जीवन की चौथी दुनियाः 22

पत्नी की सुंदर दुनिया

बड़ा दुख दे गई तुम फाइनली। मैने अपनी पत्नी प्रीति की जीवात्मा से पहली बार शिकायत की।
ऐसा क्यों कह रहे हैं जी आप। उन्होंने कहा आपको दुख देने का तो अब मै एक क्षण के लिये भी नही सोच सकती। मरने से पहले जाने अनजाने जो दुख मेरे कारण हुआ हो उसके लिये मै युगों तक क्षमा मांगने को तैयार हूं। किंतु मै मर गई ऐसा सोचकर आप मुझे कभी छोड़ मत दीजिएगा। आपकी सीख से यहां दूसरी दुनिया में भी मेरी स्थिति सम्मान वाली है। जीवन में खराब हुए कई कर्मों के बावजूद मुझ पर यहां कोई दबाव नही। आमतौर पर जीवात्माओं को उनके पिछले कर्मों के आधार पर अगले जन्मों में भेजा जाता है। मगर मेरे साथ ऐसा नही है। आपकी बताई बातें अपनाने से मुझे अपने अगले जन्म का निर्णय खुद लेने के लिये कहा गया है। समझिये मुझे जीते जी जो आजादी थी वो ही दोबारा मिल गई। अब कोई मुझे आशंकित नही कर सकता। आपकी सीख, आपकी बातें, आपके बताये विधान और धरती से रोज मिल रही हजारों साधकों की सकारात्मक उर्जायें। सबने मिल कर मुझे इस दुनिया में शांति दे दी। शक्ति दे दी। अन्यथा तो अनगिनत जीवात्मा यमराज जी की व्यवस्था में छटपटाती रहती हैं।

तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे सावित्री की तरह मै तुम्हे यमराज जी से छीन लाउंगा। मैने कहा।

छीन लिया। उन्होंने बहुत उत्साहित होकर कहा। छीन लिया आपने उनसे मुझे। सिर्फ मरना ही यमराज जी की गिरफ्त नही है। उनकी दुनिया में असली पीड़ा तो मरने के बाद शुरू होती हैं। उससे आपने मुझे बिल्कुल बचा लिया। रही बात मरने की तो मेरा वो शरीर बिल्कुल खराब हो गया था। उसमें रहकर जीना मरने से भी ज्यादा तकलीफ देह होता। इसलिये मुझे मरने की तकलीफ बिल्कुल नही। दूसरी दुनिया में रहकर भी आपने मुझे इस दुनिया की तकलीफों से बचा लिया। सच कहूं तो मै बड़े भाग्य वाली निकली। भोले नाथ ने आपको मेरा जीवन साथी बनाया। उनका धन्यवाद।

सात जन्मों का साथ निभाने की कसम खाई थी मैने शादी के समय। तो तुम्हे ऐसे कैसे छोड़ देता। मैने कहा। उनकी स्थिति से मुझे काफी संतोष मिला। अन्यथा तो शुरूआत में मै भी डरा हुआ था। उन्होंने 29 मई 2026 को शरीर छोड़ा। 21 को वे पूजा करते जल गईं। 9 दिन इलाज के बाद शरीर छोड़ दिया। अध्यात्मिक क्रियाओं के द्वारा हम दोबारा सम्पर्क में आये। अब अपनी अपनी दुनिया में रहकर एक दूसरे से बातें कह सुन लेते हैं।
अग्नि दुर्घटना में मृत्यु किसी जन्म के कठिन पाप, दोष या शाप के कारण होती है। ऐसी स्थिति में अधिकांश जीवात्माओं को लम्बे समय तक यम व्यवस्था में रहना पड़ता है। कई बार तो सैकड़ों साल तक पीड़ा सहनी पड़ती है।

इसलिये हमने पहले दिन से ही वे सारे विधान अपनाये जो उन्हें यमराज की पीड़ा से मुक्त रखें। साथ में ब्रह्मांडीय उर्जाओं का निरंतर उपयोग किया। इसके साथ ही मृत्युंजय योग परिवार के हजारों साधकों ने प्रीति के लिये रोज औरिक अनुष्ठान, अध्यात्मिक अनुष्ठान, आत्म प्रार्थनायें कीं। साधक उन्हें गुरू माता मानते हैं। उन्हें विश्वास है वे एक दिन योगिनी स्वरूप धारण करेंगी और सबका कल्याण करेंगी। ये सारे आध्यात्मिक अनुष्ठान अब भी हो रहे हैं। जिसके परिणामस्वरूप प्रीति के सूक्ष्म शरीर का पुनर्निर्माण हुआ। सूक्ष्म चेतना का जागरण हुआ। आत्मा का उत्थान देवात्मा की पंक्ति तक हुआ। उनको देवताओं की दुनिया में प्रवेश मिला।

मृत्यु से पहले वे शिव शिष्या थीं। मृत्यु के बाद बीती गुरू पूर्णिमा पर हमने उन्हें दोबारा शिव को गुरू रूप में धारण कराया। प्रारब्ध के अनुसार उन्होंने योगिनी स्वरूप का संकल्प लिया है। अब सूक्ष्म शरीर के द्वारा मेरे बताये शास्त्रीय और अध्यात्मिक विधान अपना रही हैं। जिसके कारण देवताओं की दुनिया में उन्हें इच्छानुसार जन्म का निर्णय लेने की सहमति मिली है। उनसे उस दुनिया के बहुत सारे रहस्य पता चल रहे हैं। किन्तु सबको सार्वजनिक करने की अनुमति नही। इसीलिये हम इस वृतांत को साधकों के साथ लगातार शेयर नही कर पाते।
मृत्यु के बाद उनसे सम्पर्क कोई चमत्कार नही है। न ही कोई सुपर साइंस है। हमारा अध्यात्म विज्ञान बहुत समृद्ध है। उसमें इन सबकी तकनीक है। जिसे कोई भी अपनाकर दुनिया से जा चुके अपनों से समपर्क कर सकता है।

इन दिनों मै हरिद्वार में नही हूं। लखनऊ में हूं। कल हरिद्वार से शिव साधक मनीष सहगल ने कांवड भक्तों का एक वीडियो भेजा। तब उनकी याद आ गई। पिछले सावन तक हम हरिद्वार में साथ रहते थे। उन्हें कांवड वाले शिव भक्तों को देखना, उन्हें प्रणाम करना, उनके साथ कुछ दूर तक चलना बहुत अच्छा लगता था। उनके कहने पर सावन में हम अक्सर ड्राइव करते हुए ऋषिकेश हाई-वे पर निकल जाते थे। वहां जंगल में गाड़ी खड़ी कर कांवड़ियों को खाने पीने की चीजें देते। वे उनके साथ बम भोले बोलती कुछ दूर जातीं।

फिर अपने बाबू जी (पिता जी) को याद करतीं। बतातीं कि बाबूजी के साथ बाबा बैजनाथ धाम 2 बार गईं। वहां कांवड़ उठाई। कांवड़ वाला जल चढ़ाया। दावा करती थीं बाबा बैजनाथ ही पति रूप में मुझे उनके जीवन में लाये। कांवड वालों की भीड़, सड़क पर उनकी लाइनें, उनके जयकारे, उनके गाने, उनके नारे प्रीति को बहुत आकर्षित करते थे।

मनीश द्वारा भेजे कांवड़ भक्तों के वीडियो को देखकर मुझे उनकी याद आ गई। मन में बहुत अकेलापन और दुख पैदा हुआ। कांवड से उनका लगाव और शिव भक्तों के प्रति आकर्षण। शिव के प्रति उनकी मासूमियत और समर्पण। मेरे प्रति उनका अंतहीन प्रेम और सेवा भाव। इन सब यादों ने मिलकर मेरा मन भारी कर दिया। ऐसे जीवन की कल्पना मैने कभी नही की थी। भगवान ने सब कुछ दिया। किन्तु आज ऐसा लगा जैसे सब कुछ में से ‘सब’ अलग कर दिया। बस ‘कुछ’ छोड़ दिया।

भगवान शिव की पीड़ा याद आ गई। मां सती के जलकर मरने के बाद किस भाव में रहे होंगे वे। मेरे मन के दुख ने मुझे अहसास करा दिया कि आखिर जला शव कंधे पर लेकर वे दीवानों की तरह क्यों भटके इधर उधर। वे तो देवों के देव हैं। जहर का दर्द सह गए। पत्नी वियोग न सह सके। कारण समझ आ गया।

पत्नी के साथ बिताये जीवन के तमाम क्षण ऐसे होते हैं जो कहीं और नही मिल सकते। इनको व्यक्त करने के लिये दुनिया में कोई भाषा नही। लोग सिर्फ तर्क-वितर्क के आधार पर पत्नियों का आकलन करते हैं। किन्तु यह पैमाना झूठा है। तर्क-वितर्क की आदत तय नही कर सकती कि पत्नी का रोल जीवन में कितना महत्वपूर्ण है। इसकी अहमियत जानने के लिये कंधे पर सती का शव लेकर बिलख रहे शिव को देखिये। मेरे जैसे व्यक्ति को देखिये जिसे पत्नी के साथ रहते जीवन स्वर्ग दिखता था। अब जैसे जीवन है ही नही। चारो तरफ वीराना।
ऐसा नही है कि मेरी पत्नी कभी तर्क- वितर्क नही करती थीं। अपनी बात कहने का हक सभी को है। सो वे भी कहती थीं। बहुत बार उनकी बातें न कहे जाने लायक होती थीं। मगर सिर्फ इतनी बात पर उनके प्रेम, उनकी सेवा, उनके त्याग, उनके समर्पण, उनके लगाव, उनके अपनेपन को दरकिनार नही किया जा सकता।

मै उन्हें अपना पहला बच्चा मानता था। इस नाते जब कभी कुछ ऐसा बोल जातीं जो नही बोलना चाहिये। तो सोच लेता था मेरा बच्चा है। मै ही बुरा मानूं । तो ये मेरी कैसी समझदारी। जब मुझसे कोई पूछता आपके कितने बच्चे हैं। तो मै हमेशा बताता तीन। तीनों लड़कियां। दो बेटियां और तीसरा बच्चा मेरी पत्नी। लोग कहते आप मजाक करते हैं। किंतु इस बात को मैने मजाक रूप में कभी नही कहा।
सभी से आग्रह है इस बात को समझें कि पत्नी न तो बराबरी की चीज हैं न ही बदला लेने की। आपकी पत्नी साथ है तो आप बहुत भाग्यशाली हैं। उनकी कद्र करिये। उनकी भावनाओं को समझिये। सारी शिकायतें खत्म हो जाएंगी। वरना उनके न रहने के बाद पछतावे का कोई अंत नही। उस दुख का कोई विकल्प नही। दोबारा वो न मिलने वालीं। थोड़ी देर ईगो छोड़कर देखें। सुंदर दुनिया चाहिये तो वो पत्नी के साथ ही मिलेगी।

कल दोपहर के खाने पर मैने प्रीति की सूक्षम चेतना को आमंत्रित किया। जब आईं तो शिकाायत की।
कहा बड़ा दुख दे गई तुम फाइनली मुझे।

ऐसा क्यों कह रहे हैं आज आप ? वे असमंजस में थीं कि अचानक मुझे क्या हुआ। उनकी नजरों में मै अब भी किसी दुख से दुखी न होने वाला और हर परिस्थिति से निपट लेने वाला चट्टान सा व्यक्ति हूं।

आज तुम बहुत याद आई मुझे। मैने कहा। लग रहा है साथ तो सिर्फ मैने ही निभाया। तुम तो धोखा सा देकर चली गईं। पुरानी यादों में जाकर पाता हूं तुम बड़ा दुख दे गई मेरे हिस्से में। जिससे निकलने की कोई राह नही मेरे पास।

ए जी ऐसा मत सोचिये प्लीज। वे भावुक हो गईं। और खामोशी छा गई।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या