जीवन की चौथी दुनियाः 14

पितरों की दुनियाः नादान वंशजों की आफत

मृत्यु के समय उनका शरीर से लगाव खत्म हो चुका था। पीछे छूट रहे बच्चों, परिवार की चिंता नही थी। चीजों से लगाव बचा न था। कोई माया न बची। कोई मोह न बचा। सिर्फ एक ही कामना। सम्मानजनक मृत्यु मिले। तुरंत मृत्यु मिले। थोड़े प्रयोग हुए। वैसी ही मृत्यु मिल गई। शरीर छोड़ते ही मुक्ति का अहसास हुआ। दर्द और तकलीफों से एक झटके में मुक्त हो गईं। लगा जैसे संसार की सबसे बड़ी खुशी मिल गई। प्राण मुंह से निकले। उस वक्त भी जबान पर राम नाम था। फिर भी मरते ही उन्हें प्रेतों की दुनिया में जाना पड़ा। देवताओं की दुनिया में सीधे प्रवेश नही मिला।

हम चर्चा कर रहे हैं दुनिया छोड़ गई अपनी पत्नी प्रीति जी के बारे में। जोकि मृत्युंजय योग संस्थान के हजारों साधकों की गुरू मां भी थीं। वे सब अपनी गुरू मां की मृत्यु बाद की सूक्ष्म यात्रा के बारे में जानने के इच्छुक रहते हैं। इसलिये हमने प्रीति जी को प्रेत दुनिया से निकालने के साथ ही उनसे सूक्ष्म सम्पर्क स्थापित करने का निर्णय लिया। उसके लिये उपलब्ध शास्त्रीय विधानों और उर्जा विज्ञान का प्रयोग किया। सम्पर्क हुआ तो पता चला वे सीधे देवताओं की दुनिया में नही जा पायीं। नियमानुसार जो लोग मृत्यु के समय शरीर, रिश्तों, धन दौलत के मोह से मुक्त होते हैं। उन्हें यमलोक में रुकना नही पड़ता। सीधे देवताओं की दुनिया में चले जाते हैं। तो यह नियम प्रीति जी पर लागू क्यों नही हुआ? सम्पर्क होने पर यह जानकारी उन्होंने खुद दी। उनके मन में यह बात सवाल के रूप में थी। वे जानना चाहती थीं ऐसा क्यों हुआ ?

मृत्यु होते ही सूक्ष्म चेतना सबसे पहले यमलोक में जाती है। अगर सब ठीक रहा तो वहां से निकल कर पितृ लोक पहुंचती है। यमलोक में कड़ी सुरक्षा जांच का सिस्टम है। जिसमें देखा जाता है कि शरीर छोड़कर आया सूक्ष्म शरीर क्षतिग्रस्त तो नही। उसमें मोह-माया, लालच, क्रोध, अहंकार जैसे भावनात्मक विकार तो नही। यदि इनमें से कुछ भी निकला तो सूक्ष्म शरीर को प्रेत (रोगी सूक्ष्म शरीर) घोषित कर दिया जाता है। इलाज के बिना वह आगे जाने लायक नही होता। इसीलिये उसे प्रेतों की दुनिया में रोक दिया जाता है। ठीक होने पर पितृ लोक में भेज दिया जाता है।

यही प्रीति जी के साथ हुआ। अग्नि दुर्घटना का शिकार होने के कारण उनके शरीर के साथ सूक्ष्म शरीर भी क्षतिग्रस्त हो गया था। उसे ठीक होकर आगे जाने लायक बनने में 13 दिन का समय लगा। उसके बाद ही देवताओं की दुनिया तक पहुंच सकीं। इसीलिये कहा जाता है कि दुर्घटना या लम्बी बीमारियों में मरने वालों को प्रेत बनना पड़ता है। वहां से निकालने के लिये विशेष पूजा पाठ, आत्म प्रार्थनाओं की अक्षय उर्जा की आवश्यकता होती है।

पितृ लोक से ही देव लोक की शुरूआत हो जाती है। यह जीवात्मा के लिये अपने घर जैसा होता है। यहां वे पितृदेव बनकर लम्बे समय तक रुक सकते हैं। सक्षम पितृों को पितृदेव कहा जाता है। उन्हें देव पंक्ति में जगह मिली होती है। वे देवताओं की सभा के सभासद होते हैं। देव सभा में आने जाने का अधिकार होता है। जहां उनके सुझाव माने जाते हैं। वंशजों के बारे में की गई मांगे पूरी की जाती हैं। उनके कहने पर धरती पर वंशजों के सुख बढ़ा दिये जाते हैं। दुखों से बचाने के लिये वंशजों को देव सुरक्षा दी जाती है।

असंतुष्ट पितृों के कहने पर देवताओं की सभा धरती पर उनके वंशजों के सुख रोक देती है। तब लोगों के सुख भंग हो जाते हैं। एक के बाद एक तमाम समस्यायें परेशान करती हैं। वंशजों के परिवार असुरक्षित हो जाते हैं। पीढ़ियों तक परिवारों में असहज स्थिति बनी रहती है। अनदेखी होने या वंशजों द्वारा सदगति में बेवजह रुकावट पैदा करने से भी पितृ असंतुष्ट होते हैं।

निर्धारित समय पर पितृों के लिये दान, पिंडदान, श्राद्ध, आत्म प्रार्थना (बिना खर्च पितृों को सूक्ष्म उर्जा देने का विधान) आदि न किये जाने से पितृ असंतुष्ट होते हैं। वे इसे अपने प्रति अनदेखी मानते हैं। अपमान मानते हैं। कुपित पितृ देवताओं की सभा में अनदेखी करने वाले वंशजों के सुख रोक देने की मांग करते हैं। उनकी मांग मान ली जाती है। भले ही वंशजों के भाग्य में सुख क्यों न लिखे हैं। वे सुख उनके अगले जन्म के लिये टाल दिये जाते हैं।

पितृों से अधिक मोह करने वाले वंशजों के भी सुख रुक जाते हैं। क्योंकि इसके कारण पितृों को सदगति नही मिल पाती। ध्यान रखना चाहिये कि मरने के बाद किसी भी आत्मा का सदगति ही एकमात्र उद्धेश्य होता है। जब वंशज उन्हें लगातार याद करते हैं। उनके लिये पूजा आदि का स्थान बनाते हैं। उनकी मूर्ति, फोटो लगाकर माला चढ़ाते हैं। घर में उनके नाम की दिया बत्ती करते हैं। घर में पितृों का भोग-प्रसाद लगाते हैं। ऐसे में पितृों की सदगति में बड़ी रुकावट होती है। सदगति की तरफ जाते पितृों का बार बार आवाहन हो जाता है। उन्हें लौटकर वापस आना पड़ता है। तब मोक्ष के अधिकारी होते हुए भी उन्हें सदगति नही मिल पाती।

पितृ वंशजों की इस तरह की नदानी पर दुखी होते हैं। लगातार यही होता रहे तो गुस्से में आकर भूतों प्रेतों की तरह उग्र हो जाते हैं। तब वंशज परिवारों पर समस्याओं के पहाड़ टूट पड़ते हैं। शुभ कार्य रूक जाते हैं। बने काम बिगड़ने लगते हैं। घाटा, नुकसान, कर्ज, बीमारियां, घरेलू कलह हावी हो जाता है। दुशमन पनप जाते हैं। संगत बिगड़ जाती है। भय व्याप्त होता है। पीढ़ियां बरबाद होती नजर आती हैं।

तेहरवीं होने के बाद पितृों को घर में कभी नही बुलाना चाहिये। पितृों से जुड़ी सारी पूजा-पाठ घर से बाहर होने चाहिये। ऐसा कुछ न करें जिससे पितृों का आकर्षण वापस घर की तरफ हो। उनके मोक्ष के लिये जाने और कभी न आने की प्रार्थना करनी चाहिये। तभी वे पितृ लोक से आगे की यात्रा पर जा पाते हैं। इसके साथ ही पितृों के लिये निर्धारित पूजा पाठ, पिंडदान, श्राद्ध आदि निर्धारित समय में किया जाना ही उचित होता है। आत्म प्रार्थना, शक्तिपात आदि (बिना खर्च, बिना सामान वाली पितृ मोक्ष प्रार्थना) के द्वारा पितृों को अक्षय उर्जायें कभी भी दी जा सकती हैं। क्योंकि उनमें पितृों का आवाहन नही होता। अक्षय उर्जायें पितृों को पितृ लोक से निकालकर देव लोक में प्रवेश कराती हैं।

देव लोक में सूक्ष्म चेतना और आत्मा का वापस मिलन होता है। दोनो के मिलने पर जीवात्मा सक्रिय होती है। अगले जन्म की तैयारी शुरू हो जाती है। देवताओं की दुनिया के सलाहकार जीवात्मा की याददास्त खोल देते हैं। जीवात्मा को सभी जन्म और उनकी घटनायें याद आ जाती हैं। उनके अनुसार जन्म का अधिकार मिलता है। क्या जीवात्मा अपनी मर्जी से अगला जन्म चुनती है? अपनी मर्जी से माता पिता भाई बहन रिश्तेदार चुनती है? अपनी मर्जी से अमीरी गरीबी चुनती है? आगे हम इस पर चर्चा करेंगे।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या