जीवन की चौथी दुनियाः15

जीवात्मा अपने जन्म के लिये गरीब परिवार क्यों चुनती है

देवताओं की दुनिया में तय होता है कौन कहां और कब जन्म लेगा। इसका अधिकार जीवात्मा को दिया जाता है। उन्हें अपने माता, पिता, परिवार को चुनना होता है। सुख, दुख चुनने होते हैं। अमीरी गरीबी को चुनना होता है। समस्याओं को चुनना होता है। उन्हें जीवात्मा अपनी मर्जी से चुनती है। जन्म से पहले जीवात्मा को पता होता है। जहां जन्म ले रही है, वहां किन मुसीबतों का सामना करना होगा। किस तरह का संघर्ष होगा? फिर भी वह उन्हें खुशी खुशी अपनाती है। मेरे एक सवाल के जवाब में उनका जवाब आया। वे मृत्यु के बाद वाली दूसरी दुनिया में हैं। मै इस दुनिया में।

मरने के बाद पहली से चौथी दुनिया तक क्या होता है? इस रहस्य को जानने के लिये हमने दुनिया छोड़ चुकी अपनी पत्नी प्रीति देवी से सूक्ष्म सम्पर्क का निर्णय लिया। इसके लिये शास्त्रों में दिये विधान और उर्जा विज्ञान का विधान अपनाया। अब हम औरिक सम्पर्क में हैं। उनकी दुनिया अलग है। हमारी दुनिया अलग। फिर भी उर्जा तरंगों के जरिये हम एक दूसरे से अपनी बात कह लेते हैं। सवालों के जवाब ले दे लेते हैं। यह कोई सुपर साइंस नही है। न ही मानसिक दिवालियापन। इसे कोई भी कर सकता है। जरूरत है ब्रह्मांडीय उर्जाओं के सटीक प्रयोग की।

मेरा सवाल। अगले जन्म के लिये जीवात्मा को क्या करना होता है? देवताओं की दुनिया में उनके साथ कैसा व्यवहार होता है? क्या वहां देवता सहायता के लिये आगे आते हैं? बा यहां भी यमलोक की तरह भटकाव का सामना करना पड़ता है?

उनका जवाब। हांजी। वहां अलग अलग स्तर की आत्माओं के लिये देवताओं के समूह हैं। आत्मा को अगले जन्म के लिये तैयार करना उनका काम है। पहुंचते ही देवता सूक्ष्म शरीर को उसकी आत्मा से मिला देते हैं। दोनो के मिलने पर जीवात्मा का स्वरूप प्राप्त होता है। दोनो के मिलते ही जन्मों की याददास्त खुल जाती है। उसी के मुताबिक देव समूह जीवात्मा को अगले जन्म के सुझाव देते हैं।

पहले पहुंची आत्मा वहां अपने सूक्ष्म शरीर का इंतजार कर रही होती है। मृत्यु होते ही आत्मा सीधे देवताओं की इस दुनिया में पहुंच जाती है। अगली यात्रा के लिये अपने सूक्ष्म शरीर का इंतजार करती है। अविनाशी होने के कारण आत्मा को किसी और लोक में रोका नही जाता।
स्वर्ग-नर्क का सिद्धांत भी आत्मा पर लागू नही होता। यह सब सूक्ष्म शरीर के विषय हैं। उसे ही हर स्तर पर खुद को ठीक करते कराते आगे बढ़ना होता है।

शरीर छूटने के बाद जीव आगे की यात्रा सूक्ष्म शरीर के रूप में पूरी करता है। प्राण उर्जा से बना सूक्ष्म शरीर जिंदा रहने पर भी साथ रहता है। कुछ विद्वान इसे प्राण शरीर या सूक्ष्म चेतना भी कहते हैं। यही प्राण है। इसके निकलते ही शरीर मृत हो जाता है। पहले आत्मा शरीर छोड़ती है। उसके पीछे सूक्ष्म शरीर बाहर निकलता है। शरीर से निकल कर यमलोक जाता है। वहां रुकावट न हुई तो इसका अगला पड़ाव पितृ लोक होता है। पितृ लोक जीवात्मा की अपनी दुनिया है। वे वहां लम्बे समय तक रहकर आगे की यात्रा की तैयारी कर सकते हैं।
देव पंक्ति में शामिल जीवात्माओं को ही वहां प्रवेश मिलता है। धरती पर यह प्रक्रिया मृतात्मा को पितृों में शामिल किये जाने के नाम से जानी जाती है।

मेरा सवाल। क्या अलग अलग स्तर की आत्माओं के लिये अलग अलग स्तर के देवता होते हैं ?
उनका जवाब। हां, हर आत्मा का अपना स्तर होता है। यह उनके कर्मों के आधार पर तय होता है। जिस तरह जीवन में लोगों के सुख दुख के अनुभव एक से नही होते। उसी तरह मुत्यु के अनुभव भी सबके एक जैसे नही होते। आत्मा के स्तर के अनुसार होते हैं। कोई मृत्यु से डरा भागता है। कोई मृत्यु के प्रति सहज रहता है। जो सहज रहता है, उसकी आत्मा उच्च आयाम में जाने लायक होती है। उनके लिये देवताओं का विशेष समूह होता है। उन्हें उच्च श्रेणी के जन्म की सलाह दी जाती है। वहां क्या और कैसे करना है। इसके सुझाव भी दिये जाते हैं।

मेरा सवाल। जो आत्मायें हायर डाइमेंशन में जाने लायक नही, उन्हें सलाह देने वाले कैसे देवता मिलते हैं?
उनका जवाब। देवता तो देवता हैं। सब बहुत अच्छे से व्यवहार करते हैं। यहां तक कि आत्मा और सूक्ष्म शरीर को मिलाने से पहले सभी से पूछते हैं अगला जन्म तुरंत लेना है या रुक कर। जो लोग रुकना चाहते हैं। उन्हें आत्मा के उत्थान का संकल्प दिलाया जाता है।
इसे ऐसे समझिये जैसे पढ़ाई पूरी होने पर परिवार के लोग बच्चों से कामकाज के लिये कहें। मगर एक बच्चा कहे वह अभी काम नही करना चाहता। तो उससे कहा जाएगा ठीक है। किन्तु घऱ में खाली नही बैठ सकते। जब तक काम नही करते तब तक उच्च शिक्षा लो। खुद को ऊंचे स्तर के काम के लिये तैयार करो। जैसा कि मेरे साथ हुआ। उन्होंने अपना उदाहरण दिया।

मेरा सवाल। जो लोग अगला जन्म तुरंत लेना चाहते हैं। उनको कैसे सुझाव दिये जाते हैं?
उनका जवाब। अधिकांश सूक्ष्म चेतनायें तुरंत ही जन्म लेने के लिये तैयार होती हैं। जन्म तुरंत लेना है यह पक्का होते ही देव समूह आत्मा को सूक्ष्म शरीर से मिलवा देते हैं। मिलते ही वह जीवात्मा रूप में आ जाती है। जन्म के लिये तैयार। वहां जीवात्मा रूप में आते ही हर जन्म की घटनायें याद आ जाती हैं। जिनसे पता चलता है कि उस जीवात्मा को क्या करना था और उसने क्या नही किया। वहां गलत सही कामों पर बात नही होती। सिर्फ छूटे हुए कामों पर चर्चा होती है। परमात्मा के कामों में क्या करना था और उसमें से क्या नही किया। जो नही किया उसे पूरा करने के उद्देश्य से जन्म लेने के देव सुझाव दिये जाते हैं। ऐसे माता, पिता, रिश्तेदार, परिवार का चुनाव होता है जहां छूटे कार्य पूरे करने के अवसर हों। उस परिवार में अमीरी, गरीबी पर ध्यान नही दिया जाता। क्योंकि परमात्मा के काम पूरे करने के लिये इन चीजों की जरूरत नही होती।

सभी मामलों में जीवात्मा को पता होता है। जहां जन्म ले रहे वहां क्या है क्या नही। धन है या नही। साधन हैं या नही। माता पिता सफल हैं या असफल। शांत हैं या लड़ाकू। संस्कारी हैं या नशेबाज। सब कुछ जान समझ कर ही जीवात्मा जन्म के लिये परिवार चुनती है। उनकी पूर्ति या सुधार के लिये ही जन्म लेते हैं। कई जन्मों में छूटे कार्यों का पता चलने पर जीवात्मा भ्रमित होती है। पहले कहां जायें। तब निर्णय लेने में देवताओं के सलाह मंडल सहायता करते हैं।

जो तुरंत जन्म नही लेते। उनकी आत्मा और सूक्ष्म चेतना का उत्थान कैसे होता है ? कौन कराता है? क्या वहां से जीवात्मा सीधे देवी, देवता बनने के लिये भी प्रयास करती है? आगे जानेंगे।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या