Author Archive: Energy Guru Rakesh Acharya

जीवन की चौथी दुनियाः 12

यमलोक के अस्पताल

यम लोक यानी प्रेतों की दुनिया। जिसके मालिक यमराज हैं। संचालक यमदूत। जीवन- मृत्यु के चक्र में यमदूतों का बड़ा रोल है।
यमदूतों का अलग दुख है। शायद वे अपनी मृत्यु पर इतने दुखी न होते होंगे जितने धरती पर मरने वालों के कारण होते हैं। दुख का कारण जानने के लिये यमदूतों के कामकाज को समझना होगा।

धरती पर आम धारणा है कि प्राण लेना यमराज का काम है। इसके साथ कर्मों की सजा देना भी उनका ही काम है। उनके निर्देश पर यमदूत धरती पर आते हैं और अपने साथ लोगों के प्राण ले जाते हैं। कुछ शास्त्रों में भी ऐसा ही वर्णित है। इन सबको करने के लिये यमराज और उनके दूतों को बहुत क्रूर घोषित किया जाता है। किसी के प्राणों को बल पूर्वक शरीर से अलग करने का जो बृतांत बताया जाता है। वह न सिर्फ यम व्यवस्था को दर्दनांक दर्शाता है। अपितु मृत्यु के प्रति भी मन में भयानक भय पैदा करता है।

मृत्यु एक दरवाजा है। जिससे गुजर कर दूसरी दुनियाओं में जाना होता है। उनमें पहली दुनिया है यम की। इसे प्रेतों की दुनिया भी कहा जाता है। जो लोग सदाचारी हैं। जिनकी चेतना जाग्रत है। जिन्हें मृत्यु की समझ होती है। वे मृत्यु से डरते नही हैं। जो मृत्यु से नही डरते उन पर यम व्यवस्था लागू नही होती। उनके प्राण लेने यमराज या उनके दूत नही आते। समय आने पर वे धरती पर ढल रहे, बीमार हो रहे, बूढ़े हो रहे, जर्जर हो रहे अपने शरीर को खुद छोड़ देते हैं। उन पर बल प्रयोग नही करना पड़ता। शरीर से प्राण अलग होने की न नुकुर के कारण ही बल प्रयोग करना पड़ता है। जो यम व्यवस्था में होता है। जो लोग मरने के समय शरीर और पीछे छूट रहे लोगों के लिये रुके रहने की जिद नही करते। उनके प्राण यमराज के बिना ही निकल जाते हैं।

शरीर से बाहर निकलते ही वे आजादी (मुक्ति) फील करते हैं। जबरदस्त खुशी फील करते हैं। उनके भीतर से अपनी संचित कर्मों की रोशनी निकलने लगती है। जो रास्ता दिखाती है। वे उसी समय यम की दुनिया को पार करके आगे बढ़ जाते हैं।
जीवन में कर्म कैसे ही क्यो न रहे हों। मृत्यु के समय की मनः स्थिति तय करती है आगे क्या होगा। स्वर्ग, नर्क के झंझट में फंसेंगे या बेफिक्र हंसते हुए आगे देवताओं की दुनिया में बढ़ जाएंगे।

जो लोग मृत्यु का विरोध करते हैं। शरीर छोड़कर जाना नही चाहते। उन पर यम व्यवस्था लागू हो जोती है। उनके प्राण बल पूर्वक शरीर से खींच लिये जाते हैं। कुछ शास्त्रों में इसके लिये यमपाश की कहानियां लिखी हैं। यह एक तरह का अस्त्र बताया गया है। यमराज व यमदूतों द्वारा इसे व्यक्ति के शरीर में डाल दिया जाता है। उसी में फंसाकर प्राणों को बल पूर्वक बाहर निकाल लिया जाता है। इसे ऐसे समझें जैसे कांटें में फंसी मछली को जोर लगाकर पानी से बाहर खींचा जा रहा हो। इस खींचतान में मछली की तरह जीवात्मा भी घायल हो जाती है।

हम यम की डराने वाली कहानियों से हटकर बात करें। तो भी न नुकुर वाली मृत्यु में जीव के घायल होने का खतरा होता है। यम की दुनिया में प्रवेश के लिये ब्लैकहोल और वार्म होल रूपी दरवाजे होते हैं। वार्म होल छोटे होने के कारण सहज फोर्स वाले होते हैं। सहज भाव से मृत्यु अपनाने वाले इन्हीं दरवाजों से खुद चलकर यमलोक पहुंच जाते हैं। उन्हें चोट नही आती। उनके सूक्ष्म शरीर क्षतिग्रस्त नही होते। जिनके सूक्ष्म शरीर घायल नही होते उन्हें यमलोक में रुकने की जरूरत नही। सूक्ष्म जांच के बाद वे तुंरंत आगे भेज दिये जाते हैं।

जो मृत्यु का विरोध करते हैं। शरीर छोड़ना नही चाहते। अपनों से अलग होना नही चाहते। कमाई गई सम्पत्ति को भूलना नही चाहते। उन्हें ब्लैक होल वाले दरवाजों का सामना करना पड़ता है। ब्रह्मांड में ब्लैक होल अत्यधिक शक्तिशाली होते हैं। सामने आने पर वे ग्रह-नक्षत्रों को भी अपने भीतर खींच लेते हैं। राहू-केतु को आप जानते ही हैं। वे ब्लैक होल ही हैं। एक तरह से निगलते हैं। दूसरी तरफ से निगली गई चीजों को दूसरी दुनिया में फेंक देते हैं। सूर्य, चंद्रमा तक को उनसे खतरा रहता है। इसी तरह सामने आते ही यमलोक के ब्लैकहोल प्राणों को खींच लेते हैं। दूसरी तरफ फेंक देते हैं। इसमें बहुत अधिक बल प्रयोग किया जाता है। जिसे सह पाना सूक्ष्म शरीर के वश की बात नही। खींचतान वाली इस मृत्यु में जीव का सूक्ष्म शरीर बुरी तरह घायल हो जाता है।

बस बात यही से बिगड़ जाती है। मामला नर्क की तरफ मुड़ जाता है। घायल सूक्ष्म शरीर आगे की यात्रा करने लायक नही होता। यमलोक में उसे प्रेत बनाकर आगे जाने से रोक दिया जाता है। प्रेत मतलब उस दुनिया का मरीज। जिसे इलाज की जरूरत होती है। दुर्घटना और लम्बी बीमारियों के कारण भी सूक्ष्म शरीर क्षतिग्रस्त होते हैं। चिंता, अहंकार, लोभ, मोह में उलझे लोगों के सूक्ष्म शरीर भी बीमार हो जाते हैं।

ये समस्या सिर्फ मृत्यु के बाद की नही है। जीते जी जितने भी दुख, समस्यायें, पीड़ा, परेशानी होती हैं। सबका कारण सूक्ष्म शरीर ही होता है। यहां आभामंडल और उर्जा चक्र इसके सक्रिय अंग होते हैं। जिनके बिगड़ने पर सूक्ष्म शरीर बीमार पड़ता है। तब तन, मन, धन की समस्यायें पैदा होती हैं। जब वे साकारात्मक उर्जाओं से भरे होते हैं तब जीवन के सभी सुख मिलते हैं। सौभाग्य इनकी सकारात्मकता से ही जाग्रत होता है।

कोई व्यक्ति अमीर होगा या गरीब, सुखी होगा या दुखी, बीमार होगा या स्वस्थ, प्रसिद्ध होगा या गुमनाम, ज्ञानी होगा या मूर्ख, खुश रहेगा या उदास। सब कुछ सूक्ष्म शरीर की स्थिति तब करती है। दुष्कर्म-सत्कर्म के प्रभाव, प्रारब्ध के प्रभाव, देवी-देवताओं के प्रभाव, पूजा-पाठ के प्रभाव, साधना-आराधना के प्रभाव, जुआ-नशा के प्रभाव, ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव, वास्तु के प्रभाव, तंत्र के प्रभाव, भूत-बाधा के प्रभाव, शत्रु-मित्र के प्रभाव, सही-गलत संगत के प्रभाव, ऊंच-नीच व्यवहार के प्रभाव, क्रोध-अहंकार-लोभ-मोह-काम वासना के प्रभाव, अपराध के प्रभाव, देश काल परिस्थितयों के प्रभाव। सब सूक्ष्म शरीर में ही आते हैं। उनके मुताबिक ही जीवन में सुख या दुख पैदा होते हैं।

सुखी जीवन के लिये सभी को इन्हें ठीक रखना चाहिये। यह मुश्किल काम नही। सत्कर्मों की थ्योरी इसी लिये है। सत्कर्मों से सकारात्मक उर्जायें उत्पन्न होती हैं। जो आभामंडल और उर्जा चक्रोे को स्वस्थ और सुडौल रखती हैं। स्वस्थ आभामंडल ही सुखों का आधार होता है। सत्कर्म मतलब ऐसे काम जिनसे किसी का मन न दुखे। अपना और दूसरों का भला हो। परोपकार, सरलता, मृदुता, सहयोग भी सकारात्मक उर्जायें उत्पन्न करते हैं। इससे भी सुख पैदा होते हैं।
कुछ विद्वान आभामंडल, उर्जा चक्र, सूक्ष्म शरीर को सीधे उपचारित कर लेते हैं। उससे समस्यायें खत्म होती हैं। उपलब्धियां मिलने लगती हैं। इसे कोई भी कर सकता है। जरूरत सिर्फ सक्षम विद्या को अपनाने की है। इनमें एक विद्या है संजीवनी उपचार। जो ऋषिकाल से अचूक है। यदि सूक्ष्म शरीर बीमार है, घायल है तो जीवन में सुख सम्भव नही।

इसी तरह मृत्यु के बाद सूक्ष्म शरीर घायल या बीमार है तो आगे की यात्रा सम्भव नही। इसे ठीक करने की पहली जिम्मेदारी धरती वासी वंशजों की होती है। वे दान, पिंडदान, श्राद्ध, हवन, दसवीं, तेहरवीं, आत्म प्रार्थना आदि करते हैं। जिनसे एक दुनिया से दूसरी दुनिया में जा सकने में सक्षम अक्षय उर्जायें उत्पन्न होती हैं। संकल्पों के द्वारा वे मृतात्मा तक पहुंचती हैं। उनके सूक्ष्म शरीर को उपचारित करती हैं। ठीक होकर जीवत्मा प्रेत (मरीज) श्रेणी से निकल जाती है। उसकी आगे की यात्रा शुरू हो जाती है।

किंतु जिनके वंशज दान, पिंडदान, श्राद्ध, हवन, दसवीं, तेहरवीं आदि नही करते। उनके लिये बिना खर्च, बिना कर्मकांड वाली आत्म प्रार्थना भी नही करते। 12 दिन इंतजार के बाद उन पर यम व्यव्सथा लागू हो जाती है। यमदूत उन्हें अपने साथ यमलोक के अलग अलग अस्पतालों में ले जाते हैं। वहां इलाज होता है।

इस इलाज को लेकर बड़ी भ्रांति है। स्वर्क, नर्क की परिभाषा देने वाले इसे कर्मों का दंड बताते हैं। कुछ शास्त्र भी इसका समर्थन करते हैं।किन्तु ऐसा नही है। यदि ऐसा होता तो यमदूतों द्वारा दे दी गई कर्मों की सजा के बाद 84 लाख योनियों में भेजे जाने की जरूरत क्यों होती ? यही नही। 84 लाख योनियों में जन्म के बाद भी जब मनुष्य जन्म मिलता है, तो प्रारब्ध के मुताबिक सुख दुख की व्यवस्था क्यों होती ? प्रारब्ध मतलब पूर्व के जन्मों में किये गये कर्मों के परिणाम।

मतलब साफ है यमराज या यमदूत कर्मों की सजा नही देते। वे सूक्ष्म शरीर का इलाज करते हैं। सूक्ष्म शरीर के इलाज का तरीका ऐसा होता है जो सजा जैसा लगता है। जैसे किसी व्यक्ति के शरीर में बीमार हाथ से जहर फैल रहा हो। जान बचाने के लिये डाक्टर उसके हाथ को काट दें। अब इसे इलाज कहा जाये या सजा ? यमदूतों को इस बात का दुख होता है कि उन्हें क्रूर माना जाता है। उपचार का सम्मान मिलने की बजाय उन्हें क्रूरता भरा व्यवहार बताकर तिरस्कार मिलता है।

यमलोक के अस्पताल कैसे हैं ? सूक्ष्म शरीर का वहां उपचार कैसे किया जाता है ? वहां की भवतरणी नदी का रहस्य क्या है ? इन बातों को आगे जानेंगे।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या