जीवन की चौथी दुनियाः 26

योगिनी बनने के लिये देवी लोक में प्रवेश

देवी लोक पहुंचोगी तो तुम्हें वहां हर तरफ मणि व रत्नों का उपयोग मिलेगा। सूर्य, चंद्रमा, तारे खम्भों में मणियों की तरह जड़े मिलेंगे। उन्हीं से मणि द्वीप प्रकाशित होता है। कुछ मणि व रत्न तो ग्रहों के आकार से भी बड़े मिलेंगे। वहां आकाश गंगायें मणियों व रत्नों से भरी मिलेंगी। इसीलिये देवी लोक को मणि द्वीप भी कहा जाता है। मै शरीर छोड़ चुकी अपनी पत्नी की सूक्ष्म चेतना को देवी लोक की जानकारी दे रहा था।

देवताओं की दुनिया से निकल कर शिव शिष्या के रूप में शिव की दुनिया में जाओगी। तो तुम्हारे सामने तीन आप्सन होंगे। मैने पत्नी प्रीति की आत्मा को बताया। या तो तुम वहीं से मोक्ष प्रापत कर लो। या शिव भक्ति से भरे नये जीवन की जिम्मेदारियों के लिये कैलाश के शिव लोक में जाओ। या योगिनी स्वरूप का संकल्प पूरा करने के लिये देवी लोक में जाओ। प्रीति इन दिनों शिव की दुनिया में जाकर शिव गुरू से मिलने के अनुष्ठान में लगी हैं। बड़े ही समर्पण, लगन, मनोयोग से अनुष्ठान का विधान पूरा कर रही हैं। जिससे उनकी शिव धाम की कामना में कोई संदेह नही दिखता।

देवी लोक में क्या है? उनकी जिज्ञासा ने दिशा बदली। अब वे देवी लोक के बारे में जानने की इच्छुक हो गईं। पूछा वहां जाकर क्या करना होगा? क्या अब अलग से अनुष्ठान करना होगा? क्या वहां देवी मां से भेट होगी?

ध्यान से सुनिये देवी जी। मैने कहा, सब बताता हूं।
जो लोग नये साधक/ पाठक जुड़े हैं उन्हें बताते चले कि यह दो दुनियाओं का संवाद है। मेरी पत्नी प्रीति मृत्यु के बाद इस समय देवताओं की दुनिया में हैं। शरीर छूटने के बाद मृतात्मा प्रेत लोक या यमलोक जाती है। धरती पर वंशजों द्वारा उनके लिये सम्पन्न पितृ आदि अनुष्ठान की उर्जाओं से मृतात्मा के सूक्ष्म शरीर का पुनर्जनन होता है। उसके बाद वे पितृ लोक जाती हैं। देव पंक्ति में स्थान मिलने के कारण उन्हें पितृ देव कहा जाता है। धरती पर लगातार जीवात्मा उत्थान अनुष्ठान हों तो उन्हें सकारात्मक उर्जायें निरंतर मिलती हैं। जिससे देवताओं की दुनिया में प्रवेश मिल जाता है। जिसे देव लोक कहा जाता है। शास्त्रों के इन विधानों से प्रीति को देवलोक में स्थान मिला।
आध्यत्मिक अनुष्ठानों और उर्जा विज्ञान की तकनीक अपनाकर हमने उनसे सम्पर्क साधा। अब हम सम्पर्क में हैं। वे उस दुनिया से हम इस दुनिया से एक दूसरे से बातें कर लेते हैं। सवालों के जवाब ले लेते हैें। यह चमत्कार नही। न ही कोई सुपर साइंस है। शरीर छोड़ गये अपनों से सम्पर्क के लिये इसे कोई भी अपना सकता है।

प्रीति अगला जीवन योगिनी स्वरूप में बिताना चाहती हैं। उन्होंने भगवान शिव को अपना गुरू धारण किया है। इस सावन उनसे मिलने शिव धाम जाना चाहती हैं। उसके लिये मेरे बताये विधान पूरे् कर रही हैं। इसी संदर्भ में हम ये चर्चा कर रहे हैं। चर्चा उनके लिये जो मृत्युंजय योग के साधक हैं और प्रीति को गुरू मां मानते हैं। उनके बारे में सब कुछ जानना चाहते हैं।

देवी लोक ब्रह्मांड की स्रजनात्मक उर्जाओं का महा केंद्र है। मैने प्रीति के सवालों के जवाब में बताया। वह ब्रह्म लोक से ऊपर के आयाम में स्थित है। उसे मणि द्वीप या सर्व लोक भी कहा जाता है। मणि द्वीप बहुत की दिव्य और अलौकिक है। यहां पहुंचना आसान नही। शास्त्र बताते हैं त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी यहां जाने के लिये उत्सुक रहते हैं। सृष्टि की शुरूआत में त्रिदेवों को अहसास हुआ कि संसार के स्रजन और संचालन में कोई अदृश्य शक्ति काम कर रही है। उन्होंने पता लगाने का प्रयास किया। साधनाओं, तपस्याओं के बाद देवी लोक का पता चला। साधनाओं से अतिरिक्त उर्जायें अर्जित करके त्रिदेव देवी लोक पहुंच सके। वे वहां की सुंदरता, भव्यता, वैभव, शक्तियों को देखकर हैरान रह गये। सब कुछ कल्पना से परे था। उन्हें पता चला आदि शक्ति वहीं से दुनिया बना और चला रही हैं। इसमें उन्हें सदाशिव का साथ मिला है।

शिव का साथ कैसे मिला है उन्हें? प्रीति ने सवाल पूछा। त्रिदेव तो अलग थे, हैरान थे, दर्शक थे।

जब बात त्रिदेवों की होती है तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश के बारे में कहा जा रहा होता है। शिव के बारे में नही। मैने बताया। अलग अलग काल, परिस्थितयों में शिव अलग अलग रूपों में जिम्मेदारी निभाते हैं। शंकर, शम्भू, रुद्र, महेश आदि लगभग एक हजार स्वरूप। जिनका जिक्र शिव सहस्त्र नाम में आता है। महेश मतलब महा + ईश = महेश। शिव का यही रूप त्रिदेवों में एक हैं। शिव के सभी रूप भी शिव के बारे में सब कुछ नही जानते। उन्हें इसकी अनुमति या जरूरत भी नही। उनकी व्यस्तता अपनी जिम्मेदारी निभाने में रहती है।

अभी तुम शिव के स्वरूपों को समझने की बजाय देवी लोक के बारे में समझों। मैने प्रीति से कहा। ब्रह्म लोक से ऊपर। 14 लोक और 32000 डाइमेंशन में फैला देवी लोक विशाल शक्तियों से भरा मिला। अंतरीक्ष में लटका देवी लोक पूरे ब्रह्मांड की छतरी है। ब्रह्मांड उसी की छत्र छाया यानी सुरक्षा में है। देवी लोक में चिंता नही लगती। बुढ़ापा लगी लगता। काम, क्रोध, लोभ का प्रभाव नही होता। देवी भक्त यहां स्वच्छंद और भय मुक्त जीवन जीते हैं। उनके लिये यहां सुखों की कमी नही।

देवी लोक के मणि द्वीप पहुंचोगी तब तुम्हें पता चलेगा कि वह अमृत सागर से घिरा है। सागर के किनारे मणियों और रत्नों से बने हैं। वहां पेड़ बड़े ही अलौकिक मिलेंगे। उन पर रत्न और मणियां लटकती मिलेंगी। फल वाले पेड़ तो तुम्हें बड़े ही अचरज में डाल देंगे। उनमें हर मौसम के फल लगे दिखेंगे। दुध, शहद और घी की नदियां मिलेंगी। देवी लोक के वन, उपवन तुम्हारा मन मोह लेंगे। वहां तितलियों की तरह अनगिनत अप्सरायें, गंधर्व उड़ते, विचरते मिलेंगे। हवा में देव संगीत और मंत्रों की गूंज सुनाई देगी। वहां के कल्पवृक्ष तुम्हारी हर कामना पूरी करने के लिये तैयार मिलेंगे।

देवी लोक में तुम्हें हर तरफ मणि व रत्नों का उपयोग मिलेगा। वहां सूर्य, चंद्रमा, तारे खम्भों में मणियों की तरह जड़े मिलेंगे। उन्हीं से मणि द्वीप प्रकाशित होता है। कुछ मणि व रत्न तो ग्रहों के आकार के मिलेंगे। वहां कुछ आकाश गंगायें मणियों व रत्नों से भरी मिलेंगी। इसीलिये देवी लोक को मणि द्वीप भी कहा जाता है।

तुम अमृत सागर की तरफ से मणि द्वीप में प्रवेश करोगी। मैने बताया। आगे उत्तर की दिशा में लोहे से बना विशाल किया मिलेगा। जो 7 योजन यानी लगभग 700 किलोमीटर होगा। योजन दूरी नापने की पुरानी इकाई है। विद्वान 1 योजन को 8 से 128 किलोमीटर तक मानते हैं। उस कले में 4 सुरक्षा चौकियां मिलेंगी। जहां बहुत कड़ी सुरक्षा होती है। उसे पार करने पर तुम्हें कांसे की धातु से बना विशाल सुरक्षा द्वार मिलेगा। उसके बाद प्रवाल मणि से बना भव्य द्वार मिलेगा। उससे आगे बढ़ोगी तो नवरत्नों से बने द्वार मिलेंगे। यही देवी के सारे अवतार अपनी शक्तियों के साथ वास करते हैं।

उससे आगे बढ़ने पर तुम्हें चिंतामणि मणियों से बना विशाल महल मिलेगा। इसे चिंता मणि भवन कहा जाता है। जिसके खम्भों में सूर्य, चंद्रमा, तारे जड़े मिलेंगे। उन्हीं से देवी लोक प्रकाशित होता है। यह प्रकाश अंतरीक्ष में लगभग 10 लाख किलोमीटर तक फैला है। चिंता मणि भवन ही आदि शक्ति का निवास है। वहां 4 भव्य मंडप मिलेंगे। पहला है श्रंगार मंडप। जहां गीत संगीत, नृत्य कला आदि का आयोजन होता मिलेगा। दूसरा मंडप है मुक्ति मंडप। वहां मां आदि शक्ति भक्तों को मुक्ति देती मिलेंगी। तीसरा है ज्ञान मंडप। जहां मां भवानी भक्तों को ज्ञान देती मिलेंगी। तुम्हें भी वहां देवी ज्ञान लेना है। मैने प्रीति को बताया। चौथा मंडप है एकांत मंडप। वहां मां आदि शक्ति संसार की रक्षा के लिये एकांत चिंतन करती हैं। तुम्हें वहां भीतर प्रवेश नही करना है।

चिंता मणि भवन में मां आदि शक्ति भगवान सदा शिव के साथ विराजमान हैं। जया, विजया, अजिता, अपराजिता, अघोरा, नित्या, विलासिनी, मंगला आदि देवियां सेवा में मिलेंगी। उनके अलावा अनेकों योगिनियां भी आदि शक्ति की सेवा में मिलेंगी। तुम भी उनमें शामिल हो जाओगी। आदि शक्ति की सेवा के दौरान तुम्हारे भीतर योगिनी शक्तियों का जागरण होगा। योगिनी स्वरूप की स्थापना होगी। लोक कल्याण का प्रशिक्षण होगा। देव कार्य की नियुक्ति होगी।

ऐसा कब होगा? प्रीति ने सवाल किया।

जब तुम शिव धाम पहुंचोगी। मैने बताया। तब तुमसे पूछा जाएगा क्या चाहती हो। मोक्ष या शिव भक्ती वाला दूसरा जीवन या कुछ और। तब तुम योगिनी स्वरूप के देव संकल्प की जानकारी दोगी। उसी समय मां आदि शक्ति की अनुमति से तुम्हें देवी लोक भेज दिया जाएगा। किन्तु इसकी मजबूरी नही है। तुम वहां से मोक्ष का रास्ता भी चुन सकती हो। उसमें देव संकल्प तोड़ने का कोई दोष नही लगेगा। फैसला तुम्हें लेना होगा। इसके लिये मेरी या किसी अन्य की सलाह बिल्कुल नही लेनी चाहिये।

वे सोच में पड़ गयीं। और मेरे पास से चली गईं।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या