एक अनुष्ठान सम्मानजनक मृत्यु के नाम

deathप्रणाम मै शिवांशु,
मृत्यु से बचने की बजाय मृत्यु को सम्मानजनक बनाकर अपनाना कब जरूरी हो जाता है. इससे आने वाले जन्मों पर क्या असर पड़ता है. किस तरह इससे मृत्यु का भय मिटता है. इन सवालों की जानकारी से हम ब्रह्मांड के तमाम रहस्यों को जान सकते हैं. इसके लिये मै आज 19 मार्च 17 को घटी एक घटना का संदर्भ दे रहा हूं.


उसका नाम जिनी था.
आज उसकी मृत्यु का दिन था.
उसने अपने संरक्षक पर आने वाला कष्ट अपने ऊपर ले लिया था.
कुछ ही देर में उसकी सांसे थमने वाली थी.
भयानक पीड़ा देने वाले आघात का शिकार हुई थी. उसके हाथ पैर शक्ति विहीन हो गये थे. घिसट घिसट कर चल रही थी. माता पिता और भाई के साथ चलने की उसकी इच्छा छटपटाहट के रूप में सामने आ रही थी. क्योंकि वह अपने हाथों पैरों का उपयोग बिल्कुल भी नही कर पा रही थी.
उस निर्दोष की बेबसी और तड़प एेसी थी कि उसे देखकर किसी की भी आंखें रो पड़ें. सपाट शब्दों में कहें तो उसकी स्थितियों की तुलना नर्क से की जा सकती थी.
इस जीवन में जिनी ने एेसा कोई काम नही किया था, जिसे नरकीय पीड़ा के लिये जिम्मेदार ठहराया जा सके.
उसके मुंह, गर्दन पर से भी नियंत्रण खत्म हो गया था. जिसके कारण खाना पीना कठिन हो गया था. अपने आप कुछ भी नही खा पा रही थी. उसका मुंह सिर्फ पीड़ा से चिल्लाने और रोने के ही काम आ रहा था. अपने जीवन में जिनी ने कभी भी अपनी जबान व दातों का इश्तेमाल किसी के भी खिलाफ नही किया था. फिर भी भयानक पीड़ा की तड़प थी.
मगर अब उसके चेहरे पर पीड़ा की जगह संतुष्टि झलक रही थी.
उसने गुरुवर की एक उंगली को अपनी नन्ही उंगलियों से कसकर पकड़ रखा था.
पिछले दो घंटे से बिना पलक झपकाये गुरुदेव को देखे जा रही थी. जैसे उनसे जन्मों का रिश्ता स्थापित कर लेना चाहती हो. जैसे कहना चाहती हो हर जन्म में  आप मुझे मिलना जरूर.
रामनामी में लिपटा उसका आहत शरीर गुरुदेव की गोद में था. उसकी सांसे हर पल कम होती जा रही थी. कई बार जिनी की आंखों के कोर पर आसू झलकते दिख जाते थे. फिर भी गुरुदेव को अपलक देख रही थी.
बीच बीच में वो गहरी सांस ले लेती. उसकी सांसों में अब पीड़ा की तड़प न थी. बल्कि तसल्ली का अहसास था.
जैसे गुरुवर की गोद में उसने अपनी मंजिल पा ली हो.
हर पल उसकी मृत्यु बढ़ती चली आ रही थी.
मगर उसके चेहरे पर अब मृत्यु का भय न था. पीड़ा के संकेत न थे.
गुरुवर की आंखों से अनवरत आसू बह रहे थे.
पिछले दो घंटों से वे जिनी को अपना सिद्ध शिव सहस्त्र नाम सुना रहे थे. बीच बीच में उसके सिर पर हाथ फेर देते. तो वो एेसे सुबकी लेती जैसे कह रही हो काश आपके साथ बिताने को कुछ समय और मिल जाता. सिर पर हाथ फरते ही उंगली पर जिनी की नन्हीं उंगलियों की पकड़ और कस जाती.
गुरुवर के लगातार बहते आंसू देखकर मै बेचैन था.
इससे पहले मैने कभी गुरुवर को इतना भावुक नही पाया था. मोह त्याग के मामले में मैने उन्हें हमेशा तत्पर देखा. किसी व्यक्ति, किसी रिश्ते, किसी स्थान, किसी वस्तु यहां तक कि किसी सिद्धी से भी वे सेकेंडों में मोह भंग कर लेते हैं. उसे एेसे छोड़ देते हैं जैसे कभी उससे उनका कोई सम्बंध ही न रहा हो.
मगर आज प्राण त्याग रही जिनी के लिए घंटों बह रहे उनके आंसू मुझे बहुत विचलित कर गये. मन में सवाल उठा क्या गुरुवर भी मोह करने लगे हैं. क्या उन्हें भौतिकता प्रभावित करने लगी है.
मगर ये समय इसका उत्तर पाने का न था. एक प्राणी अपने प्राण त्याग रहा था. ये समय ब्रह्मांड की अपरिवर्तनीय घटनाओं में से एक होता है. ये कभी रिपीट नही होता.
जिनी की तरफ बढ़ रही मृत्यु ने दुख मेरे भी मन में बो रखा था. मन मेरा भी रो रहा था. आंखे मेरी भी नम थीं.
मगर गुरुवर के आंसू जिनी के चेहरे पर टपक रहे थे.
उनका मंत्र जाप अखंड रूप से जारी था.
वे जिनी के लिये सम्मानजनक मृत्यु प्राप्ति का अनुष्ठान कर रहे थे.
शरीर से प्राण निकलने के प्रोसेस ने जिनी को थका दिया था.
थककर उसने अपना सिर गुरुदेव की हथेली पर टिका दिया.
अब तुम जाओ.
गुरुदेव ने जिनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा. शिवदूत तुम्हें लेने आ गये.
मै जिनी के चेहरे को ध्यान से देख रहा था. उसने एक गहरी सांस छोड़ी.
तभी मुझे लगा कि मेरा सिर चकरा रहा है. खुद को सम्भालने के लिये मैने दो पल के लिये आंखें बंद कर लीं.
आंख खुली तो एेसा लगा जैसे कमरे में कुछ खास हो चुका है. एेसा जो बहुत खास था. मगर आंखें बंद होने के कारण मै देख न सका. कमरे की उर्जाओं में बड़ा बदलाव महसूस हो रहा था.
जैसे कोई बड़ी शक्ति आकर चली गई हो.
जिनी पर नजर पड़ी तो मेरा रोना निकल गया. वो प्राण त्याग चुकी थी.
गुरुवर के आंसू थम चुके थे. उनके चेहरे पर उद्देश्य पूरा होने के भाव थे. उन्होंने जिनी का मृत शरीर मेरे हाथों में थमा दिया. बोले इसे रामनामी में सहेजकर अंतिम संस्कार के लिये तैयार करो.
कौन थी जिनी. क्या हुआ था उसे. गुरुवर ने उसे स्वस्थ करने की बजाय उसकी मृत्यु का अनुष्ठान क्यों किया. शिवदूत उसके प्राणों को कहां ले गये होंगे. मृत्यु के बाद अब उसका क्या होगा.
इन सवालों के जवाब मै आपको आगे दूंगा.
तब तक की राम राम.
शिवगुरु को प्रणाम
गुरुवर को नमन.
क्रमशः.

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