Author Archive: Energy Guru Rakesh Acharya

जीवन की चौथी दुनियाः 30

देवताओं का जीना मरना

कलियुग में देवता बिल्कुल सुरक्षित नही। इस युग में वे पैदा नही होते। बल्कि बनाये जाते हैं। लोग उन्हें बनाते हैं। उनसे जनकल्याण की उम्मीद करते हैं। अपनी कामनायें पूरी कराते हैं। फिर मिटा भी देते हैं। इसी कारण कलियुग में सबसे अधिक ‘देव मृत्यु’ होती हैं।

मै अपनी पत्नी प्रीति की आत्मा को उनके सवालों के जवाब दे रहा था। वे जानना चाहती थीं कि देवता पैदा कैसे होते हैं। उन्हें देवता कौन बनाता है। किन लोगों में देवता बनने की क्षमता होती है। इसके लिये उन्हें क्या करना पड़ता है। सूर्य से लेकर इंद्र तक को देव रूप में जन्म लेने के लिये क्या करना पड़ा। क्या देवताओं की मृत्यु भी होती है। क्या उन्हें हर जन्म में देवता बनने का मौका मिलता है।

आज प्रीति के सवाल ब्रह्मांड के रहस्यों की उन परतों को खींचने वाले थे। जिन पर बात करना धार्मिक लोगों के बीच लगभग प्रतिबंधित माना जाता है। वहां ऐसे सवालों को प्रभु की लीला कहकर छोड़ दिया जाता है। क्योंकि इनके जवाब कोई साधारण प्रश्नोत्तरी नही। जरा से चूके तो अर्थ का अनर्थ सामने आएगा। आमतौर पर ऐसे सवालों के जवाब टाल ही दिये जाने चाहिये। किन्तु प्रीति आत्मा रूप में खुद योगिनी स्वरूप धारण करने की तरफ अग्रसर हैं। इसलिये उन्हें तो इनके जवाब चाहिये ही।

इन बातों को जानना तुम्हारा अधिकार है। मैने कहा, मै बताता हूं। ध्यान से सुनों और समझो। देवता मनुष्यों से ऊपर नही होते। 84 लाख योनियों में 4 लाख योनियां मनुष्यों की हैं। देवता भी उसी में शामिल हैं। इस तरह देवता मनुष्य योनि के ही प्राणी हैं। वे मनुष्यों से ऊपर नही। बल्कि मनुष्यों की चेतना का उच्च विस्तार हैं।

हमारी मान्यता में 33 करोड़ देवी देवता हैं। कुछ लोग इसे 33 कोटि कहकर खुद के ज्ञान को भ्रमित करते हैं। कहते हैं कोटि का मतलब प्रकार। यानी 33 प्रकार के देवता। ऐसा नही है। यह बात कुतर्क वादियों के संतुष्ठीकरण के लिये कही जाती है। जबकि 33 प्रकार के देवी देवता तो एक मोहल्ले में ही मिल जाएंगे। हम यहां 33 करोड़ देवी देवताओं के आधार पर बात कर रहे हैं।

सतयुग में देवता मानव जीवन से सीधे जुड़े थे। एक ही परिवार में पैदा बच्चों में से कुछ देव, कुछ दानव बने। कुछ सामान्य मनुष्य रहे। काम के आधार पर उनका आकलन हुआ। जिन्होंने उर्जाओं को जगाकर अपनी चेतना का विस्तार किया। दूसरों से अलग क्षमता हासिल की। ब्रह्मांडीय नियमों को अपनाकर विशेष जिम्मेदारियां प्राप्त कीं। मानव सेवा में लगे। वे देवता हुए। उन्हीं के जिन भाई बंधुओं ने चेतना का विस्तार करके भी ब्रह्मांडीय नियम तोड़े। मानव सेवा से सरोकार तोड़ा। वे दानव हुए।

त्रेता युग में देवता मार्गदर्शक बन गये। लोगों की प्रेरणा बन गये। लोग उनके किये कार्यों को आदर्श के रूप में देखने लगे। प्रेरणा लेकर उन्हें अपनाने लगे। द्वापर में लोगों की सोच बदली। देवता अवतार माने जाने लगे। उनके कार्यों को मनुष्यों की पहुंच से परे अलौकिक माना जाने लगा। मानवों और देवताओं के बीच क्षमताओं की लकीर गहरी हो गई। मनुष्यों ने स्वीकार कर लिया कि देवता उनसे ऊपर हैं।

जबकि प्राकृतिक सच्चाई यह है कि देवता कभी भी मनुष्यों से ऊपर नही रहे। फर्क सिर्फ ये है कि देवताओं ने अपनी चेतना का विस्तार करके कार्य क्षमता उच्चतम कर ली। मानवों ने उनकी कार्य क्षमता के सामने खुद को सरेंडर कर दिया। अपने कार्य कराने के लिये उनकी क्षमताओं के सामने नत मस्तक हो गये। मान लिया कि देवता अवतार हैं। मानव उनकी बराबरी नही कर सकते। जबकि गुरुओं और ऋषियों ने इसे बार बार झुठलाया। अपनी चेतना का विस्तार कर देवताओं को अपने समक्ष नतमस्तक कराया। लोगों को भी ऐसा करना सिखाया। किंतु लोगों को अपने काम देवताओं से कराने का रास्ता ज्यादा आसान लगा। वे उसी पर चल पड़े। इस तरह देवता मनष्यों से ऊपर मान लिये गये।

कलियुग में देवता यादों का हिस्सा बन जाते हैं। इस समय लोग देव शक्ति को अपने भीतर मानने की बजाय बाहर ढूंढ़ते लगते हैं। मंदिरों में, मूर्तियों में, धर्म स्थलों में। इस युग में देवताओं का जन्म नही होता। वे आसमान से नही उतरते। लोग उन्हें अपनी भावनाओं में पैदा करते हैं। मन में एक देव छवि बैठाते हैं। उनसे लोक कल्याण की उम्मीद करते हैं। उनसे अपनी कामनायें कहते हैं। उनसे अपनी समस्यायें बताते हैं। जिनकी समस्यायें हटीं, कामनायें पूरी हुईं। उन्हें अपनी स्मृति में बसा लेते हैं। उन्हें पूजने लगते हैं। जिनसे लाभ होना बंद हो गया उन्हें यादों से निकाल देते हैं।

एक सच्चाई यह है कि देवता मनुष्यों की दी उर्जा से शक्ति पाते हैं। मनुष्य जिन्हें देव मानते हैं। जिनसे प्रार्थनायें करते हैं। उनकी स्तुति करते हैं। उनसे देव शक्तियों का प्राकृतिक विस्तार होता है। लोग जिन्हें देव मानना बंद कर देते हैं। उनकी शक्तियों का क्षरण होता है। वे विलुप्त हो जाते हैं। अध्यात्म के विद्वान इसे देव मृत्यु कहते हैं।

हजारों देवता हैं जो अब पूजे नही जाते। शास्त्रों में उनका विवरण है। किसी जमाने में वे प्रमुख देवताओं में से थे। अब लोग उन्हें जानते ही नही। स्मृति से निकाल दिया जाना किसी भी देवता के लिये मृत्यु समान होता है। ऐसा कलियुग में ही होता है। इसीलिये कलियुग में देवताओं का अस्तित्व बिल्कुल सुरक्षित नही माना जाता। अधीरता में लोग बार बार अपनी आस्था बदलते हैं। देवता बदलते हैं। पुराने देवताओं को भूल जाते हैं। नये वालों से मांगने लगते हैं।

आगे बात करेंगे परब्रह्म की। त्रिदेवों की। आदि शक्ति की। इंद्र, सूर्य, चंद्र, अग्नि, वायु, जल आदि देवों की। उनकी शक्तियों की। उनकी जिम्मेदारियों की। उनकी उत्पत्ति की। उनके जन्म की। उनकी मृत्यु की।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या