तीन जन्म पहले हुई छोटी सी चूक की सजाः इस जन्म की मृत्यु

तीन जन्म पहले हुई एक चूक इस जन्म में मृत्यु बनकर आ गई।
मृत्युंजय योग संस्थान के हर साधक के मन में सवाल था। गुरू मां जलकर क्यों मरीं? वह भी भगवान की सेवा करते समय पूजा के दीपक से। पूजा पाठ से तो लोगों की रक्षा होती है। उल्टे उसी से मृत्यु हो गई।
अदृश्य दुनिया का यह सवाल सबको परेशान करे था। यहां तक कि तमाम भावुक साधक भगवान के बारे में भला बुरा सोच रहे थे। उन पर सवाल खड़े कर रहे थे।
सब भगवान की लीला है। ऐसा जवाब किसी को संतुष्ट नही कर पा रहा था। सब पीछे छिपी सच्चाई जानना चाहते थे।
मुझे भी इस सवाल का जवाब चाहिये था।
सही जवाब ब्रह्मांड का हिसाब किताब रखने वालों के पास होगा।
और वो देवताओं की दुनिया से मिलेगा।
मगर कैसे ? कौन लाएगा वहां से जवाब?
मैने इस पर विचार किया। तय किया जो मरा है उसी को इस काम पर लगाएंगे।
वो थी मेरी पत्नी प्रीति देवी। प्रीति जो कि मेरी पत्नी के साथ ही मृत्युंजय योग के साधकों की गुरू मां भी थीं। वे अग्नि दुर्घटना में मरीं। सामान्य मान्यता है जो दुर्घटनाओं में मरते हैं वे प्रेत बन जाते हैं। कुछ शास्त्र भी इसी बात को कहते हैं। इस मान्यता को मानें तो प्रीति प्रेत बन गई होंगी।
ऐसे में उन्हें देवताओं की दुनिया में भेज पाना आसान नही होगा। पहले उन्हें प्रेतों की दुनिया से निकाला जाये। भवतरणी पार कराई जाये। फिर पितृ दुनिया में भेजा जाये। वहां से देवताओं की पक्ति में लाया जाये। देवताओं के बीच उन्हें स्थापित किया जाये।
उसके बाद ही उन्हें देवों की दुनिया में आने जाने की क्षमता मिलती।
यह सब उर्जा उत्थान से होना था। जिसके विधान शास्त्रों में दिये हैं।
वह सूक्ष्म जगत का अचूक विज्ञान है।
हमने सभी विधान अपनाये।
साथ ही ब्रह्मांडीय उर्जाओं का सीधा उपयोग करके उनके सूक्ष्म शरीर के पुनर्निमाण में जुट गया।
इस सिलसिले में उन्हें देवियों जैसे रूप में पहुंचाने की मेरी इच्छा पूरी हुई।
उन्हें देवताओं की दुनिया का रास्ता मिल गया।
किंतु देवताओं की दुनिया में सिर्फ आने जाने से ही काम नही बनने वाला था।
उर्जा उत्थान के उस चरण में अपनी बातों को कह पाना और देवताओं के जवाब को समझ पाना कठिन था।
उसका अभ्यास जरूरी था।
मगर अभ्यास कैसे हो ? तब तक तो हम खुद ही उनसे मिलने वाले जवाबों को डिकोड नही कर पा रहे थे। हम उनसे (प्रीति जी से) सम्पर्क करते। वे तुरंत सम्पर्क में आ जातीं। हम उनसे सवाल पूछते। उनके जवाब आने लगते। किन्तु हम उन्हें समझ न पाते। शायद हमारी उर्जा तरंगे अलग थीं, इसलिये। हम संवाद का अभ्यास करते रहे। साथ ही उनकी ब्रह्मांडीय शक्तियों को बढ़ाने के लिये उन पर उर्जा शक्तिपात, अध्यात्मिक अनुष्ठान आदि नियमित करते रहें।
एक महीना लगा। उनके जवाब समझ आने लगे।
दरअसल उनके जवाब शब्दों के रूप में थे ही नहीं। बल्कि उर्जा तरंगों के रूप में होते हैं। उन्हें अपनी अवचेतन शक्ति में ले जाकर डिकोड करना होता है।
इतना जानने के बाद पता चला कि वे जलकर क्यों मरीं?
उनकी सूक्ष्म चेतना के द्वारा मिले जवाब के मुताबिक
अब से तीन जन्म पहले वे 4 सहेलियों थीं। उनमें दो बहनें दीपशिखा और ब्रह्मशिखा ब्राहमण पुत्री थीं। एक सहेली विंदेश्वरी सैनिक पुत्री थी। चौथी ये व्यापारी की पुत्री थीं। इनका नाम तब भी प्रीती ही था। ब्राहमण पुत्री में एक दीपशिखा बहुत अच्छी साधिका थी। उन दिनों वह अपने पिता के मार्गदर्शन में योगिनी सिद्धी साधना कर रही थी। दीपशिखा सिद्धि के बहुत करीब थी। उनका इष्ट योगिनी से सम्पर्क होना शुरू हो गया था। बस प्रत्यक्षीकरण शेष था। उनकी साधना से सब खुश थे।
दीपशिखा से प्रीती का विशेष लगाव था। अधिकांश समय दोनो साथ ही बिताती थीं। साधना में प्रीती उसे बहुत सहयोग करती थी। प्रीती के पिता धनवान थे। सो दीपशिखा की साधना सामग्री का इंतजाम दीप, धूप, माला, फूल, भोग प्रसाद, साधना योग्य खाना, पीना सब प्रीती ही करती थी। एक तरह से दीपशिखा की साधना का भौतिक हिस्सा प्रीती पर निर्भर था। प्रीती को इस सब में बड़ी खुशी मिलती थी।
एक सुबह दीपशिखा ध्यान साधना में बैठी थी। उसने दीपक नही जलाया था। तभी प्रीती वहां गई।
सहेली दीपशिखा की साधना अच्छी हो यह सोचकर प्रीती ने कमरे में पूजा वाला दीपक जला दिया। धूप से सुगंध कर दी। भोग प्रसाद का सामान वहां रखकर चली गई।
अक्सर यही होता था।
उस दिन प्रीती से चूक हो गई। दीप जलाने वाली अग्नि को बिना बुझाये ही वह वहीं पास में छोड़ गई।
यह प्रीती की लापरवाही वाली आदत में था। वह उपयोग करने के बाद आग इधर उधर छोड़ देती थी। सब टोकते थे। किसी दिन कोई बड़ी दुर्घटना हो जाएगी। मगर प्रीती की यह आदत न बदली।
अल्हडपन में जवाब देती भगवान हम सबकी रक्षा करेंगे।
उस दिन रक्षा नही हुई। हवा चली। पास पड़ी आग उड़कर दीपशिखा के कपड़ों तक पहुंच गई। ध्यान में लीन दीपशिखा आग की चपेट में आ गई। वह बुरी तरह जल गई। वैदों का इलाज चला। 9 दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई।
भारी आत्मग्लानि से भरी प्रीती ने दीपशिखा की खूब सेवा की।
उसी बीच दीपशिखा के ब्राहमण पिता ने दुख और क्रोध में आकर प्रीती को शापित कर दिया। कहा सैकड़ों बार इस लड़की को सबने समझाया आग इधर उधर मत डाला करो। नही मानी। अब जब कभी खुद इसी तरह जलेगी तब पता चलेगा।
उनका शाप लग गया। तीन जन्म बाद प्रीती उसी तरह की परिस्थितियों में जलकर मृत्यु को प्राप्त हुईं।
अपने पिता के शाप देने तक दीपशिखा जिंदा थी। उसने प्रीती से कहा चिंता न करो बहन। पिता जी ने क्रोध में ऐसा बोल दिया है। मै तुम्हें फिर मिलुंगी। अगर ऐसा कुछ हो भी जाये तब तुम योगिनी बनना। मै तुम्हें सिद्ध करूंगी। दीपशिखा ने प्रीती के हाथों में अंतिम सांस ली।
इस जन्म में चारों सहेलियां फिर इकट्ठा हुईं। कक्षा 6 से ग्रेजुएशन तक साथ पढ़ीं। किस तरह दीपशिखा इस बार शिखा बनी और प्रीती की मृत्यु का कारण भी। इसे हम आगे जानेंगे। साथ ही जानेंगे भटक रहे असंख्य प्रेतों की सही जगह क्या है? उन्हें वंशज ठीक करेंगे या यमदूत?
क्रमशः।
Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या