जीवन की चौथी दुनियाः 17

योगिनी स्वरूप की छटपटाहट

ये जी! क्या अब मै बच्चों से मिल सकती हूं? शरीर छोड़ गई पत्नी प्रीती ने मुझसे एक बार फिर वही सवाल किया। जिसकी मनाही थी। वे दूसरी दुनिया से आकर अपने बच्चों से मिलना चाहती थीं।

सवाल कठिन, बहुत कठिन। मेरे लिए जवाब देना उससे भी कठिन था। अपने बच्चों से मिलने के लिए छटपटाती मां। जिसे एक दुनिया से दूसरी दुनिया में जाने की क्षमता हासिल हो। चाहे तो पलक झपकते मिल लें। संकल्पों की मर्यादा न हो तो उन्हें कोई नहीं रोक सकता। मै भी नहीं। देवता भी नहीं। क्योंकि यह उनके अधिकारों में शामिल है।

किंतु जवाब में हर बार ‘ न ‘। इस बार भी मेरा जवाब न ही था। मैने कहा तुममें माया मोह पैदा हो रहा है। ऐसे में देवताओं को दिए वचन का क्या होगा? इसके लिए तुम्हें त्याग करना ही पड़ेगा। देव योजना का सम्मान करना ही पड़ेगा। अब पीछे नहीं जा सकती। गई तो हजारों जन्मों का दोष लगेगा।

मै पीछे बिल्कुल नहीं जा रही। बस मन करता है बच्चों को देखूं। जरूरत लगे तो उनकी मदद करूँ। रक्षा करूं। आपसे वादा करती हूं उन्हें पता भी नही चलने दूंगी। देखकर आ जाया करुंगी। मन की बात बताते समय उनकी पीड़ा झलक पड़ी। पति होने के नाते उनकी पीड़ा में मेरी भी पीड़ा जुड़ गई। किंतु इस कमजोरी को मै जाहिर नहीं कर सकता था। वरना उनका धैर्य बिखर जाता। उन्हें आगे बढ़ाना ही था।
सो मेरी ‘ न ‘ ने निर्मम चट्टान की तरह उनके मन को कुचल दिया।

तुम्हें किसकी याद ज्यादा आती है? मैने थोड़ी तसल्ली देने के लिए उनसे पूछा।

खुशबू की। उन्होंने झट से जवाब दिया। जैसे लगा हो कि मै हमारी छोटी बेटी खुशबू से मिलने के लिए हां कह दूंगा।

और कोमल की? मैने धीरे धीरे विषय बदलने के उद्देश्य से बात को यूं ही आगे बढ़ाते हुए पूछा? कोमल हमारी बड़ी बेटी है।

याद तो सभी की आती है। उनका जवाब। किंतु कोमल तो बिल्कुल आपकी कॉपी है। जरूरत पड़े तो भगवान को भी जमीन पर उतार ले। उसकी चिंता नहीं।

ओह! तो तुम चिंता में हो। यानी माया, मोह। फिर तो सब गलत हुआ जा रहा है ठकुराइन। एसे कैसे काम चलेगा। मैने कहा। जब मै उन्हें ठकुराइन कह कर सम्बोधित करता हूं तो उन्हें बड़ी खुशी होती है। मुझमें खुद को ढूंढ़ने लगती हैं। वे बाकी सारे विषय भूल जाती हैं। एसा मृत्यु के पहले से था। उन्हें मनाने का मेरा यह सबसे अचूक हथियार था।

नहीं। आपके रहते न चिंता है। न माया मोह। उनका जवाब था। मां हूं। मां का मन कहां फेंक दूं।
मुझे लगा अगर आमने सामने होते तो वे रो पड़तीं। उनके साथ मै भी खुद को रोक न पाता। उनकी बात भी सही थी। सूक्ष्म शरीर मरने के बाद भी अपनों के साथ जुड़ा रहता है। उन्हीं भावनाओं के साथ जो मृत्यु से पहले होती हैं।


विधि के विधान में हमारी कठिन परीक्षा लिखी है। उन्हें देवी की शक्तियों तक पहुंचना है तो तमाम इच्छाओं का त्याग करना ही होगा।

दिल पर पत्थर रखकर मैने एक बार फिर ‘ न ‘ कह दिया।
वे खामोश हो गईं। शायद बड़ी पीड़ा में चली गईं। या गुस्से में। उस दिन उनसे दोबारा संपर्क नहीं हुआ।

उन्हें अन्य किसी से भी सम्पर्क की छूट है। किन्तु अपने बच्चों से नही। यह बात उन्हें पीड़ा दे रही है। मां के मन की पीड़ा है। छटपटाहट है। पहले तो मैने इसलिये मना किया था कि जिस तरह उनकी मृत्यु हुई उससे बच्चे सदमे में थे। उनका सम्पर्क बच्चों के मन मस्तिष्क पर विचलित प्रभाव डाल सकता था। अब इसलिये उनसे नही मिलने दे रहे ताकि वे बच्चों के माया मदह में न फंसने पायें। वे जो संकल्प लेकर चल रही हैं उसकी एक मात्र रुकावट माया मोह ही है।

हो सकता है बच्चों से मिलने की नौबत हजारों साल बाद आये। तब तक बच्चों के कई जन्म बदल चुके होंगे। किसी मां को यह बात पता चले तो रिएक्शन की कल्पना भी आसान नही। कहीं गुस्से के रूप में फूट न पड़े। सम्भालना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि अब उनकी शक्तियां बहुत बढ़ गई हैं। अपने एक अध्यात्मिक मित्र से सलाह ली। वे हिमालय की साधना में हैं। उन्होंने कुछ सावधानियां बताईं। उन्हें अपना रहा हूं।

करोड़ों में एक आध होते हैं जो मृत्यु के बाद अपनों से संपर्क बनाने की सकारात्मक क्षमता रखते हैं। उनमें अब प्रीती भी हैं। बिना किसी को हानि पहुंचाए संपर्क कर सकती हैं । हानि लाभ की ऊर्जाओं के द्वारा सुख, दुख की परिस्थियों का पता लगा सकती हैं। उनसे निपटने में मदद कर सकती हैं । ऊर्जा शक्ति का कवच बनाकर सुरक्षा दे सकती हैं।

ऐसा कर भी रही हैं। शक्तिपात, आत्म अनुष्ठान आदि करके उन्हें नियमित ऊर्जाएं भेजने वाले साधकों को पता भी नहीं चलता वे कब आईं। मदद करके चली गईं। कुछ साधकों से सीधे संपर्क करके उन्हें जरूरी संकेत भी दे जाती हैं। साधक बाद में इसकी जानकारी देते हैं। किसी मुसीबत में फंसे थे। गुरु मां से मदद मांगी। रक्षा हो गई। कुछ काम अटका था। मदद मांगी। काम बन गया। आदि।

मृत्यु के बाद अब वे लोगों से संपर्क कर लेती हैं। उनके लिए सम्पन्न चेतना उत्थान की शास्त्रीय क्रियाएं और ऊर्जा विज्ञान की तकनीक सफल रही। आगे जारी उनकी आध्यात्मिक क्रियाएं भी सही दिशा में हैं । निरंतर परिणाम मिल रहे हैं । देवताओं के समक्ष लिया उनका संकल्प पूरा होने की दिशा में प्रतीत होता है।

पति होने के नाते मै उनकी आत्मा उत्थान के लिए उपलब्ध सभी अनुष्ठान नियमित कर रहा हूं। साथ ही ऊर्जा विज्ञान की तकनीक का उपयोग कर रहा हूं। इसके साथ ही मृत्युंजय योग संस्थान के हजारों साधक बड़े ही मनोयोग से उनके लिए चेतना उत्थान की औरिक क्रियाएं संपन्न कर रहे हैं। वे मृत्युंजय योग के सभी साधकों को अपने बच्चों की तरह ही मानती थीं। अभी भी मानती हैं।

वे सब साधक प्रीती को अपनी गुरु मां मानते हैं। सभी चाहते हैं कि वे योगिनी संकल्प को पूरा करें। योगिनी बनें। यह कोई सामान्य बात नहीं। जिसके लिए हर दिन हजारों साधक शक्तिपात करते हों। राम नाम जप की ऊर्जाओं का प्रक्षेपण करते हों। दान, अन्नदान, आत्म प्रार्थनाएं करते हों। उनका आत्मा उत्थान होगा ही। दैवीय उद्देश्य पूरा होगा ही। देव संकल्प सफल होगा ही।

प्रीती ने चौथी दुनिया के देवताओं के समक्ष योगिनी स्वरूप तक पहुंचने का संकल्प लिया है। हम जानते चलें कि योगिनियां जन्म से नहीं बनतीं। वे कर्म से बनती हैं। योग, साधना, त्याग, कर्म संचय और समर्पण से। उसके लिए गुरु अनिवार्य है। प्रीती ने जीवन काल में भगवान शिव को अपना गुरु धारण किया था। मुझे भी पति के साथ गुरु मानती थीं। अभी भी ऐसा ही है। 

अगले जन्म/जिम्मेदारी से पहले आत्मा का उत्थान हो। ब्रह्मांड का संचालन करने वाले देवता भी चाहते हैं कि जीवात्मायें देव स्तर तक की जिम्मेदारी में समर्थ बने। ऐसे संकल्प लेने वाली जीवात्माओं को प्रोत्साहित करते हैं। किन्तु देव स्तर की यात्रा हेतु देवताओं की दुनिया में कोई मार्गदर्शक उपलब्ध नहीं कराए जाते। इसीलिए उन्हें मुझसे संपर्क की जरूरत पड़ती है।

मै इधर की दुनिया में, वे उधर की दुनिया में। जरूरत पर हम एक दूसरे से अपनी बात कह लेते हैं । जवाब ले दे लेते हैं। यह कोई चमत्कार नहीं। न ही कोई सुपर साइंस है। ऋषियों द्वारा खोजा सूक्ष्म विज्ञान है। जो युगों से फलित है। चाहें तो आधुनिक विज्ञान भी  अंतरिक्ष की खोज में इसे अपना सकता है। 

प्रीती ने योगिनी बनने का संकल्प क्यों लिया? योगिनी क्या होती हैं? योगिनी बनने के क्या लाभ? योगिनी बनने के लिये क्या क्या करना होता है? यह कितना कठिन है? क्या इस तरह पहले भी कोई योगिनी बनी? इस सब पर हम आगे बात करेंगे।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या