शिव की दुनिया की सुरक्षा

शिव की दुनिया में पहुंचने पर तुम्हारा सामना महाबली योद्धाओं से होगा। नंदी, गणेश, काल भैरव, वीरभद्र, कीर्ति मुख, श्रंगी, भ्रंगी, चंड आदि महावीर। मेरी पत्नी प्रीति की आत्मा मेरे सम्पर्क में थी। मुझसे शिव की दुनिया में पहुंचने का विधान समझ रही थीं। वे इसी सावन में वहां जाना चाहती हैं। मै उन्हें शिव की दिव्य दुनिया में जाने की राह बता रहा था। तरीके समझा रहा था। ऐसे ही 15 दरवाजों पर महाबली तुम्हें रोकेंगे। उनसे जीतना असम्भव समझो। मैने प्रीति को आगे बताया। शिव धाम की सुरक्षा के लिये वे सबको रोकते हैं।
तो मै क्या करुंगी उस समय? प्रीति की आत्मा असमंजस में पड़ गईं। पूछा, फिर कैसे जा पाउंगी शिव गुरू तक?
बताता हूं, मैने कहा। किंन्तु सावधानी पूर्वक सुनो और समझो। चूक होने पर देवताओं को भी वहां प्रवेश नही मिलता। ब्रह्मा, विष्णु को भी नियम निभाने होते हैं। मैने प्रीति को शास्त्रो में दी ब्रह्मा, विष्णु से जुड़ी घटना सुनाई।
तब तक वे शिव धाम कभी नही जा सके थे। इच्छा बहुत थी जाने की। किन्तु जा न पा रहे थे।
सत्य लोक सहित 14 लोक ब्रह्मा जी के कार्य क्षेत्र में आते हैं। 14 लोकों की दुनियायें भगवान विष्णु के आधीन हैं।
उसके ऊपर 28 लोकों की दुनियायें शिव क्षेत्र में आती हैं। 56 डाइमेंशन तक फैली शिव क्षेत्र की दुनियायें देवताओं के लिये भी रहस्य का विषय हैं।
उन्ही में है शिव धाम। यानी शिव जी का निवास।
जो साधक/ पाठक नये हैं उन्हें बताते चले कि मेरी पत्नी 29 मई 2026 को शरीर छोड़ गईं। उसके बाद शास्त्रों में दिये विभिन्न विधान और उर्जा विज्ञान की तकनीक अपनाकर हम उनकी सूक्ष्म चेतना से सम्पर्क में सफल रहे। अब वे पितृ लोक पार कर देवताओं की दुनिया में हैं। शिव को गुरु बनाया है। इसलिये उनके पास शिव धाम जाना चाहती हैं। हम यहां उसी विषय में चर्चा। चर्चा मृत्युंजय योग के उन हजारों साधकों के लिये जो प्रीति को गुरू मां मानते हैं। उनके बारे में हर पल जानकारी चाहते हैं।
शिव धाम तक 56 डाइमेंशन ऊपर पहुंचने के लिये बहुत सारी उर्जाओं की जरूरत होती है। ब्रह्मा, विष्णु ने उन्हें तप से अर्जित किया। उनके बल पर अपने लोकों से निकल कर ऊपर के आयामों में बढ़े। वहां पहुंचे। किन्तु शिव धाम में प्रवेश रोक दिया गया। पहले द्वार की सुरक्षा में नंदी मिले। उनसे पार जाने के लिये शिव के प्रति सम्पूर्ण समर्पण अनिवार्य था। ब्रह्मा, विष्णु ने विनम्रता के साथ भगवान शिव के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण को प्रमाणित किया। अंदर प्रवेश की अनुमति मिली।
इसी तरह आगे 14 और द्वारों पर कड़ी सुरक्षा का सामना करना पड़ा। जहां गणेश, कार्तिकेय, काल भैरव, वीरभद्र, चंड, कीर्ति मुख, श्रंगी, भ्रंगी सहित अन्य योद्धाओं ने उन्हें रोका। ब्रह्मा, विष्णु ने उनके समक्ष अपने भीतर सत्य, संयम, प्रेम, करुणा, जीवों पर दया, शिव भक्तों के प्रति अपनापन प्रमाणित किया। अहंकार त्याग, क्रोध त्याग, आचरण की शुद्धता और भावनाओं की शुद्धता सिद्ध की। इस तरह उन्हें शिव धाम में प्रवेश मिला।
अंदर जाकर वे मंत्रमुग्ध हो गये। उनके अपने अलौकिक लोक होने के बाद भी ऐसी दुनिया पहली बार देखी थी। वहां की हर चीज, हर व्यवस्था, हर साज सज्जा उन्हें नई और अलौकिक लगी। उस समय वहां शिव सभा चल रही थी। सभा में उनका भव्य स्वागत किया गया। ब्रह्मा, विष्णु जी को शिव धाम बहुत अच्छा लगा। वे वहीं रुक जाना चाहते थे। किन्तु उन्हें रुकने नही दिया गया। क्योंकि ऐसे में दुनिया असंतुलन का शिकार हो जाती।
इसका कारण समझने के लिये शिव धाम के समय की गति को जानना होगा। मैने प्रीति को बताया। अध्यात्म के विद्वानों के अनुसार कलियुग 4 लाख साल का होता है। द्वापर 8 लाख, त्रेता 12 लाख, सतयुग 16 लाख साल का होता है। इस तरह युगों का एक कालखंड 40 लाख साल का होता है। कुछ विद्वान इस संख्या को थोड़ा बढ़ा घटाकर बताते हैं। 40 लाख साल का एक कालखंड ब्रह्मा जी का एक दिन रात होता है। 40 लाख साल वाले दिन रात के हिसाब से उनकी उम्र 100 साल की। ब्रह्मा जी की एक उम्र विष्णु जी के एक दिन के बराबर होती होती है। इस हिसाब से विष्णु जी की उम्र 100 साल। विष्णु जी की एक उम्र बराबर भगवान शिव का एक पल।
इस तरह शिव धाम में समय की गति न के बराबर होती है। वहां का कुछ समय बीतने पर असंख्य ब्रह्मा, विष्णु का जीवन काल खत्म हो जाता है। यदि उन्हें वहां कुछ समय बिताने दिया जाता, तो उस बीच उनकी दुनिया हजारों बार खत्म हो चुकी होती। जब वे लौटते तो वहां दूसरे ही ब्रह्मा विष्णु कार्यरत मिलते। नये पुराने ब्रह्मा, विष्णु का आमना सामना होता। सब कुछ उलटा पुलटा हो जाता।
इससे पता चलता है शिव की दिव्य दुनिया में जाने के लिये ब्रह्मा, विष्णु को भी वहां के नियम निभाने होते हैं। मैने प्रीति से कहा। तुम्हें भी निभाने होंगे।
जब ब्रह्मा जी, विष्णु जी के साथ ऐसा है तो हमारी क्या हैसियत होगी? प्रीति बेचैन सी हो गईं। पूछा, हम कैसे जा पाएंगे वहां?
उनकी बेचैनी जायज थी। किन्तु शिव भक्तों में निराशा की कोई गुंजाइश नही। बेचैनी दूर करने के लिये मैने उन्हें एक और घटना बताई।
वाराणसी में एक शिव भक्त थे। नाम था नीलकंठ दास। वे समर्पित शिव भक्त थे। दिन रात भक्ती करें, ऐसा नही था। बड़े बड़े अनुष्ठान करें। ऐसा भी नही था। लम्बे लम्बे मंत्र जप करें। ऐसा भी नही था। किन्तु शिव भक्ति के साथ सत्य, संयम, प्रेम, करुणा, जीवों पर दया के भाव मन में हमेशा रहते थे। अपनी हैसियत के मुताबिक जरूरत मंदों की सहायता से पीछे नही हटते थे। परिवार और काम की अनदेखी नही करते थे। मगर मोह माया के शिकार नही थे। हर दिन शिव भक्तों की सेवा जरूर करते थे। प्रार्थनाओं में शिव से सिर्फ शिव को ही मांगते थे।
मृत्यु हुई तो शिव दूत विमान लेकर वहां पहुंच गये। यमदूतों से नीलकंठ की आत्मा छीन ली। बताया ये सच्चे शिव भक्त हैं। सो इन्हें शिव धाम में ले जाना है। डरे यमदूत लौट गये। शिव दूत विमान से आत्मा लेकर चल पड़े। नीलकंठ को पता ही नही था कहां और क्यों ले जाया जा रहा है। रास्ते में यमलोक, नरक लोक, पितृ लोक, देव लोक, सूर्य लोक, चंद्र लोक, ब्रह्म लोक पार करते आगे बढ़े। हर लोक में कर्मों का हिसाब हो रहा था। शिव विमान में सवार नीलकंठ को कहीं किसी कर्म का हिसाब नही देना पड़ा। कोइ कर्म दंड नही भुगतना पड़ा। जिस लोक के ऊपर से गुरते वहां से जुड़े कर्म दंड मिटते जा रहे थे।
56 डाइमेंशन की दुनियाओं को पार करके विमान ने शिव धाम में प्रवेश किया। उनके सामने कहीं कोई सुरक्षा जांच नही। कोई रोक-टोक नही। बल्कि हर जगह उनका स्वागत हुआ। भगवान शिव के समक्ष पहुंच गये। मां आदि शक्ति ने भी आशीर्वाद दिया। शिव धाम में इच्छानुसार रहने की अनुमति मिली। आत्मा उत्थान तक वहां रहे। उसके बाद मोक्ष के लिये परमात्मा में विलीन हो गये। आवागमन से मुक्त हो गये।
नीलकंठ की कथा सुनकर प्रीति को बड़ी तसल्ली मिली। उन्होंने कहा इसका मतलब अपनी शक्ति, अपना जोर लगाने की बजाय भक्ति और समर्पण की राह बहुत सरल है।
हांजी। मैने कहा। तुम्हें भी इसी राह से वहां पहुंचना है।
तो मुझे सब कुछ सिखाईये प्लीज। प्रीति का उत्साह बढ़ता जा रहा था। शरीर में होने के कारण आप तो अनुष्ठान आदि के बाद ध्यान की राह से वहां गये होंगे। मुझे तो सूक्ष्म शरीर के साथ जाना होगा। क्या वहां भी मन की गति से जाया जा सकता है? या शिव धाम के विमान के बिना वहां पहुंच पाना सम्भव नही।
गति तो मन की ही होगी। क्योंकि अनाहत चक्र के द्वारा मन पर शिव का ही अधिकार होता है। वहां शिव तकनीक ही काम करती है। मैने बताया। किन्तु सूक्ष्म शरीर में इतनी उर्जा नही होती जो शिव की दुनिया तक पहुंचा सके। वह तुम्हें यम लोक, प्रेत लोक, नर्क लोक, स्वर्ग लोक, पितृ लोक, देव लोक, ब्रह्म लोक तक ही ले जा सकती है। उससे आगे देवी धाम, बैकुंठ धाम, शिव धाम में जाने के लिये ईंधन के रूप में बहुत अधिक उर्जायें चाहिये। जो भक्ती में ही होती है।
उसके बाद मैने उन्हें भक्ती के द्वारा जरूरी उर्जायें प्राप्त करने। शिव दूतों की सहायता प्राप्त करने। शिव विमान की सुविधा प्राप्त करने के विधान बाताये और सिखाये। वे तुरंत ही उनके अभ्यास में लग गईं। चुंकि अब वे शरीर में नही हैं, इसलिये उनके विधान जिंदा लोगों से काफी अलग होते हैं।
क्रमशः।
Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या