Author Archive: Energy Guru Rakesh Acharya

जीवन की चौथी दुनियाः 7

देवी का प्यार

आजकल आप मुझे अपने शरीर में घुसने ही नही देते। ऐसा क्या हो गया ? यह सवाल मृत्यु के उस पार की दुनिया से पूछा गया। पूछने वाली थीं मेरी पत्नी और मृत्युंजय योग साधकों की गुरू माता प्रीती जी। जो कुछ समय पहले शरीर छोड़ गईं। अब सूक्ष्म शरीर के सहारे सम्पर्क संवाद में थीं। मै इधर की दुनिया में। वे उधर की दुनिया में। यहां से मै उन्हें नही देख सकता। वहां से वे मुझे दख सकतीं हैं। सूक्ष्म तरंगों के द्वारा संवाद।

मै चुप रहा। कोई जवाब नही दिया।
ए जी बताइये न। उन्होंने सवाल दोहराया। वे जब जिंदा थीं तब भी अक्सर ए जी कहकर ही सम्बोधित करती थीं।

मेरे भीतर आकर तुम नॉटी सी हो जाती हो। मेरा जवाब था।
नही नहीं। क्या कह रहे हैं आप। उन्होंने सफाई दी। बस एक ही दिन तो वैसा हुआ था। वो भी मै जानना चाहती थी कि सूक्ष्म शरीर के रहते किस हद तक क्लोज हो सकते हैं। और फिर एक बात बताइये। पत्नी अपने पति के साथ नॉटी नही होगी तो किसके साथ होगी।
पति पत्नी की छेड़छाड़ में ही तो प्यार है।
अरे अरे। जरा रुकिये देवी जी। मैने कहा पति-पत्नी का प्यार? अभी भी तुमको लगता है मै तुम्हारा पति हूं।
क्या उस दुनिया में ऐसे रिश्ते चलते हैं ?

चलते तो नही हैं। उन्होंने बताया।
मगर प्यार-प्रेम की भावनाओं के शिवा जीव के पास यहां बचता ही क्या है। जमीन, जायदाद, रुपये, पैसे, घर, मकान, खेती, बाड़ी, जेवर, कपड़े, रासन, पानी, दवा, दारू। कुछ भी तो यहां नही। जिसमें जीव अपना मन लगाये। लड़ाई, झगड़ा, दुश्मनी, बदला, ऊंच, नीच, कम्पटीशन, दिखावा। ये वाले इमोशन भी यहां नही चलते।
प्रेम- प्यार ही वे भावनायें है जो सूक्ष्म चेतना को राहत देती हैं। जिन्हें चेतनायें पाना चाहती हैं।
किन्तु यहां कोई उसे देने में सक्षम नही। कहने को यह देवताओं की दुनिया है। मगर प्यार के मामले में एकदम उजाड़ है। प्रेम के जिस इमोशन से सूक्ष्म चेतनाओं को राहत मिलती है। उसकी यहां एक बूंद नही।
प्यार तो मृत्यु के पहले की चीज है। मृत्यु के बाद उसे कोई नही दे सकता। उसी को लेकर सूक्ष्म चेतनाओं में भटकन होती है।
मै तो कहती हूं जो प्रेम करे उसे जीवन में पहले नम्बर पर रखना चाहिये। उससे खूब प्यार करना चाहिये। कोई भी दिन जिंदगी का आखिरी दिन हो सकता है। तब ये सब बहुत याद आता है। मरने के बाद इसकी सिर्फ छटपटाहट बचती है। जो नर्क का कारण बन सकती है।

बात बहुत विकट थी।
मृत्यु के बाद जीवात्मा जो मांगती है उसे जीवन में ही पाया जा सकता है।
वह है प्यार।
जीवात्मा धरती पर छूटा प्यार व अपनापन पाने की जिद करती है। उसके लिये भटकती है।
इस भटकन से देवताओं की दुनिया में नकारात्मकता उत्पन्न होती है। अराजकता फैलती है।
आशक्ति की लिमिट तक बढ़ चली प्यार, प्रेम की तड़प को मोह माया करार दे दिया जाता है।
कंट्रोल के लिये यमदूतों को सक्रिय किया जाता है।

आप खूशबू की शादी कर दीजिये। उन्होंने ख्वाहिश प्रकट की। खुशबू मेरी छोटी बेटी का नाम है।
मै थोड़ा अचम्भित हुआ। पूछा क्या तुम मोह-माया की तरफ जा रही हो ?
नही। ऐसा नही है। उनका जवाब आया। एक बात का मन में बार बार दुख होता है। जब हास्पिटल में थी तब उस पर नाराज हो गई थी।
क्यों ? मैने पूछा।
मै उससे कह रही थी कुछ अदृश्य एनर्जी मेरे पास आ रही हैं। मुझे परेशान कर रही हैं। उन्हें हटा दो। उसने उनकी तरफ ध्यान ही नही दिया।
अरे राम राम। मैने समझाया। अभी तो वह बच्ची ही है। और फिर जिसकी मां मृत्यु शैया पर पड़ी हो। दर्द से छटपटा रही हो। वह बच्ची अदृश्य दुनिया की बातों पर ध्यान कैसे लगा सकती थी ?
हां, यही तो जब मुझे समझ आया तो उस पर नाराजगी का अफसोस उभर आता है मन में। उन्होंने बताया। उससे मांफी मांगनी है। मगर आपने बच्चों से सम्पर्क करने को मना कर रखा है।
तुम्हारे जाने से बच्चे पहले ही सहम गये हैं। मैने कहा। उन्हें मृत्यु के उस तरफ की दुनियाओं की समझ नही। एसे में तुम उनसे सम्पर्क करोगी तो वे डर जाएंगे। पता नही उन पर किस बात का, क्या और कितना असर पड़े। इसलिये मैने तुम्हें रोका।

एक बात बताओ। मैने सवाल किया। क्या मरने के पहले की सारी बातें तुम्हें याद हैं ?
नही, सारी नही। मगर कुछ हैं जो इमोशन के लेबल पर याद हैं। उनका जवाब था।
इसका मतलब अलर्ट रहना होगा। मैने कहा। कभी भी तुम मोह माया की तरफ लौट सकती हो।
ऐसा बिल्कुल नही है। उनके जवाब में कांफीडेंस था। छूटे जीवन और वहां छूटी चीजों से मुझे कोई मोह नही। आपके रहते बच्चों की भी चिंता नही। बस सिर्फ आप हो, जिसकी तरफ मन जाता रहता है।
ओह, हो। प्रेतनी का प्यार! मैने मजाक में छेड़ा।
प्रेतनी तो न बोलिये अब मुझे। बिना बुरा माने उनका जवाब आया। कितनी मेहनत करके आपने ही तो उस दुनिया से निकाला है। अब तो मेरी इंट्री देवताओं की दुनिया में है।
यानी देवी का प्यार! मैने बात आगे बढ़ाई।
वे खुश हो गईं। जवाब आया। हां ये ठीक है। बड़ा अच्छा लगा सुनकर। मै भाग्यशाली हूं। जो मरने के बाद भी मुझे प्रेम संतुष्टि मिल रही है। इसी कारण मुझमें कोई भटकन नही। आप निश्चिंत रहिये। मोह- माया में बिल्कुल नही अटकुंगी। बिना अटके-भटके उस दैवीय लक्ष्य को पूरा करुंगी जो आपके कहने पर मैने देवताओं को बताया है।

मान्यता है ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नही हिलता। ऐसे में क्या कोई जीवात्मा अपनी इच्छा से अपना लक्ष्य तय कर सकती है ? देवताओं के सामने उन्होंने अपने लिये क्या लक्ष्य रखा ? उसे पूरा करने के लिये अदृश्य दुनिया में उन्हें क्या करना पड़ रहा है ? इस पर हम आगे चर्चा करेंगे।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या