एक मां जिसने कभी गुस्सा नही किया.

Happy Mother’s day


प्रणाम मै शिवांशु
मदर्स डे पर गुरदेव ने आज शिव साधकों के whatsapp ग्रुप में अपने जीवन का एक अछूता राज शेयर किया है. जिसे पढ़कर मै भावुक हो गया और गौरान्वित भी. उनकी पोस्ट मै यहां उन्ही के शब्दों में प्रस्तुत कर रहा हूं.

गुरुवर की पोस्ट…….
सभी को राम राम
…. माँ तुम्हें सलाम!
आज खास मौका है. इसलिये मै आपके साथ एक निजी राज शेयर कर रहा हूँ.
ऐसा किसी और ने बताया होता तो शायद मै उस पर यकीन न कर पाता. मुझे संदेह होता कि इस ज़माने में ऐसा कैसे हो सकता है.

मेरी उम्र क्या है ये यहां बताने का औचित्य नही. फिर भी इतना बताता चलूँ कि जब से मैंने होश सम्भाला यानि कुछ जानने समझने लायक हुआ. तब से अब तक आधी सदी बीत चुकी है.
अपनी याददास्त के इन 50 सालों में मैंने अपनी माँ को कभी गुस्सा करते नही देखा.
ऐसा नही है कि उन्होंने अपने जीवन में दुःख नही देखे, ऐसा नही है कि उन्होंने अपने जीवन में अपमान नही सहे, ऐसा नही है कि उन्होंने तिरस्कार का सामना नही किया. ऐसा भी नही है कि उन्हें कभी आभाव से नही गुजरना पड़ा हो.
फिर भी माँ को कभी गुस्सा करते नही देखा.

मुझे बचपन याद है. पापा जमींदार थे. वे गुस्सैल राजकुमार की तरह रहते थे. उनका स्वाभाव फ़िल्मी ठाकुरों वाला था. बहुत अधिक धार्मिक होते हुए भी बहुत गुस्सैल थे. गलती होने पर नौकरों को नीम के पेड़ से बांधकर घोड़े के कोड़ों से पीटते थे.घर के लोगों पर भी इसी तरह टूट पड़ते थे।
फिर भी माँ को कभी गुस्सा करते नही देखा।

गुस्से के समय पापा को रोक सके ऐसी हिम्मत किसी में न थी. क्षेत्र के लोग उनसे डरते थे. हलांकि लोग उनका सम्मान भी करते थे. क्योंकि पापा के डर से क्षेत्र में डाकू नही घुसते थे। जबकि बहुत दूर होने के कारण तब वहाँ पुलिस डाकुओं को रोक पाने में नाकाम थी. साधू सन्तों की सेवा करने, पंचायत में सबके साथ उचित न्याय करने, क्षत्रिय होकर भी जाति पाति का विरोध करने के कारण भी क्षेत्र के लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। वे उस जमाने में आस पास के गांवों में सबसे अधिक पढ़े लिखे व्यक्ति थे। मगर उन्हें गुस्सा बर्दास्त न था। जो उनके गुस्से का शिकार हुआ, उसको भयानक यातना से गुजरना पड़ता था।
फिर भी माँ को कभी गुस्सा करते नही देखा।

बाहर वालों की तरह ही घर के लोगों के लिये भी वे उतने ही गुस्सैल थे. उनके गुस्से को बर्दास्त न कर पाने के कारण उनकी पहली पत्नी गंगा मइया की गोद में समा गयीं. दूसरी छोड़कर मायके चली गयीं. तब बड़े घरों के लडकों को कई शादियां करने की छूट रही होगी. तीसरी आईं माँ. पापा के गुस्से के साथ जीवन बिताना बर्दास्त की पराकाष्ठा थी.
फिर भी माँ को कभी गुस्सा करते नही देखा.

उन दिनों दादी का स्वाभाव बहुत ही डॉमिनेटिंग था. खानदान में उनकी तूती बोलती थी. फ़िल्मी सास ललितापवार उनके सामने कुछ न थी. उनकी मंझली बेटी यानि मेरी मंझली बुआ के सामने कुख्यात फ़िल्मी ननद शशीकला की साजिस कुछ न थी. तब दोनों के जीने का मकसद एक ही नजर आता था, वो ये कि बहुओं को कैसे कैसे प्रताड़ित किया जाये. दरअसल उस जमाने में बहुओं को प्रताड़ित करना ठाकुर परिवारों का चलन था। मुझे याद है उनकी सजिसों का पहला शिकार माँ ही होती थी. वो भी दिन में कई कई बार.
फिर भी माँ को कभी गुस्सा करते नही देखा.

खानदान के अन्य लोग शुरू से ही माँ का सम्मान करते थे। बाद में उम्र के साथ दादी का भी स्वाभाव बदला. या यूँ कहें कि माँ ने अपनी विनम्रता से उन्हें बदल लिया. बदलाव के बाद दादी ने माँ को बहुत सम्मान व् अपनापन दिया। वे 103 साल तक जीं. उनकी मृत्यु पर माँ कई दिन रोई थीं.

युग बदल गया.
सब बदल गए. सबने माँ की सहनशीलता देखी. सबने उनकी करुणा देखी. सबने उनकी ममता देखी. सब उनके कायल हुए. मुझे याद है पापा के गुस्से से पीड़ित लोगों की वे छिप छिपकर मदद किया करती थीं. कभी पता चल जाता तो उन्हें इसकी दर्दनांक कीमत चुकानी पड़ती थी. क्योंकि पापा को माफ़ करना नही आता था.
फिर भी माँ को कभी गुस्सा करते नही देखा.

माँ ने लोगों के प्रति दयालुता न छोड़ी. मर्यादा इतनी कि वे अभी भी गांव में घूंघट करती हैं.
अब सारे गांव के लोग माँ को मम्मी कहकर पुकारते हैं. यहां तक कि गांव के बुजुर्ग भी उन्हें सम्मान से मम्मी कहकर ही संबोधित करते हैं.
क्योंकि गांव ने बचपन से मुझे उन्हें मम्मी कहते सुना है.

उम्र के अंतिम पड़ाव में पापा ने बैराग्य ले लिया। सन्यासी हो गए। उनके अंतिम समय तक माँ ने आदर्शवादी पत्नी के रूप में सेवा की. अब भी उन्हें याद करके घर की पुरानी चीजों को निहारती हैं. कहती हैं बुराइयां तो सबमें होती हैं. मैंने तो उनकी अच्छाइयाँ अपनाई थीं. उनकी ख्वाहिश है कि उनके पति को मोक्ष ही मिले.

फिर समय आया बहुओं का. माँ की बहुओं का. जमाना बदल चुका था. आज की बहुओं में और बेटों में भी जिंदगी अपने तरीके से जीने का चलन है. जिसके कारण जाने अनजाने कई बार माता पिता उपेक्षित हो ही जाते हैं. कई बार उन्हें भी उपेक्षित होते देखा.
फिर भी माँ को कभी गुस्सा करते नही देखा.

उनके जवान बेटे यानि मुझसे छोटे भाई ने छोटी उम्र में सन्यास ले लिया. घर से वनवास को चले गये. उस दुःख की परछाई लम्बे समय तक माँ के चेहरे पर दिखी. खूबसूरती के कारण रिश्तेदारी में कुछ लोग माँ को मीनाकुमारी कहा करते थे. मीनाकुमारी उस समय की प्रसिद्धः एक्ट्रेस थी. उस गम ने माँ के चेहरे पर मीनाकुमारी की सी ही उदासी छाप दी.
फिर भी माँ को कभी गुस्सा करते नही देखा.

कुछ सालों बाद उनके सन्यासी बेटे की मृत्यु की खबर मिली. पता चला कि अपने शिष्यों को बचाने के लिये वे एम पी के बीहड़ों में डाकुओं से भिड़ गए. उसी में उनकी जान गयी. वे भी पापा की तरह अधिक साहसी थे.
माँ चाहतीं तो मुझे डाकुओं से बदला लेने के लिये उकसा सकती थीं। क्योंकि तब मीडिया में होने के कारण मै इसमें सक्षम था।
फिर भी माँ को कभी गुस्सा करते नही देखा.

माँ ने हमेशा मुझे धैर्य से जीने का सबक दिया. बचपन में देवी देवताओं की कहानियाँ सुनाते हुए कहती थी शिव बनो और सबका जहर पी जाओ। तब मै सोचता था माँ की ख़ुशी के लिये शिव ही बनुँगा, बस ये नही पता था कि शिव क्या हैं।

मै अपने रिश्तेदारों से अक्सर एक सवाल पूछता हूँ. क्या किसी ने माँ को कभी गुस्सा करते देखा है? वे कहते हैं गुस्सा तो क्या हमने उन्हें कभी ऊंची आवाज में बात करते भी नही देखा.
सच! मैंने भी कभी नही देखा.
मुझे नही पता कि दुनिया में माँ की तरह कोई और भी ऐसा है या नही, जो कभी गुस्सा न करता हो, जो कभी ऊंची आवाज में बात न करता हो.

माताओं को अपनी संतान पर गर्व होता है. मुझे अपनी माँ पर गर्व है.
माँ तुम्हे प्रणाम!
तुम्हारी सहनशीलता को प्रणाम!
तुम्हारी ममता को प्रणाम!
तुम्हारी करुणा को प्रणाम!
तुम्हे बनाने वाले विधाता को प्रणाम!
Happy mother’s day.

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