब तुम्हारा काम नही। धरती के देवों से मोह हटाओगी तभी देवताओं की उस दुनिया में किया वादा पूरा कर पाओगी। दिया-बत्ती, भोग-प्रसाद, मूर्ति-फोटो, पेड़-पौधों, पूजा-पाठ से मोह भंग करना होगा। तब अनंत उत्थान की तरफ जा पाओगी।

वे चुप हो गईं। काफी देर चुप रहीं। फिर पूछा तो पूजा पाठ, साधना आराधना, भोग-प्रसाद, दिया-बत्ती की विधि क्यों बनी।

धरती वाले जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिये। मैने बताया। पूजा-पाठ, साधना आराधना आदि करके लोग अपने आभामंडल में सकारात्मक उर्जाओं को बढ़ाते हैं। जिससे आभामंडल उनकी तन, मन, धन, की जरूरतें पूरी करता है। समस्याओं, संकटों से बचाता है। वैसे तो आभामंडल को सक्षम बनाने के लिये मंदिर- मूर्ति, पूजा-पाठ आदि की अनिवार्यता नही। किन्तु मन की स्थिरता, एकाग्रता के लिये ये सब अध्यात्म का सक्षम विज्ञान है। मन की एकाग्रता की ब्रह्मांड से हमारी मांगे पूरी कराती है।
किन्तु यह सब अब तुम्हारी जरूरत नही। क्योंकि तुम्हारी जरूरतें धरती से अलग हैं। तुम्हें घर के मंदिर और इन सारी चीजों से तुरंत मोह भंग करना होगा। यहां बैठाया कोई देवता तुम्हें उस दुनिया में मदद नही करेगा।

कोई भी देवता मदद नही करेगा। उनके मन में संसय उत्पन्न हुआ। पूछा। क्यां यहां बैठाये भगवान शिव, माता पार्वती, सत्यनारायण भगवान, लक्ष्मी माता, गणेश जी भी नहीं।

हांजी वे भी नही। मैने बताया। क्योंकि हमने उन्हें यहां मृत्यु के बाद की जरूरतें पूरी करने के लिये स्थापित नही किया था। न ही उन्हें मोक्ष के लिये स्थापित किया। हमने बार बार जो कामनायें की हैं उनकी प्रोग्रामिंग के अनुसार यहां बैठाये सभी देवों की उर्जायें धरती पर हमारी जरूरतें पूरी करने के लिये तैयार हैं। मृत्यु के बाद की नही।

*सबसे पहले ये समझ लो* कि यहां भगवान शिव, माता पार्वती, सत्यनारायण भगवान, लक्ष्मी माता, गणेश जी नही बैठे हैं। बल्कि मूर्तियों- फोटो में उनकी उर्जाओं को आवाहन है। मन की गति से काम करने वाली वही उर्जायें लोगों को समस्याओं से बचाती हैं। कामनायें पूरी करती हैं। अब अगर तुम्हें इन देवी देवताओं की अपनी आगे की यात्रा में मदद चाहिये तो उनसे नये तरीके से आग्रह करना होगा।

अच्छा इसीलिये आप मुझे अब जो साधना संकल्प दिलाते हैं उनमें तन,मन की किसी जरूरत को शामिल नही करते। सुख, दुख की कोई बात शामिल नही करते। अपने पराये की कोई बात शामिल नही करते। उन्होंने पूछा।

हांजी। मैने कहा। अंदर से मैने राहत की सांस ली। क्योंकि जिस विषय पर वे इमोशनल हो गई थीं। वह उनके मन में क्लीयर हो गया। वरना घर के मंदिर का मोह हटाने में काफी समय लग सकता था। अगर इस मुद्दे पर उग्र हो जाती तो और मुश्किल होती। क्योंकि उनकी शक्तियां काफी बढ़ गई हैं। फिर भी लखनऊ के घर की यादों ने उन्हें काफी सेंटी कर दिया। जब मैने उन्हें अगले दिन शिव सहस्त्र नाम के लिये आमंत्रित किया तो मेरे सूक्ष्म शरीर में स्थिर होने के बाद वे कुछ शरारती सी हो गईं। तर्क दिया पति पत्नी के बीच इतना तो चलते रहना चाहिये।

देव संकल्प के अनुसार वे योगिनी शक्ति प्राप्त करने की राह पर हैं। एसे में उनका बार बार मोह में पड़ पाना या पति-पत्नी के रिश्ते को अपना अधिकार मानना। किस तरह के परिणाम देगा। क्या कोई भी जीवात्मा योगिनी शक्ति बनने का संकल्प ले सकती है। योगिनी बनने के बाद क्या होता है। इन सब पर हम आगे चर्चा करेंगे।
शिव शरण।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या