Author Archive: Energy Guru Rakesh Acharya

जीवन की चौथी दुनियाः 13

यमलोक का मानसिक अस्पताल, भवतरणी

यमलोक के अस्पतालों में इलाज के समय जीव को आग से गुजारा जाता है। आरी, तलवारों से काटा जाता है। नुकीले भालों, कांटों पर खींचा जाता है। गर्म उबलते तेल में डुबोया जाता है। गहराई में फेंका जाता है। कोड़ों से पीटा जाता है। ऐसे ही कई दूसरे तरीके हैं। जो भारी प्रताड़ना से भरे हैं। कुछ शास्त्रों में इन्हीं का विवरण कर्मों की सजा के रूप में किया गया है। किन्तु ऐसा नही है। वास्तव में ये सब बीमार सूक्ष्म शरीर के इलाज हैं। जिनके द्वारा सूक्ष्म शरीर में घुसी नकारात्मक उर्जाओं, नकारात्मक भावनाओं को बल पूर्वक निकालना होता है।

हम नही कह रहे कि शास्त्रों में गलत लिखा गया। दरअसल लाखों साल पहले रचे गये शास्त्रों को कालांतर में हजारों बार लिखा गया। हजारों बार अनुवाद किया गया। सभी शास्त्र कोड भाषा में रचे गये। किन्तु अधिकांश बार उनकी व्याख्या अनुवादकों ने की। जो अपनी निजी समझ और सुविधानुसार बातों को पेश करते गये। जिसके कारण तमाम बातों के मायने बदल गये। उन्हें सूक्ष्म शरीर की वैज्ञानिक समझ नही थी। इसलिये उसके इलाज को कर्मों की सजा करार दे दिया। कर्मों की सजा इसलिये कहा क्योंकि मृत्यु के तुरंत बाद जीवात्मा खुद यमलोक को पार कर आगे नही बढ़ सकी। उसे प्रेत श्रेणी में रुकना पड़ा।

दूसरी तरफ धरती पर मृतकों के वंशजों को जो करना थी वह नही किया। इसके लिये भी शास्त्र अनुवादकों ने मान लिया कि मरे व्यक्ति के कर्म बुरे थे। इसलिये वंशजों में उनके प्रति लगाव व सम्मान नही था। जिस कारण उन्होंने उनके लिये दान, पिंडदान, श्राद्ध, आत्म पूजा आदि नही की। परिणाम स्वरूप मृतात्मा को आगे बढ़ने लायक शरीर नही मिल सका। 12 दिन इंतजार करने के बाद जीवात्मा को यमदूतों के हवाले कर दिया गया। इस तरह पुनर्लेखन और अनुवादकों ने समय, काल, परिस्थितियों के हिसाब से विषयों के मूल संदर्भ को प्रभावित कर दिया। अपनी सुविधानुसार व्याख्या करते गये। यमदूतों द्वारा करमों की सजा दिये जाने की बात भी इसी तरह प्रचारित की गई।

इससे मानव जाति का बड़ा नुकसान हुआ। लोग मृत्यु से डरने लगे।

ऐसा भी नही है कि कर्मों की सजा नही मिलती। किये गये कर्म उसी क्षण उर्जा में बदल जाते हैं। यह एनर्जी प्रारब्ध के रूप में लाखों सालों तक बनी रहती है। तब तक खत्म नही होती जब व्यक्ति खुद उसके परिणाम भुगत नही लेता। इसमें कई जन्म भी लग सकते हैं। इस तरह कर्मों की सजा देने के लिये यमराज या किसी अन्य की जरूरत नही होती। अलग अलग जन्मों में दुख, पीड़ा, बीमारी, गरीबी, दुश्मनी, नाकामी, समस्याओं के रूप में जीव के सामने खुद ही उनके परिणाम आते रहते हैं। बहुत बार लोग कहते हैं हमने तो कोई गलती ही नही की। फिर बार बार हम पर ही मुसीबतों को पहाड़ क्यों टूट रहा है। दरअसल वह प्रारब्ध यानी पिछले जन्मों में किये गये गलत कर्मों के परिणाम हैं। जिन्हें नर-नारी, देवी-देवता, मानव-दानव सभी को भुगतने होते हैं।

खराब कर्मों का रिकार्ड खराब उर्जाओं के रूप में सभी के सूक्ष्म शरीर में मौजूद रहता है। ब्रह्मांडीय उर्जाओं में बदलाव उन्हें सक्रिय कर देता है। तब प्रारब्ध की खराब उर्जायें दुखों, समस्याओं का रूप लेकर सामने आ जाती हैं। इनसे कोई बच नही सकता। इन्हें रोका नही जा सकता। अच्छे कर्मों से इनके दुष्परिणामों की मार को हल्का किया जा सकता है।

अब थोड़ा पीछे जाते हैं। यदि यमराज की व्यवस्था में जीव के कर्मों की सजा मिल चुकी तो अब कोई दोष नही बचा। फिर प्रारब्ध कहा से आये। संसार में कोई ऐसा नही होता जिसे प्रारब्ध न भुगतने पड़ते हों।

दूसरी तरफ 84 लाख योनियों की व्यवस्था खड़ी है। यम व्यवस्था और प्रारब्ध के बीच 84 लाख योनियों का अलग सिद्धांत है। तमाम विद्वान इसे भी कर्मों की सजा बताते हैं। उन्हें भी कुछ शास्त्रों का सपोर्ट मिला है। उनके मुताबिक जैसा कर्म वैसी योनि में जन्म।

मगर यहां भी बात सूक्ष्म शरीर के इलाज की ही है। बहुत से सूक्ष्म शरीर ऐसे होते हैं जिन्हें भावनात्मक आघात बहुत अधिक लगा होता है। यमदूतों के इलाज से उनके उर्जा अंग तो ठीक हो जाते हैं। किंतु भावनात्मक आघात के कारण उनका मन बिगड़ा रहता है। ऐसे में वे अगले जीवन की जिम्मेदारियां बिल्कुल भी नही उठा सकते। भावनात्मक बीमारियों को ठीक करने के लिये यमलोक में भवतरणी की प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इसे भवतरणी नदी कहते हैं। कहानियों के मुताबिक यह खून, मवाद, मल, मूत्र, भयानक हिंसक जानवरों से भरी बड़ी ही खतरनाक नदी है। जीव को उसमें डाल दिया जाता है। पार करके दूसरी तरफ जाना होता है। जो कि बड़ा ही दुखदायी होता है।

भवतरणी को यमलोक का मानसिक रोगियों का अस्पताल मानिये। दरअसल वह उपचारक उर्जाओं से बना नदी जैसा प्रवाह है। जिसमें गुजरने से भावनाओं की नकारात्मकता बह जाती है। चूंकि प्रवाह में एक साथ अनेकों जीव गुजर रहे होते हैं। उनके भीतर की गंदी उर्जायें उसी में बह रही होती हैं। उनमें मन की सोच के मुताबिक खून, मवाद, मल, मूत्र, मगरमच्छ जैसे हिंसक जानवरों का अहसास होता है। यहां जान लें कि एनर्जी फालो थाट्मस। यानी जैसा सोचते हैं उर्जा उसी रूप में काम करती है। सामने आती है। मरने से पहले भी, मरने के बाद भी। इस तरह भवतरणी की धारणा बड़ी ही भयानक हो जाती है।

84 लाख योनियों की व्यवस्था भी कर्म दन्ड के लिये नही है। धरती पर मानसिक रोगियों की तरह यमलोक में भावनात्मक रोगियों का लम्बा इलाज चलता है। कई जीवात्माओं को भवतरणी में लम्बे समय तक रखा जाता है। कई बार हजार साल तक। फिर भी वे ठीक न हुईं तो उन्हें 84 लाख योनियों में भेज दिया जाता है। जिसकी एनर्जी में जैसी खराबी उसे उपचार के लिये वैसी योनि में भेजा जाता है। जहां भावनाओं का शुद्धीकरण हो जाता है। वहीं से जीव को मनुष्य योनि में ले आया जाता है।

वैसे तो निश्चत नही होता कि यह सब कितने साल चलेंगा। किस योनि तक चलेगा। सिर्फ एक योनि होती है जिससे पता चलता है कि अगला जन्म मनुष्य का होगा। वह है गाय।
जितनी भी गाय हैं वे अगले जन्म में मनुष्य बनेंगी।

मनुष्य बनने के बाद भी लोगों के जीवन में दुख , समस्यायें आती हैं। उनके प्रारब्ध के कारण। इसका मतलब हुआ कि 84 लाख योनियों में जन्म लेने के बाद भी कर्मों के फल खत्म नही हुए। प्रारब्ध के रूप में बने रहे। मनुष्य जन्म का इंतजार करते रहे। दरअसल 84 लाख योनियों का सिद्धांत भी सूक्ष्म शरीर के इलाज का है न कि कर्म फल का।

उपचार के बाद सूक्ष्म शरीर देवताओं की दुनिया में कैसे पहुंचता है? वहां देवता उसके साथ क्या करते हैं? यह आगे जानेंगे।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या