Author Archive: Energy Guru Rakesh Acharya

गुप्त काशीः जहां देवी दर्शन देने खुद चली आयीं

गुरु जी की हिमालय साधना…10GUPT-KASHI

राम राम, मै शिवप्रिया
गुरु जी पिछले दिनों अपनी गहन साधना के लिये देव भूमि हिमालय की शिव स्थली केदार घाटी में रहे। अपनी साधना का पांचवा चरण उन्होंने गुप्तकाशी में पूरा किया. जहां शक्तियां साधकों की तरफ खुद आकर्षित होकर खिंची चली आती हैं.

|| गुरु जी ने बताया…||
गुप्त काशी में बाबा विश्वनाथ का मंदिर है. ये गंगा यमुना की गुप्त जल धाराओं के ऊपर बना है. ये धारायें बड़े ही रहस्यमयी तरीके से सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित गंगोत्री और यमुनोत्री से पहाड़ी जल सुरंगों के जरिये यहां आती हैं. मन्दिर के नीचे पवित्र जल धाराओं का निरन्तर प्रवाह होने से वहां की ऊर्जाओं का स्तर प्राकृतिक रूप से बहुत उच्च कोटि का बना रहता है। मैंने वहां हर क्षण खुद की ऊर्जाओं को हाई डाइमेंशन में पाया। मन्दिर में बैठने मात्र से अपने आभामण्डल और ऊर्जा चक्रों में व्यापक बदलाव होते देखा।
ऐसा अनुभव पहले कहीं नही हुआ था।
मन्दिर परिसर में खड़े होने भर से विचारों में परिवर्तन शुरू हो जाता है। मैंने वहां सिद्धियों की ऊर्जाएं स्वतः आकर्षित होते देखीं। विलक्षण ऊर्जाओं के समूह अपनी तरफ खुद ही खिंचे आते देखे। जैसे दूसरे डाइमेंशन की ऊर्जाएं, वहां की शक्तियां खुद अपने आप में लीन कर लेने को आतुर हों। वो शक्तियां जिन्हें पाने के लिये साधक आतुर घूमते हैं।
इसीलिये यहां मेरे लिये सिद्धियों की राह आसान हो गयी।
एक छोटा सा उदाहरण दूँ। मै हर रोज मन्दिर में शिव सहस्त्र नाम के साथ शिवार्चन करने जाता था। वहां गर्भ गृह में शिवलिंग के पास माँ पार्वती की काले पत्थर से बनी मूर्ति है। ये मूर्ति देवी माँ की दूसरी मूर्तियों की तरह नही है। बल्कि इसकी मुद्रा बिलकुल अलग तरह की है। सौंदर्य और सौम्यता की देवी की तरह है ये मूर्ति। चेहरा सीधा न होकर एक तरफ को तिरक्षा मुड़ा है। जैसे किसी ब्रह्मांड सुंदरी ने नजाकत से मुंह मोड़ा हो। देवी की ये मोहक मुद्रा देखकर पता चलता है परम् तपस्वी भोले नाथ उन पर कैसे मोहित हुए होंगे। खुद को उनके सम्मोहन से रोक ही न पाये होंगे।
उस दिन मैंने सोचा था कि पञ्च अनुष्ठान करूँगा। करने लगा। मै शिवसहस्त्र नाम सुना रहा था। शिव सुन रहे थे। तीसरे अनुष्ठान के बीच में मुझे लगा कि मुझ पर सम्मोहन हो रहा है। वैसे तो मंदिर में जलाभिषेक करने वालों का ताता होता है. मगर कुछ देर के लिये वहां कोई नही आया. मंदिर में मै अकेला ही बचा. ध्यान बार बार देवी माँ की मूर्ति की तरफ खिंच रहा था।
इतना कि मै खुद को रोक न पाया और भोले नाथ को छोड़कर उन्हें ही देखने लगा। बस देखता रहा। कुछ मिनट बाद लगा मै जो करना है उसकी बजाय कुछ और करने लग पड़ा।
मैंने तुरन्त देवी माँ के समक्ष मन ही मन विनम्र अनुनय अर्पित कर दिया। कहा आपका सम्मोहन मेरी एकाग्रता तोड़ रहा है। मूर्ति में मोहक मुस्कान दिखी। मानसिक सन्देश मिला। जैसे वे कह रही हों मुझे भी सुना दो शिव सहस्त्र नाम।
जी ठीक है। कहकर मैंने उनकी तरफ से ध्यान हटाया और पुनः शिव गुरु को शिव सहस्त्र नाम सुनाने लगा।

तीसरा अनुष्ठान पूरा हुआ. देवी की मूर्ति पास ही थी. मै उनके सामने गया. उन्हें शिव सहस्त्र नाम सुनाने का संकल्प लेते समय मन में लालच उत्पन्न हो गया. उनसे कहा अब आपको शिव सहस्त्र नाम सुनाने जा रहा हूं. आप सुने और स्वीकार करें. प्रशन्न हों. साक्षात् आयें और मुझे शिव सिद्धी का आशीश देकर जायें. हलांकि पहले मेरे मन में इस कामना की आकांक्षा नही थी. मगर जब लगा देवी जी खुद सुनना चाहती हैं. तो उनके आशीश का लालच जाग उठा. जबकि ये पड़ाव मेरी इस साधना की योजना में शामिल न था.
इसके लिये तो मंदिर की शक्तियों ने खुद ही मुझे आकर्षित किया. एेसी ही दिव्य हैं गुप्त काशी की दैवीय उर्जायें. जहां शक्तियां खुद साधकों की तरफ आकर्षित हो जाती हैं.
मै मंदिर के गर्भग्रह की विपरीत दिशा में खड़े होकर शिव सहस्त्र नाम सुनाने लगा. चूंकि उसका अर्पण देवी को होना था, इसलिये इस बार शिवार्चन नही किया. इस बीच बाबा विश्नाथ का जलाभिषेक करने वाले भक्त आते जाते रहे. खड़े खड़े ही मै सहस्त्र नाम जाप करता रहा. जप पूरा हुआ तो देवी को अर्पण किया. और शिवलिंग को नमन करने के लिये नीचे बैठ गया.
इस बीच साधना की उमंग में भूल ही गया था कि मैने देवी से साक्षात् आकर आशीश देने को कहा है. शिवलिंग को नमन करके सिर ऊपर उठाया तो सामने खड़ी जलाभिषेक कर रही एक महिला मेरी तरफ देखकर मुस्करा रही थी. वो शिवलिंग के दायीं तरफ इशारा करके बोली ये आपको आशीर्वाद देकर जा रही हैं. मैने उधर देखा. तीन चार साल की एक कन्या मेरे पास से पलटकर वापस जा रही थी. उसका पहनावा विशुद्ध पहाड़ी था. पीले कपड़े उसके गले से पैरों तक टाइट होकर लिपटे थे. पैरों के सिर्फ पंजे ही खुले थे. गले पर भी पीला कपड़ा लिपटा था. सिर पर भी पीला कपड़ा बांध रखा था. उसके ऊपर कंधों से चुन्नी भी ओढ़ रखी थी. वो भी पीली ही थी. कपड़े सूती थे. उनकी क्वालिटी मंहगी नही लग रही थी. मगर कपड़े पहने बड़े करीने से थे. जैसे किसी ने स्कूल के किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिये छोटी बच्ची को सजाया हो.
वो पलटकर मेरी तरफ मुड़ी. मुस्कराई और बाहर की तरफ चली गई.
मुझे लगा कोई लड़की अपने माता पिता के साथ दर्शन करने आई होगी. और उनके साथ ही वापस जा रही है. सामने खड़ी महिला ने मुझे दोबारा बताया कि वो लड़की आपको आशीश देकर गई है. जब आप शिवलिंग पर माथा टेक रहे थे, तब उसने शिवलिंग को प्रणाम करके आपके सिर पर हाथ रखा. मैने बात सुुनी तो, मगर अनसुनी कर दी. क्योंकि अनुष्ठान की उमंग में मुझे याद ही नही था कि मैने देवी से कुछ मांगा है. हलांकि माथा टेकने के समय मुझे लगा तो था कि मेरे सिर को छुआ गया. मगर मैने समझा शिवलिंग के ऊपर लटके घड़े से टपक रहा पानी सिर पर गिरा होगा.
मैने शिवार्चन के साथ पांचवा अनुष्ठान शुरू कर दिया. लगभग 25 मिनट लगे. अनुष्ठान पूरा करके मंदिर से बाहर निकला. तो वही लड़की मुझे फिर दिखी. तब मेरा ध्यान उसकी तरफ गया. इतनी देर से ये यहां क्या कर रही है. घर वापस क्यों नही गई. उसके घर वाले कहां हैं.

मैने सोचा था वो अपने माता पिता या घर वालों के साथ आई होगी. मगर वो तो अकेली थी. और अब गंगा यमुना के जल कुंड की दूसरी तरफ स्थापित नंदी की मूर्ति को छूती हुई बाहर जा रही थी. उस रास्ते पर जो आगे मुड़कर पहाड़ों की तरफ जाने वाला था. मैने उसके पहनावे पर दोबारा ध्यान दिया. पहनावा तो पहाड़ी ही था, मगर स्थानीय नही था. बल्कि ऊंचे बर्फीले पहाड़ों पर रहने वाले लोग एेसे कपड़े पहनते हैं. वो अकेली ही उधर जा रही थी. उसे अपने नन्हें हाथों को पास पड़े बड़े पत्थरों पर टिका कर आगे बढ़ना पड़ रहा था. क्योंकि राह पर पड़े पत्थर बड़े थे. पैर छोटे होने के कारण वह सीधी चढ़ती तो लुढ़क कर गिर जाती.
पत्थर पार करके रूकी. मुढ़ी. मेरी तरफ देखा. और हौले से मुस्करा दी. फिर पहाड़ियों की तरफ जाने वाले रास्ते पर चल पड़ी. मेरे मन में विचार आया. ये अकेली. वो भी पहाड़ों की तरफ…। तभी याद आया. मैने देवी मां से साक्षात् आकर आशीश देने को कहा था. अरे ये तो वो हैं. नये विचार के आते ही मैने उनकी तरफ जाने को सोचा. मगर रुक गया. उनके पीछे न जाकर वापस मंदिर में चला गया. वहां देवी की मूर्ति के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा हो गया. कहा क्षमा करना मां. पहचानने में देर लगी. आपको इंतजार करना पड़ा.
देवी मूर्ति के चेहरे पर मुस्कान और मोहक होती चली गई.
क्रमशः…।

… अब मै शिवप्रिया।
गुप्त काशी के बाबा विश्वनाथ मंदिर की उर्जायें एेसी क्यों हैं कि वहां शक्तियां खुद साधकों को आकर्षित करने लगती हैं. गुरु जी द्वारा बताये इस रहस्य को आपके लिये मै जल्दी ही लिखुंगी.
तब तक की राम राम।
शिव गुरु जी को प्रणाम।
गुरु जी को प्रणाम।.