जीवन की चौथी दुनियाः 3

जिंदगी से बड़ी मौत की खुशी

प्रार्थनाओं की उर्जा से प्रेत अपना पुनिर्माण कर सकते हैं। सकारात्मक उर्जाओं के द्वारा देव बन सकते हैं। देवताओं की दुनिया में आ जा सकते हैं। देवताओं से अपने सवालों के जवाब ले सकते हैं।

मरने के टाइम तुम्हें डर लगा? तकलीफ हुई? उलझन हुई या कुछ और फील हुआ? देह त्याग के एक महीने बाद मैने अपनी पत्नी प्रीति की सूक्ष्म चेतना से ये सवाल पूछे।
नही डर बिल्कुल नही लगा। उनकी सूक्ष्म चेतना से जवाब मिला। वे अदृश्य दुनिया से जवाब दे रही थीं। जल जाने के कारण मेरा अपने शरीर से पहले ही मोह भंग हो चुका था। मै जल्दी से जल्दी उससे निकल जाना चाहती थी। उसमें बहुत दर्द था। पीड़ा थी। शरीर में रहना एक एक पल नर्क जैसा लग रहा था। मुझे भरोसा था मेरी तकलीफ देखकर आप कुछ ऐसा करेंगे जिससे मेरी बची सांसे जल्द पूरी हो जाएंगी। और मै सम्मानजनक मृत्यु पा लुंगी।
फिर अचालक कुछ अलग हुआ। उनकी सूक्ष्म चेतना बताती गई। जैसे टाइम बहुत तेज चलने लगा हो। पहले मुझे सांस लेने में दिकक्त हो रही थी। यहां तक की मन में राम राम जपना भी अटक रहा था। अब लगा जैसे मेरी सारी सांसें इकट्ठी हो गईं। और जल्दी जल्दी चलने लग गईं। इतनी तेज कि महीनों की सांसें मिनटों में खर्च हो जायें। सांसों का फ्लो सा बन गया। अब मै राम नाम भी आराम से जप पा रही थी। डाक्टरों और दूसरे देखने वालों को मेरी उस हालत से क्या लगा होगा मुझे नही पता। मगर मुझे दर्द या परेशानी बिल्कुल नही हो रही थी।
मुक्ति मिलने का कांफीडेंस फील हो रहा था।
यह सब कितनी देर चला, पता नही। उन्होंने बताया। अचानक लगा कोई मुझे कुछ पिला रहा है।
वह मसूरी वाली साधिका नीलम थीं। जो मेरे मुंह में गंगा जल डाल रही थी। गंगा जल जो आपने पहले ही मेरी दवाओं और दूसरे सामान के साथ वहां रखवाया था।
लास्ट में राम नाम और गंगा जल। बस यही याद रहा।
अचानक मेरा मुंह खुला। मुंह से ही मै शराीर से निकल गई। हवा में उड़ने लगी।
मै सबको अलग से देख रही थी। उस समय आप वहां नही थे। बच्चे भी नही थे। कई साधक और रिश्तेदार थे।
सब रोने लगे।
डाक्टर, नर्स, वार्ड ब्वाय कुछ देर तक हड़बड़ाये से दिखे। वे जिंदगी बचाने की अंतिम कोशिश कर रहे थे।
मगर मै किसी भी हालत में दोबारा शरीर में जाना नही है यह सोचकर अपनी बाड़ी से दूर भाग रही थी।
कुछ दिन पहले किसी सवाल के जवाब में आपने मुझे बताया था कई बार मृत्यु बड़ी राहत देती है। उन्होंने हमारी पुरानी बातों को याद करते हुए कहा। शरीर बीमार हो, खराब हो गया हो। मन खराब हो गया हो। पीड़ा, परेशानी, टेंशन अधिक हो। ऐसे में शरीर छूट जाये। तो बड़ी राहत मिलती है। मुक्ति वाली आजादी फील होती है। क्योंकि तकलीफ देने वाला शरीर, मन, दिमाग सब एक झटके में अलग हो गये। उसके साथ सारी परेशानियां भी अलग हो गईं।
मरते ही मुझे मुक्ति दिख गई। जितना आपने बताया था मरने की खुशी उससे भी कहीं ज्यादा हो रही थी।
जिंदगी से लाखों गुना बड़ी मौत की खुशी थी।
बच्चे, परिवार किसी की कोई चिंता न थी। आप हैं तो सब कुछ अच्छा ही होगा। ये कांफीडेंस मुझे माया मोह से अलग कर गया।

कुछ समय तक वैसे ही रहा। मै स्पेस में थी। मेरी बाड़ी मुझे दिख रही थी। आस पास के लोग वगैरह सब दिख रहे थे। मुझे कोई डर, उलझन, पीड़ा, परेशानी फील नही हो रही थी। मन में उत्सुकता जरूर थी कि आगे क्या होगा ?

आगे जो हुआ वह बहुत परेशान करने वाला था।
उनकी सूक्ष्म चेतना ने अदृश्य दुनिया की जानकारी दी। कुछ समय बाद अचानक किसी अंधेरी जगह में पहुंचा दिया गया। लगा जैसे किसी काली गहरी सुरंग में जबरदस्ती खींच लिया गया हो।
किसी अदृश्य दुनिया में पहुंच गये।
वह प्रेतों की दुनिया थी। वहां तमाम सूक्ष्म शरीर थे। सब स्पेस में उड़ रहे थे। इधर उधर भटक रहे थे। वे सब प्रेत थे।
प्रेत मतलब कुूछ ही देर पहले मरे लोगों का बेबी सूक्ष्म शरीर।
जैसे इस दुनिया में न्यू बार्न बेबी को नवजात शिशु कहते हैं। वैसे ही उस दुनिया में मृत्यु के तुंरत बाद स्थुल शरीर से अलग हुए सूक्ष्म शरीर (वायवीय शरीर) को प्रेत कहा जाता है। वे अंतरीक्ष में उड़ सकते हैं। मन की गति से कहीं भी आ जा सकते हैं। अपनों के बुलाने पर तुरंत आ जाते हैं। भेजने पर तुरंत चले जाते हैं।
मार्गदर्शन देने पर ये प्रेत अपनी शक्तियों (उर्जाओं) का उपयोग करके कत्याणकारी काम कर सकते हैं। अपनी व दूसरों की रक्षा कर सकते हैं। अर्पित किये जाने पर खाना, पानी का उर्जा अंश ग्रहण कर सकते हैं। प्रार्थनाओं की उर्जा से अपना पुनिर्माण कर सकते हैं। सकारात्मक उर्जाओं के द्वारा देव बन सकते हैं। देवताओं की दुनिया में आ जा सकते हैं। देवताओं से अपने सवालों के जवाब ले सकते हैं।
मै भी उन्हीं में शामिल थी। मेरी पत्नी प्रीति की सूक्ष्म चेतना ने बताया। शुरुआत में मेरे शरीर सहित इस दुनिया की सारी चीजें दिखनी बंद हो गईं।
अब कहां जाना है ? क्या करना है? आगे क्या होगा? ये सवाल बेचैनी पैदा कर रहे थे। भटकन पैदा कर रहे थे। यह सिलसिला काफी समय तक चला।
फिर एक पर्दा सा हटा। जिसके एक तरफ मृत्युलोक की यह दुनिया थी। दूसरी तरफ प्रेत लोक की वह दुनिया थी। कुछ ही समय में हम उस पर्दे के आर पार आना जाना सीख गए।
उलझन खत्म हुई।
अब हम इधर आकर यहां की चीजें और उधर जाकर वहां की चीजें देख रहे थे।
अगले दिन मैने आपको मेरी डेड बाड़ी के पास रोते देखा। उन्होंने अपनी फीलिंग बताईं। मै बहुत घबरा गई। क्योंकि इतने सालों आपके साथ बिताई जिंदगी में कभी आपको रोते नही देखा था। पहली बार आप रो रहे थे। खुशबू (छोटी बेटी) आपको चुप करा रही थी।
मैने भी आपको चुप कराने की कोशिश की। गले लगाने की कोशिश की। मगर बेबसी यह थी कि मै आपको छू नही पा रही थी। मेरी आवाज आप तक नही पहुंच रही थी।
पहली बार मुझे मरने की उलझन फील हुई।
मुझसे देखा न गया।
मै प्रेतों वाली दुनिया में लौट गई।

जो लोग दुर्घटनाओं में मरते हैं। उनकी अकाल मृत्यु होती है। सामान्य मान्यता है उन्हें प्रेत बनना पड़ता है। मेरी पत्नी एवं मृत्युंजय योग संस्थान के साधकों की गुरू मां प्रीति की मृत्यु पूजा के दीपक से हुई। सामन्य मान्यता के मुताबिक इसे अकाल मृत्यु का नाम दिया जा सकता है। तो क्या इसी कारण वे प्रेतों की दुनिया में गईं? वहां से मुक्त कैसे हुईं? मुक्त होने पर देवताओं की दुनिया में कैसे पहुंचीं? क्या सभी प्रेतों को इसका अवसर मिलता है? जिन्हें इस दुनिया के वंशजों से आत्मिक सपोर्ट नही मिलता उन प्रेतों का क्या होता है?
यह हम आगे जानेंगे। साथ ही जानेंगे प्रीति जी को किस जन्म की गलती के कारण जलकर मरना पड़ा ?
क्रमश।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या