मुर्दों की दुनिया

ऊपर वाले का विज्ञान बड़ा सटीक है। सिस्टम बिल्कुल पक्का है। तरीका बहुत अजीब है।
उसने अपने काम की जिम्मेदारी जिसे सौंपी, उसे कभी मरने नही देता। और अपने काम के लिये जिसे बनाया उसे मार डालता है। उसे ही मृत्यु देकर मुर्दा बना देता है।
मृत्यु ! एक अंत, एक आरम्भ। अंत इस दुनिया से रिश्ते का। आरम्भ दूसरी दुनियाओं का।
जीवन- मृत्यु के सफर में चार दुनियाओं यानी चार आयामों का पड़ाव है।
पहली दुनिया मृत्यु लोक यानी मुर्दों की दुनिया।
दूसरी दुनिया सूक्ष्म लोक यानी यम की दुनिया।
तीसरी दुनिया आत्म लोक यानी जीवात्मा की दुनिया।
चौथी दुनिया देव लोक यानी देवताओं की दुनिया।
ब्रह्मांड में दुनियायें तो और भी हैं। किन्तु जीवन चक्र में इन्हीं चार की मुख्य भूमिका होती है।
दुनिया की शुरूआत एक आत्मा से हुई। जो सुपर कम्प्रेस एनर्जी के रूप में थी। तब दुनिया नही थी। समय नही था। ग्रह नक्षत्र नही थे। सोच नही थी। समझ नही थी। इच्छा नही थीं। कर्म नही थे। सिर्फ एक उर्जा पिंड रूपी आत्मा के अलावा कुछ भी नही था। करोडों खरब साल पहले एक दिन अपने मन की इच्छा उसमें भारी विस्फोट हुआ। वह फट गई। दो हिस्सों में बंट गई। एक हिस्सा पुरुष प्रकृति की एनर्जी का। दूसरा स्त्री प्रकृति की एनर्जी का।
पुरुष प्रकृति वाली एनर्जी में आत्मा वाले मूल गुण बने रहे। इसलिये वह आत्मा ही रही। किंतु उसमें विस्फोट जारी रहे। जिससे अनगिनत अंश अलग हो गये। उन्हें भी आत्मा कहा गया। पहली वाली आत्मा को प्रथम या परम माना गया। तो वह परम आत्मा यानी परमात्मा हो गई। परमात्मा से निकली आत्माओं को काम पर लगाया जाये। इसके लिये जीवन चक्र शुरू हुआ। मृत्यु उसका अनिवार्य हिस्सा बनी।
स्त्री प्रकृति वाली एनर्जी में भी विस्फोट होते रहे। अभी तक हो रहे हैं। उनसे ब्रह्मांड बने। ग्रह नक्षत्र बनें। आकाश गंगायें बनीं। समय बना। स्रष्टि बनी। प्रकृति बनी। जीव बने। लोग बने। देव बने। दानव बने। मिट्टी, पानी, लोहा, सोना, चांदी सहित सभी धातुवें। हीरा, पन्ना, माणिक, नीलम सहित सभी रत्न। सभी अन्न, सभी औषधियां, सभी वनस्पतियां, सभी नदियां, सभी पहाड़, आसमान, अंतरीक्ष। सभी लोक। जो कुछ आंखों से दिख रहा है वह और जो नही रहा है वह भी। सब इसी एनर्जी से बना।
इसी से सूक्ष्म शरीर रूपी जीव भी बना है।
सनातन ज्ञान में इन्हें ही देवी शक्ति कहा जाता है।
जीवन चक्र की चार शक्तियां हैं।
पहली परमात्मा। दूसरी आत्मा। तीसरी शक्ति सूक्ष्म शरीर वाला जीव। चौथी शक्ति पंचतत्वों वाला शरीर।
संसार चलाने के लिये परमात्मा ने खुद की शक्ति से आत्मा को बनाया। उसी को सारी जिम्मेदारी सौंपी। आत्मा परमात्मा की सबसे महत्वपूर्ण प्रापर्टी है। उसे अविनाशी बना दिया। साथ ही तय किया कि आत्मा भी परमात्मा की तरह दुख और दोषों से मुक्त रहे। ताकि जरूरत पड़ने पर उसे किसी भी समय वापस परमात्मा में मिलाया जा सके।
कामकाज की जिम्मेदारी निभाने वाले और जरूरतें पूरी करने वाले दोष और दुखों से मुक्त नही रह सकते। समय, काल, परिस्थितियों के हिसाब से उन्हें कुछ न कुछ ऐसा करना ही पड़ता है। जिसको न करने के नियम बने हैं। भगवान विष्णु को लीजिये। अनेकों अवसरों पर उन्हें वे काम करने पड़े। नियमानुसार जिन्हें नही किया जाना चाहिये। वहां हम भगवान की लीला कहकर बात को टाल देते हैं। किन्तु हर व्यक्ति को लीलाधारी नही कहा जा सकता। ऐसे में जिम्मेदारी निभाते हुए आत्मा निर्दोष बनी रहे, यह सम्भव नही।
तब आत्मा के सहयोग में सूक्ष्म शरीर वाला जीव बनाया गया। आत्मा की सारी जिम्मेदारियां उसे सौंप दी गईं। साथ ही हर सही, गलत काम की जवाबदेही भी उसी पर डाल दी गई। इस तरह कर्मों का भोग भी उसी पर चला गया। कर्म फल भोग के लिये उसे पहले जन्म से अंतिम जन्म तक बनाये रखा जाता है। आत्मा की तरह उसकी भी मृत्यु नही होती।
सूक्ष्म शरीर जिन ब्रह्मांडीय उर्जाओं से बना है। वह स्रजन करने वाली शक्ति की अत्यंत महत्वपूर्ण प्रापर्टी है। इसीलिये भी आत्मा की तरह सूक्ष्म शरीर को मृत्यु से मुक्त रखा गया। वह भी कभी नही मरता। न ही वह बदलता है। आत्मा के साथ जिस सूक्ष्म शरीर को जोड़ा गया है। अनंत काल तक आत्मा को उसी में रहना है। उसी से काम लेना है। दोनो मिलकर जीवात्मा कहलाते हैं।
आत्मा की तरह सूक्ष्म शरीर भी सीधे काम नही कर सकता। उसके काम करने के लिये पंचतत्वों का शरीर बनाया गया। जो मां के गर्म से जन्म लेता है। इसी से जीवन चलता है। आत्मा और सूक्ष्म शरीर इसी में होते हैं। मुर्दों की दुनिया में इसका राज है। मुर्दों की दुनिया इसलिये क्योंकि धरती को मृत्यु लोक कहा जाता है। मृत्यु वाला शरीर यहीं होता है। आत्मा और सूक्ष्म शरीर के निकलते ही वह मुर्दा हो जाता है।
इसीलिये कुछ विद्वान धरती को मुर्दों की दुनिया भी कहते हैं।
मृत्यु तो इंद्र की भी होती है। यमराज की भी होती है। सभी दुनियाओं और लोकों में होती हैं। किन्तु मुर्दों की दुनिया कहीं नही होती। वहां मर कर सड़ने वाले पंचतत्वों के शरीर नही होते। वहां मरने के बाद शरीर मुर्दा नही बनता। सूक्ष्म उर्जाओं में मिल जाता है।
जीवन मृत्यु के चक्र का विज्ञान बहुत सटीक है। मृत्यु की कोई डेट फिक्स नही होती। क्योंकि ऊपर वाले यहां दिन महीनों का कलेंडर नही होता। मृत्यु के लिये सांसों की गिनती और जगह फिक्स होती है। किसी भी तरह से व्यक्ति अंतिम सांस के लिये निश्चित जगह पर पहुंच जाता है। वहां ली गई आखिरी सांस मृत्यु में बदल जाती है।
हर व्यक्ति को गिन कर सांसे मिली हैं। उनके पूरे होने तक अपने काम, जिम्मेदारियां निपटानी होती हैं।
बड़ी ही अजीब बात है कि ऊपर वाले ने जिस शरीर को काम करने के लिये बनाया है। आत्मा की जिम्मेदारियां पूरी करने के लिये बनाया है। उसी को मार डालता है। उसी को मृत्यु देता है। काम पूरे होना न होना। अलग मुद्दा है। समय, काल परिस्थियां भी इसके लिये जिम्मेदार होती हैं। शरीर सारा जीवन ईश्वर द्वारा दिये कामों को पूरा करने में ही लगा रहता है। फिर भी उसे ही मृत्यु ? उसे ही बीमारियां ? उसे ही तकलीफें ?
आगे हम इसके कारणों पर चर्चा करेंगे।
क्रमशः।
Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या