आहुतियों की शक्तिः इंद्र सिंहासन सहित भस्म होते बचे

धरती पर जनमेजय के पुरोहित आहुतियां दे रहे थे। मंत्रों का वेग प्रचंड था। तभी इंद्र का सिंहासन हिलने लगा। कोई कुछ समझ पाता। उससे पहले सिंहासन उड़ने लगा। इंद्र जिसको बचाना चाहते थे उसको तो छोड़ो, खुद उनके ही जलकर भस्म हो जाने का खतरा आ खड़ा हुआ। आहुतियां जारी थीं। उनकी प्रचंड उर्जाओं के सामने इंद्र की सभी शक्तियां बेबस हो गईं। सिंहासन सहित इंद्र हवा में पतंग की तरह लहरा रहे थे। सिंहासन सहित यज्ञ में खींच लिये जाने वाले थे। जलकर भस्म हो जाने वाले थे। किसी और की जान बचाने निकले इंद्र की जान बचाने वाला कोई नही था।
मै अपनी पत्नी प्रीति की आत्मा को नागों के खात्मे की घटना बता रहा था। जिसकी चपेट में देवताओं के राजा इंद्र आ गये। वे नागराज तक्षक की जान बचाना चाहते थे। उसे शरण दी। राजाओं वाले अहंकार में कहा मेरी शरण में आ गये हो। अब ब्रह्मांड की कोई शक्ति तुम्हें छू भी नही सकती। तुम्हारी हत्या से पहले जनमेजय को इंद्र का सामना करना पड़ेगा। मुझसे जीतना किसी के वश की बात नही।
किन्तु इंद्र से सामना तो तब होता जब कोई लड़ने आता। धरती पर तो यज्ञ चल रहा था। यज्ञ ही रणभूमि बन गया। तक्षक राजा जनमेजय का शिकार था। अपने निर्दोष पिता की हत्या के बदले जनमेजय तक्षक को मारना चाहते थे। बल्कि उन्होंने धरती और पाताल के सभी नागों, सांपों को खत्म करने का खतरनाक प्रण लिया था। खत्म भी कर दिये। नागों का लोक पाताल सर्पों से खाली हो गया। धरती के सारे सांप मारे गये। धोखेबाज तक्षक सारे नागों की जान खतरे में डालकर इंद्रलोक में जा छिपा। इंद्र ने शरण दी। और खुद की जान खतरे में डाल ली।
प्रीति बड़े ध्यान से सुन रही थीं। मृत्यु के बाद वे देवताओं की दुनिया में हैं। उन्होंने सूक्ष्म शरीर से शिव धाम जाने की तैयारी की है। मेरे बताये शास्त्रीय विधान अपनाकर शिव शिष्या की तरह शिव की दुनिया में प्रवेश करेंगी। वहां उनके गुरू भगवान शिव उनकी आगे की यात्रा तय करेंगे। शास्त्रीय विधान से उन्होंने इसके लिये 12 चरण की सिद्धियां पूरी कर ली हैं। अब फुर्सत में हैं। सो मेरे पास आ गईं। बोली आज कोई रोमांचित करने वाली घटना बताइये। जिससे सीख भी मिले और मनोबल भी बढ़े।
मैने उनसे कहा कल नाग पंचमी है। सो मै तुम्हें नागों की घटना बताता हूं। ध्यान से सुनो। इसमें सीख भी है। सबक भी है। दुनिया जीतने का हौसला पैदा हो, ऐसी इच्छाशक्ति भी है। मै सुना रहा था। वे निर्मल भाव से सुन रही थीं। जैसे बच्चे नानी, दादी से कहानी सुनते हैं।
कहानी की शुरूआत सतयुग से होती है। ब्रह्मा जी के पुत्र महर्षि कश्यप की पत्नियों में से दो राजा दक्ष की पुत्रियां भी थीं। कद्रु और विंदा। दोनो सुंदर होने के साथ ही बड़ी गुणवान थीं। हमेशा पति की सेवा में लगी रहतीं। महर्षि कश्यप उनकी सेवा से बहुत खुश हुए। एक दिन बोले मै तुमसे बहुत खुश हूं। मांगो क्या दूं तुम्हें।
कद्रु बहुत विस्तारवादी थी। उसने मन में प्रभावशाली सत्ता की चाहत थी। उसने कहा आप मुझ पर प्रशन्न हैं तो मुझे पुत्रों के रूप में 1000 शक्तिशाली नाग प्रदान करें। जिनकी सत्ता पाताल लोक से धरती तक फैली हो। वे अत्यंत प्रभावशाली हों। शक्तिशाली हों। महर्षि कश्यप ने कद्रु को मनचाहा वरदान दिया।
विंदा सुलझे स्वभाव की ज्ञानवादी थी। उसने कहा मुझे आप सिर्फ दो तेजस्वी पुत्र प्रदान करें। जो अपने तेज और ज्ञान से तीनों लोकों की सेवा करें। महर्षि ने विंदा को भी मनचाहा वरदान दिया। उसके बाद वे गहन साधना के लिये पहाड़ों पर चले गये। कुछ समय बाद कद्रु ने 1000 अंडे दिये। विंदा ने दो अंडे दिये।
दोनो ने अपने अपने अंडो की सुरक्षा के लिये पक्के इंतजाम किये। 500 साल बीच गये। कद्रु के अंडे तैयार हो गये। उनसे बच्चे निकलने लगे। अंडों से 1000 शक्तिशाली और भयंकर सांप निलके। वासुकी, शेषनाग, तक्षक, कालिया नाग सहित सभी प्रख्यात नाग उन्हीं में थे। वे बड़े होने लगे। कद्रु उनकी शक्तियों और भयंकरता को देखकर बड़ी खुश होती। बहुत दम्भ करती।
तब तक विंदा के दोनो अंडों में कोई हरकत न हुई। वह चिंता में पड़ गई। सोचने लगी, कहीं महर्षि का वरदान किसी अन्य दिशा को तो नही चला गया। अंडे खराब तो नही हो गये। इसी उतावलेपन में विंदा ने समय से पहले एक अंडे को खुद ही तोड़ दिया। उससे बड़ा ही तेजस्वी बालक निकला। उसके अंगों से तेज प्रकाश निकल रहा था। किंतु समय से पहले अंडा तोड़ दिये जाने के कारण उसका पूरा विकास नही हो पाया था। उसके कुछ अंग अविकसित रह गये।
बालक का नाम अरुण रखा। मां के उतावलेपन के कारण अविकसित रह गये अरुण ने विंदा को शाप दे दिया। कहा जिसकी बराबरी करने के चक्कर में तुमने मेरे साथ ऐसा किया। भविष्य में तुम्हें उसकी नौकरानी बनकर रहना पड़ेगा। जब तुम्हारा दूसरा पुत्र अंडे से निकलेगा तब वही तुम्हें उस दुख से बाहर निकालेगा। उसके बाद अरुण सूर्य देव के सारथी बनें। उनका रथ चलाने लगे।
अरुण का शाप फलित हुआ और एक दिन विंदा कद्रु से एक शर्त हार गई। शर्त के मुताबिक विंदा को कद्रु की दासी बनना पड़ा। शर्त को जीतने के लिये कद्रु ने छल का सहारा लिया था। जिसमें उसने अपने 1000 पुत्रों को धोखेबाजी में शामिल होने को कहा। किंतु अधिकांश शर्पों ने उसके साथ छल करने के मना कर दिया। जिससे कुपित होकर कद्रु ने अपने ही पुत्रों को जल मरने का शाप दे दिया। कहा एक यक्ष होगा जिसमें तुम सब आत्महत्या करोगे। कुछ छोटी शक्ति वाले सांपों ने छल में कद्रु का साथ दिया। जिसके बल पर वह विंदा से जीती।
कुछ समय बाद विंदा का दूसरा अंडा फूटा उसमें से गरुण निकले। वे भगवान विष्णु के वाहक बनें। अपनी मां को कद्रु की गुलामी से मुक्त कराया।
समय बीतता गया। लाखों साल बाद द्वापर में कद्रु का शाप फलित हुआ। जिसमें उसने सभी सांपों के जल मरने की बात कही थी। महाभारत खत्म हुआ। पांडव जीते। वे राजपाठ अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को सौंपकर हिमालय चले गये। परीक्षित न्यायी, जनप्रित और पराक्रमी राजा थे। एक दिन वे जंगल में रास्ता भटक गये। धके हारे परीक्षित प्यास से बेहाल हो गये। कुछ दूर आगे ऋषि समीर का आश्रम दिखा। ऋषि उस समय ध्यान में थे। राजा परीक्षित ने उनके सामने जाकर पानी मांगा। किन्तु ध्यान में समाधिस्थ ऋषि उनकी बात सुन न सके। प्यास से व्याकुल परीक्षित का दिमाग ठीक से काम नही कर रहा था। उन्होंने इसे प्रजा द्वारा राजा का अपमान माना। गुस्से में पास ही मरा पड़ा एक सांप ऋषि तीर से उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया और चले गये।
कुछ समय बाद वहां ऋषि पुत्र श्रंगी आये। वे तेजस्वी और अत्यंत क्रोधी ऋषि थे। अपने पिता के गले में मरा, सड़ा पांप देखकर क्रोधित हो गये। और राजा परीक्षित को सात दिन में सांप काटने से मृत्यु का शाप दे दिया। ऋषि समीर को पता चला तो पुत्र द्वारा दिये शाप से बड़ा पछतावा हुआ। वे जानते थे ऋषि श्रंगी का शाप काटा नही जा सकता। राजा परीक्षित के पास सावधान रहने की सूचना भेजी। राजा परीक्षित ने मान लिया कि शाप मृत्यु का कारण बनेगा। किन्तु राजा होने के नाते सुरक्षा के इंतजाम करने जरूरी थे। इंतजाम किये गये। अभेद किला बनाया गया। वहां मंत्रों के विशेषज्ञ नियुक्त किये गये। जिन्हें किसी भी तरह का सांप घुसते ही पता चल जाता। इस व्यवस्था के चलते वहां सांपों का पहुंचना असम्भव था।
नागराज तक्षक ने इसे नागों का अपमान माना। अहंकार में उसने छल से राजा परीक्षित को मारने की योजना बनाई। वह छोटे कीड़े का रूप लिया। फलों की एक टोकरी में छिपकर राजा के कमरे तक पहुंच गया। वहां उन्हें डस कर मार दिया।
इस बात की जानकारी राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय को हुई। क्रोध में उन्होंने सभी सांपों को मारने का प्रण लिया। उसके लिये सर्प मारण महायज्ञ शुरू हुआ। जिसके प्रभाव से पाताल लोक, धरती लोक के सांप खिंचे चले आते थे। यज्ञ में कूद कर जान दे देते थे। पुरोहितों द्वारा शक्तिशाली आहुतियां दी जाती रहीं। नाग, सांप यज्ञ में भस्म होते रहे। एक समय आया जब पाताल लोक नागों से खाली हो गया। धरती के सांप भी मारे गये। तक्षक के मरने के इंतजार में यज्ञ चलता रहा।
तक्षक ने इंद्र लोक में शरण ली। वह यज्ञ में खींच लिये जाने के भय से इंद्र के सिंहासन से लिपट गया। शक्तिशाली मंत्रों और आहुतियों ने तक्षक के साथ इंद्र का सिंहासन उड़ा लिया। उस पर बैठे इंद्र धरती की ओर भी उड़ चले। इंद्र बेबस थे। तक्षक के साथ महायज्ञ में उनकी आहुति पड़ जाने का खतरा पैदा हो गया। तभी नागकुल के तेजस्वी युवा ऋषि आस्तिक महायज्ञ स्थल पर पहुंचे। उन्होंने राजा जनमेजय को नाग जाति के विनाश का पाप न लेने की सलाह दी। उनसे महायज्ञ रोक देने का आग्रह किया। राजा जनमेजय ज्ञानी और न्यायी थे। उन्होंने ऋषि का आग्रह मान लिया। महायज्ञ रोक दिया गया। नाग जाति बच गई।
उस दिन सावन की पंचमी थी। पाताल लोक यानी नाग लोक में तब से इसे नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।
नाग पंचमी मनाने की एक घटना कालिया नाग और श्रीकृष्ण से भी जुड़ी है।
क्रमशः
Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या