जीवन की चौथी दुनियाः 5

बनारस के प्रेत

आत्महत्या करके शिखा भटक गई। प्रीती के पास आने जाने लगी। मेरे द्वारा दी एक धमकी को उसने गम्भीरता से ले लिया। अपनी 3 जन्मों पुरानी सहेली प्रीति के दिमाग पर कब्जा कर लिया। उन्हें जलाकर मार डाला।

हम बात कर रहे हैं मृत्युंजय योग संस्थान की गुरू मां प्रीति देवी की। वे पिछले महीने शरीर छोड़ गईं। प्रेतों की दुनिया से निकल कर उन्होंने पितृ दुनिया को पार किया। अब वे देवताओं की दुनिया में आती जाती हैं। ब्रह्मांडीय उर्जाओं के उपयोग से वे योगिनी बनने की तरफ बढ़ रही हैं। कई साधकों ने आग्रह किया था कि 3 जन्म पुरानी सहेलियों के साथ इस जन्म में उनके रिश्ते का वृतांत बतायें। हम यहां उसी को शेयर कर रहे हैं।

तीन जन्म पहले वाली दीपशिखा इस जन्म में शिखा बनी।
प्रीती इस जन्म में भी प्रीति ही रही। तब की बाकी दोनो सहेलियां भी एक ही शहर यू.पी. के कानपुर में पैदा हुईं।
अलग अलग क्षेत्रों में पैदा हुई पिछले जन्मों की चारो सहेलियां थोड़ी बड़ी होने पर पढ़ाई के माध्याम से एक दूसरे के सम्पर्क में आ गईं।
ग्रेजुएशन तक पढ़ाई साथ चली।
90 के दशक में उनकी दोस्ती लोगों के बीच चर्चा का विषय हुआ करती थी।
छात्र राजनीति और सामाजिक सरोकार के कामों में उनकी काफी सक्रियता थी।
जब हजारों परिवारों में से किसी एक में मोटरसाइकिल होती थी। तब वे लड़किया बिंदास बाइक चलाती थीं।
उस जमाने में लड़कियों का बाइक चलाना लोगों के लिये अचरज वाली बात थी। पूरे शहर में इक्का दुक्का लड़कियां ही बाइक चलाती थीं। वे जिधर से जातीं लोग देखते रह जाते थे।
सिविल लाइन्स, माल रोड, स्वरूप नगर जैसे शहर के पॉश एरिया में रहने वाले प्रभावशाली परिवारों की बेटियां होने और सामाजिक एक्टिविटी के कारण लोगों में उनका सम्मान और सोहरत थी।
आकर्षण और सुंदरता उन्हें प्रकृति से मिली थी। टेलेंट की उनमें कमी न थी। उनका गुट सामान्य न था। मर्यादा में रहकर वे दबंग लड़किया थीं। उन्हें कोई दबा नही सकता था। उन्हें कोई हरा नही सकता था।

वे बड़ी होती गईं। उनकी शादी होती गई। शिखा की शादी वाराणसी में हुई। प्रीति की शादी मुझसे हुई। तब मै कानपुर के एक बड़े न्यूज पेपर में क्राइम रिपोर्टर था। वह जमाना न्यूज पेपर का था। उन्हें प्रभावशाली लोग पसंद थे। इसलिये मुझसे शादी की।
प्रीति से मेरी शादी के फैसले में शिखा का बड़ा रोल था। शादी के बाद भी दोनों की दोस्ती कम न हुई। लगातार एक दूसरे के सम्पर्क में रहती थीं। प्रीति अक्सर मुझसे शिखा के बारे में बातें करती थीं। उससे फोन पर बात कराती थीं।
समनय पलटा। शिखा के जीवन में उलट पुलट शुरू हो गई। उसे अपने व्यापारी पति पर शक होने लगा। उसका शक सही था। यह बात उसे अपनी सुंदरता का अपमान भी लगती थी। शिखा वास्तव में खूबसूरत थी। वह कहती थी मुझमें क्या कमी है। जो यह मुझे छोड़कर कहीं और भटकता घूम रहा है।
बात बिगड़ती गई। शिखा डिप्रेशन में चली गई।
शिखा की हालत का प्रीति पर बहुत बुरा असर पड़ रहा था। शिखा उनसे ही अपना यह दुख साझा करती थी। वे उदास हो जातीं। कई कई दिन तक उनका मन खराब रहता।
मै उनसे कहता खुद को सम्भालों वरना घर का माहौल बिगड़ेगा। फिर तुम मुझ पर भी शक कर सकती हो।

एक बार ऐसा हो चुका था। बात 2016-17 के आस पास की है। यक्षिणी साधनाओं के परिणाम स्वरूप स्त्री वर्ग का मेरी तरफ आकर्षण बढ़ गया। मेरे चरित्र में ऊंच नीच शुरू हुई। उन्हीं दिनों कुछ लोग शत्रु रूप में आगे आये। मुझे ब्लैकमेल करने के लिये परिस्थियां क्रिएट कीं। अपयश की साजिश की। इन सब का प्रीति जी पर बहुत बुरा असर पड़ा। वे विचलित हुईं। उनका मन दुखी हुआ। पत्नी होने के नाते उनका जो रिएक्शन आना चाहिये था। वह आया। यह स्वाभाविक था। वे चीजों को वाच कर रही थीं।
फाइनली प्रूफ हुआ प्यार तो मै उन्हें ही करता हूं। एक महिला के लिये इससे बड़ी कोई जीत नही होती कि उसका पति उसे प्यार करे। इससे बड़ी कोई खुशी नही होती। इससे बड़ी कोई उपलब्धि नही होती।
प्रीति जी ने खुद को शक संदेह से मुक्त कर लिया। इसी धैर्य और सहनशीलता के कारण उनके समक्ष गुरू मां बनने का अवसर आया। अब वे मेरे साथ मिलकर साधना, आराधना, ध्यान, अनुष्ठान आदि में व्यस्त रहने लगीं। साधकों के कल्याण हेतु मंत्र जप, शिव पुराण पाठ, शिवार्चन अनुष्ठान और शक्तिपात करने लगीं। साधकों की सेवा में उनका मन लग गया। जिसका प्रत्यक्ष लाभ साधकों को मिलने लगा। साधक उन्हें गुरू मां मानने लगे।

कुछ समय पहले शिखा ने ज्यादा दवाइयां खाकर आत्महत्या कर ली। सुसाइड नोट में इसके लिये अपने पति को जिम्मेदार ठहराया। शिखा डिप्रेशन में थी। इस आधार पर उनका पति जल्दी ही जेल से बाहर आ गया।
उसी बीच उसने जिससे शक था उसी महिला से शादी कर ली।

शिखा की मौत का प्रीति पर गहरा असर हुआ था। वे अक्सर कहती थीं कि शिखा की आत्मा बहुत परेशान है। बार बार मेरे पास आती है।

मुझे इस बात की चिंता होने लगी। एक दिन बातों बातों में मैने उनसे कहा उससे (शिखा से) कह दो तुम्हें तंग न करे। वरना 4 मंत्र पढ़ुंगा, जल कर भस्म हो जाएगी।

मैने यह बात यूं ही कह दी थी। यह बात मुझे नही कहनी चाहिये थी। कही थी तो इस पर काम करना चाहिये था। ताकि शिखा की सूक्ष्म चेतना प्रीति के पास आना बंद कर देती। मगर प्रारब्ध में तो कुछ और ही लिखा था।
ब्रह्मांड की उर्जायें बिगड़ रही थीं। जिनका विपरीत असर मुझे प्रीति पर भी आता दिख रहा था।
घटना से 6 दिन पहले मैने उनसे कहा था सुबह का दीपक जलाना बंद कर दो। 14 जून के बाद फिर से जलाना।
मगर इस बात को वे गम्भीरता से नही ले पाईं। और दीपक जलाती रहीं। 21 मई को मंदिर के दीपक से वे जल गईं।
उधर शिखा की सूक्ष्म चेतना ने मेरी बात को गम्भीरता से ले लिया।
उसने 3 जन्मों पहले के प्रारब्ध को फलित करना शुरू कर दिया। वह प्रीति के विचारों पर हावी होने लगी।
घटना के बाद इलाज के दौरान देहरादून हास्पिटल में एक दिन प्रीति जी ने आई.सी.यू. वार्ड के दरवाजे की तरफ इशारा करते हुए मुझे बताया वो देखिये शिखा दरवाजे पर खड़ी है। मुझे उस पर तरस आ रहा है। बेचारी भटक रही है।

तब मै सतर्क हुआ। मैने पूछा क्या जब आग लगी उस समय भी शिखा मंदिर में तुम्हारे साथ थी ?
नही। उन्होंने बताया। मगर सुबह से ही मेरे मन में उसकी बातें घूम रही थीं। और दिनों से कई गुना ज्यादा। मुझे शिखा के विचारों के अलावा कुछ सूझ नही रहा था। उसी के उहापोह में मैने माचिस की जलती तीली नीचे डाल दी। जिससे साड़ी ने आग पकड़ ली।
मेरे जलने से बेचारी वो भी दुखी है। उन्होंने दरवाजे की तरफ देखते हुए कहा। जैसे वह उन्हें तब भी दिख रही थी।
तुम शिखा की चिंता न करो। मैने उनसे कहा। उसकी मृत्यु वाराणसी में हुई है। वहां मरने वालों को मुक्ति मिल ही जाती है। वह भी जब चाहेगी मुक्ति पा लेगी। तुम उसकी तरफ से ध्यान हटाओ। मन ही मन राम नाम जपती रहो।

वाराणसी में मरने वालों को मुक्ति कैसे मिलती है। इसके पीछे के सूक्ष्म विज्ञान पर हम आगे चर्चा करेंगे। साथ ही जानेंगे कि बनारस के प्रेत कैसे होते हैं। उन्हें मुक्ति कैसे मिलती है ?
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या