जीवन की चौथी दुनियाः 9

गरीबों का मोक्ष

धरती पर जिनके वंशज गरीब हैं। धन हीनता के कारण तर्पण, दान, पिंडदान नही कर सकते। उनको मोक्ष कैसे मिले ? सदगति कैसे मिले ? प्रेत दुनिया से मुक्ति कैसे मिले ?
प्रेतों की दुनिया से बाहर आकर सम्पर्क स्थापित होने पर मेरी पत्नी प्रीती ने पहला सवाल यही पूछा था।
वे अग्नि दुर्घटना में मरीं। कहा जाता है दुर्घटना में मरे लोग प्रेत बनते हैं। उन्हें प्रेतों की दुनिया से निकालकर पितृ लोक और फिर देवताओं की दुनिया तक पहुंचाने के लिये हमने शास्त्रों में दिये सभी विधान अपनाये।

13 दिनों तक हर दिन पितृ पूजा की। दान, पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध, पितृ अनुष्ठान अनवरत चले। जिन पर हजारों रुपये रोज खर्च हो रहे थे। दाह संस्कार से लेकर तेहरवीं तक लाखों खर्च हो गये। वे प्रेतों की दुनिया से मुक्त हुईं। देवताओं की दुनिया में आवक जावक शुरू हुई।
अतिरिक्त उपायों से उनका हमसे सूक्ष्म संवाद स्थापित हुआ।
तब उन्होंने पूछा आपके पास थे तो इतने पैसे खर्च कर लिये। मगर जो गरीब हैं उन मृतकों का क्या होगा? उन्हें मुक्ति कैसे मिलेगी? क्या उनके लिये भी कोई विधान है?

प्रीती जी मेरी पत्नी होने के साथ मृत्युंजय योग संस्थान के हजारों साधकों की गुरू मां भी थीं। जिंदा थीं तब अक्सर उनके हित के सवाल पूछती । उन्होंने भगवान शिव को अपना गुरू बनाया था। अपने तमाम सवाल उनसे ही पूछतीं। बचे सवालों पर मुझसे डिसकस करतीं। पति के साथ वे मुझे अपना गुरू जैसा भी मानती थीं। वर्षों से निरंतर शिव पुराण का पाठ, शिव सहस्त्र नाम से शिवार्चन, शिव पार्वती की आराधना और शिव साधना। इन सबसे उनकी उर्जायें सिद्ध हो गई। अब वही हमारे बीच सूक्ष्म संवाद का चैनल बनीं। वे मृत्यु के उस पार की दुनिया से अपनी बात कहती हैं। मै इस पार की दुनिया से।

अमीरी गरीबी धरती का मुद्दा है। यहां लेनदेन का चलन है। मैने उन्हें बताया। जिसका आसान माध्यम पैसा है। पैसा सबकी जरूरत है। कर्मकांड कराने वाले पंडितों की भी। उनके भी परिवार हैं। जिम्मेदारियां हैं। जिन पर पैसे लगते हैं। दान-दक्षिणा से उनके घर चलते हैं। इसीलिये शास्त्र दान-दक्षिणा को अनिवार्य बताते हैं। घर चलाने का धन नही होगा तो पंडित, पुरोहितों के मन असुविधा में होंगे। तब न उनसे मंत्र चलेंगे न विधान निभेंगे। उनके मंत्रों, संकल्पों, विधानों से सकारात्मक उर्जायें उत्पन्न होती होती हैं। जो अक्षय रूप से एक दुनिया से दूसरी दुनिया में जाती हैं। उर्जा शरीर से बनी जीवात्मा को मिलती हैं। उनका उपचार करती हैं। पुनर्निमाण करती हैं। मोक्ष, मुक्ति, सदगति या आगे की यात्रा के लिये सक्षम बनाती हैं।
मगर गरीबों के पास दान-दक्षिणा के पैसे नही होते।

गरीबों के पास पूजा पाठ, श्राद्ध, दान, पिंडदान, हवन आदि में लगने वाली सामग्री के भी पैसे नही होते। शास्त्रों में गौ दान, भोजन दान, सैया दान, वस्त्र दान, पात्र (बर्तन) दान, पुस्तक दान, माला दान सहित अनेकों वस्तुओं के दान का विधान है। यह सिर्फ दिखावा नही। बल्कि उर्जा विज्ञान का कारण भी है। सभी वस्तुओं की अपनी एनर्जी होती है। जीवन काल में उपयोग से जीवात्मा वस्तुओं को पहचानती है। मंत्रों, संकल्पों के साथ जब वस्तुओं की एनर्जी मिलती है तो जीवात्मा की बिगड़ चुकी उर्जा मेमोरी रिजनरेट होती है। वह उत्साहित होती है। उत्साह में उपचार के नतीजे बढ़ जाते हैं।

जीवात्मा मतलब सूक्ष्म शरीर। आत्मा की तरह यह भी मरता नही। आत्मा को कर्म दोष नही लगते। सूक्ष्म शरीर को लगते हैं। जिस कारण बीमार होता है। घायल होता है। अंग भंग होता है। मोह, माया, लालच, अहंकार जैसी भावानात्मक बीमारियों का शिकार होता है। तब जीवन की अगली यात्रा में बढ़ने लायक नही रहता।
ऐसे में इसे प्रेत श्रेणी में रहना पड़ता है। वहां से निकलने के लिये उर्जा उपचार की जरूरत पड़ती है। प्रेत उपचार के लिये विशेष तरीके की उपचारक उर्जाओं की जरूरत होती है। जो धरती पर रहने वाले वंशजों द्वारा किये कर्म कांड, अर्पित वस्तुओं, दान आदि से मिलती हैं।
वंशजों की क्रियाओं का 12 दिन इंतजार होता है।
जिनके वंशज क्रिया कर्म, श्राद्ध् आदि नही करते। या अधूरे क्रिया कर्म करते हैं। 12 दिन बाद वे सूक्ष्म चेतनायें यमदूतों के हवाले कर दी जाती हैं। कर्मदोष मुक्ति के लिये यमदूत अपने तरीके से उनका उपचार करते हैं।

कर्म दोष शरीर को भी लगते हैं। किन्तु मृत्यु बाद उसे कर्मफल नही भोगने पड़ते। पंचतत्व वापसी के लिये मृत शरीर तुरंत खत्म कर दिया जाता है। पंचतत्व ब्रह्मांड की अति महत्वपूर्ण प्रापर्टी हैं। उन्हें किसी निष्क्रिय शरीर में यूं ही नही छोड़ा जा सकता। किसी का अंतिम संस्कार न हो। तोे भी ब्रह्मांड खुद मरे शरीर को सड़ा कर पंचतत्व निकाल लेता है।

ऐसे में सारा कर्म भोग सूक्ष्म शरीर के हिस्से में चला जाता है। यह ब्रह्मांडीय उर्जाओं से बना शरीर है। आंख, नाक, मुंह, कान सहित इसमें सारी इंद्रियां हैं। बिना हाड़-मांस के उर्जा निर्मित अंग हैं। आभामंडल, उर्जा चक्र आदि इसके अतिरिक्त अंग हैं। मृत्यु बाद इसका आकार एक हाथ यानी लगभग डेढ़ फीट का होता है। दिमाग नही होता। फैसले मन से लेता है। आत्मा के साथ मिलते ही इसे सभी जन्मों की घटनायें याद आ जाती हैं। नया जन्म ले पुरानी यादें दोबारा छिप जाती हैं। उस समय घट रही बातें ही याद रहती हैं।

सूक्ष्म शरीर मन की गति से कहीं भी आ जा सकता है। खाना, पानी तक भी। पितरों मोक्ष स्थलों तक जा सकता है। दान, पिंडदान सहित पितृ पूजा में लगने वाली सभी चीजों तक पहुंच सकता है। किन्तु बिना अनुमति कुछ ग्रहण नही कर सकता।
इसीलिये उन्हें धरती के वंशजों की सहायता चाहिये होती है। वैसे किसी भी सूक्ष्म शरीर को उपचारित करने के लिये कोई भी धरती वासी सहायता कर सकता है।

जो लोग गरीब हैं। पितृ सदगति के विधानव कैसे करें। शात्रों में जहां एक तरफ पितृ सदगति के खर्चीले विधानों का विवरण है। वहीं गरीबों के लिये भी असरदार विधान बताया गया है। जिसमें मन की उर्जा में मिलाकर ब्रह्मांडीय उर्जा का उपयोग किया जाता है। मन की उर्जाएं सूक्ष्म शरीर को बहुत सूट करती हैं। बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वे तुरंत उपचारित हो जाते हैं। प्रेत योनि से निकल जाते हैं। आगे की यात्रा के लिये तैयार हो जाते हैं। सदगति प्राप्त हो जाती है। मुक्ति मिल जाती है। मोक्ष तक पहुंच जाते हैं।

गरीबों के मोक्ष के लिये शास्त्रीय विधान। किसी भी प्राकृतिक व शांत स्थान पर जायें। दोनो हाथों को अंतरीक्ष की तरफ उठायें।
परमात्मा से कहें- हे विश्व देवा आपको प्रणाम। मेरे पितरों की सदगति के लिये ब्रह्मांड की पवित्र उर्जायें प्रदान करें। जो हमारे पितरों के पास जायें। उन्हें संतृप्त करें। संतुष्ट करें। सदगति प्रदान करें। जीवन यात्रा को देवताओं की तरह पूरी करने लायक उन्हें सक्षम बनायें।
आपका धन्यवाद।
पितरों से कहें- हे मेरे प्रिय पितरों। आपको नमन। अपने जीवन काल में हमारे लिये जो भी किया उसके लिये आपका धन्यवाद। अपने मन के प्रवाह से मै ब्रह्मांड की कल्याकारी उर्जाओं को आपके लिये प्रेषित कर रहा हूं। इन्हें अक्षय रूप से ग्रहण करें। मै आग्रह पूर्वक अनुमति दे रहा हूं। संतुष्ट होने तक आप धरती के जल को ग्रहण करें। धरती के अन्न को ग्रहण करें। संतृप्त हो जायें। सदगति को प्राप्त करें। मोक्ष को प्राप्त करें। मुझे और मेरे कुल के सभी लोगों को अपना आशीर्वाद प्रदान करें। संरक्षण और सुरक्षा प्रदान करें।
आपका धन्यवाद।

यह वह विधान है जिसे किसी न किसी रूप में अन्य धर्मों, मान्यताओं के लोग भी अपनाते हैं। आगे हम यमदूतों के अस्पताल के बारे में जानेंगे। जहां प्रेतों का इलाज किया जाता है।
शिव शरणं।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या