मेरी पहली उच्च साधना….7 अंतिम

प्रणाम मै शिवांशु

जब गुरुवर ने बताया कि आक्सीजन के कणों को खुली आंखों से देखना है. उनके साथ ही नाड़ियों में प्रवेश करके साधना करनी है. तो बड़ा अचरज लगा. गुरुदेव कह रहे थे. तो साफ था कि एेसा होता ही होगा. मगर कभी न सुना था न पढ़ा था. न सोचा था. सो दिमाग में  सवालों का जमावड़ा हो गया था. आक्सीजन तो दिखती नहीं, फिर उसके कणों को कैसे देखा जा सकता है.

और फिर आक्सीजन के सूक्ष्म कणों के साथ यात्रा करना, वह भी एक मिनट में 192  हजार किलो मीटर से अधिक.

बड़ा ही तिलस्मी प्रतीत हो रहा था.

गुरुवर के मार्ग दर्शन के बावजूद अनिश्चितता की दीवार घेरे खड़ी थी.

क्या और कैसे. लगता था मेरी दुनिया इन्हीं दो शब्दों में अटक गई थी. मन में अनुत्तरित  सवाल तो थे. मगर रोमांच भी कम न था. भीतर से एेसे लग रहा था, मै अंतरीक्ष यात्रा पर निकल रहा हूं. वह भी बिना अंतरीक्ष यान के।

जब मैने नाक पर सबसे छोटे सफेद बिन्दु का त्राटक शुरू किया. तो तस्वीर क्लीयर होने लगी. अब मुझे नाक की तरफ आने वाली आक्सीजन के पार्टिकल सहित उन तमाम चीजों की स्पष्ट झलक मिलने लगी थी. जो सामान्य आंखों से नही दिखतीं.

धीरे धीरे स्पष्टता बढ़ती जानी थी. एक समय एेसा आने वाला था. जब मै आक्सीजन के सूक्ष्म कण खुली आंखों से देख सकता था. अब मै सोच रहा था कि कुछ मामलों में आज की साइंस कितने पीछे है. वे हमारे शरीर को उपकरण की तरह यूज ही नही कर पाते. शायद इसलिये कि वे इसके बारे मे सोचते ही नही.

अंतिम अभ्यास के बाद मुझे साधना शुरू करनी थी.

साधना आत्म तत्व से कराई जानी थी. स्वयं के रूप में उसे शरीर की आंतरिक यात्रा के निर्देश देने थे. उन्हें पूरा भी कराना था.

साधना में नाक की तरफ आने वाले आक्सीजन कणों में से किसी एक के साथ अपनी ही नाक में प्रवेश करना होता है. उसी कण के साथ नाभि तक जाना होता है. जहां शरीर के उर्जा का स्टोर रूम होता है. स्टोर से अतिरिक्त उर्जा देकर कण की गति बढ़ा देनी होती है. फिर उसका पीछा करते हुए फेफड़ों तक पहुंचना होता है. वहां से रक्त नाड़ियों में प्रवेश कर जाना होता है. तंत्रिका तंत्र चार्ट में सारे रास्ते दिये हैं. उन्हें याद कर लेने के बाद ये काम मुश्किल नही बचता.

खून की नाड़ियों, नसों, धमनियों की कुल लम्बाई 96460 किलो मीटर से कुछ ज्यादा होती है. उसे पूरा करके मस्तिष्क में स्थित पिनियल ग्रंथि के जरिये उर्जा नाड़ियों में प्रवेश करना होता है. यह काम आक्सीजन कण के कार्बन डाई आक्साइड में बदलने से पहले ही पूरा करना होता है. इसी कारण कण की गति कई गुना बढ़ानी होती है. क्योंकि सामान्य स्थितियों में प्रायः आक्सीजन के कण फेफड़ों में ही कार्बन के साथ मिलकर रूप परिवर्तन शुरू कर देेते हैं.

उर्जा नाड़ियों की कुल लम्बाई भी तकरीबन रक्त नाड़ियों के बराबर ही होती है. उस दूरी को पूरी करके. दोबारा नाक की तरफ आ रहे नए आक्सीजन कण के पीछे लग जाना होता है. साधना के दौरान इसे लगातार दोहराना होता है. इससे विशाल उर्जायें मुक्त होती हैं. जो पंच तत्वों की सीमाओं को पार कर जाती है.

सुनने में बहुत मुश्किल होते हुए भी अभ्यासों को पूरा करने के बाद साधना मुश्किल न लगी.

एक माह की तैयारी के दौरान सारी इच्छायें शून्य सी हो चली थीं. सो मन का भटकाव न था.  न खाने की चिंता थी, न बातें करने की चाहत. न मनोरंजन का मन था, न सोने का नशा. अब समझ में आ रहा था कि गुरुवर ने साधना की पाबंदियां इतनी सख्त क्यों की थीं. ताकि इच्छायें ही न रहें. इंद्रियां खुद ही स्थिर हो गईं.

इसी लिये ब्रह्मांड विलय मुश्किल न था. पंच तत्वों की सीमायें लांघते ही दुनिया अलग हो जाती है. मै कौन हूं, मै दुनिया में क्यों आया, मृत्यु के बाद कहां जाना है. ये सवाल तब छोटे और गैर जरूरी हो जाते हैं.

ब्रह्मांड विलय साधना वाकई तिलस्मी सच था.

सत्यम् शिवम् सुंदरम्

शिव गुरु को प्रणाम

गुरुव को नमन.

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