दूसरे दिन की साधना गुरु गोरखनाथ की जलाई धूनी पर हुई

गुरु जी की हिमालय साधना…3

राम राम, मै शिवप्रिया

गुरु जी इन दिनों अपनी गहन साधना के लिये देव स्थली हिमालय में हैं। साधना का पहला चरण मणिकूट पर्वत पर कदलीवन में पूरा किया। प्रथम चरण पूरा होने पर पिछले दिनों ऊँची पर्वत शिखाओं से उतरकर हरिद्वार आये। तब फोन पर विस्तार से बात हो सकी। मैंने उनसे अपनी साधना को विस्तार से बताने का अनुरोध किया। जिससे मृत्युंजय योग से जुड़े साधक प्रेरणा ले सकें। साधकों के हित को ध्यान में रखकर गुरु जी ने साधना वृतांत विस्तार से बताना स्वीकार कर लिया। मै यहां उन्हीं के शब्दों में उनका साधना वृतांत लिख रही हूँ। 

( गुरु जी ने आगे बताया…)

सावन में शुरू हुई इस बार की गहन साधना में मैंने शिव सहस्त्र नाम सिद्ध करना तय किया। इसलिये हिमालय की केदारघाटी  सबसे उपयुक्त है।

हालांकि ये पहले से तय नही था। एक इमरजेंसी के तहत मुझे आनन फानन यहां आना पड़ा। आ गया तो शिव गुरु के चरणों में साधना सिद्धी की अर्जी लगा दी। वे मान गए। लोक हितार्थ शिव सहस्त्र नाम सिद्ध करने का आदेश मिला। आदेश मिला तो याद आया कि 2009 से इसे करने की इच्छा दबी पड़ी थी। तभी मैंने शिव सहस्त्र नाम को कण्ठस्थ किया था। पर  व्यस्तताओं के चलते सिद्धि साधना न कर सका। 

अब मैंने शुरू कर दी। इसके तहत मैंने अलग अलग सिद्ध स्थलों पर जाकर शिव सहस्त्र नाम की सिद्ध संख्या पूरी करना तय किया। साथ ही शिवार्चन का प्रावधान रखा। शिव गुरु का यही आदेश था। 

बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिये सिद्धों द्वारा हर युग में ऐसे अनुष्ठान किये जाते रहे हैं।

अगले दिन की साधना के लिये मैंने झिलमिल गुफा जाने का निर्णय लिया। 

झिलमिल गुफा पार्वती मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर ऊपर है। नीलकण्ठ से 3 किलोमीटर पार्वती मंदिर की चढ़ाई। उसके बाद झिलमिल गुफा की चढ़ाई। भक्त वहां पहुचते पहुचते थक कर पस्त होते नजर आये। यहां के पहाड़ी जंगलों में खतरनाक  जानवरों का भय बहुत अधिक रहता है। इसलिये उसी दिन लोगों को वापस भी आना होता है। 

मान्यता है कि झिलमिल गुफा में गुरु गोरखनाथ ने अपने सिद्ध मन्त्रों के 16 हजार परीक्षण किये। 

‘मन्त्रों का परीक्षण!’ हो सकता है ये बात आपके लिये नई हो। ये सिद्धों की भाषा है। जिस तरह से एटम बम बनाया कहीं और जाता है। उसका परीक्षण कहीं और होता है। ऐसी जगहों पर जो निर्जन हों। जहां बम की तबाही से किसी को खतरा न हो। साथ ही उसके रेडिएशन के आबादियों तक पहुँचने की गुंजाइश न हो।

उसी तरह सिद्ध तांत्रिक मन्त्रों का परीक्षण भी सुरक्षित क्षेत्रों में ही किया जाता है। अन्यथा जन जीवन को भारी हानि का खतरा रहता है। ये मर्यादा सभी सिद्धों को निभानी होती है। 

कदलीवन चार पर्वत श्रेणियों में फैला है। गंगा की धारा इन्हें बांटती है। एक तरफ मणिकूट और विष्णुकूट की पहाड़ियां हैं। दूसरी तरफ रुद्रकूट और प्रयागकूट के पर्वत श्रेणियाँ हैं। 

आज की भौगोलिक स्थित के मुताबिक एक तरफ टिहरी और दूसरी तरफ पौड़ी जिलों का प्रशासन है। 

मणिकूट पहाड़ पर जहां मै था वहां यमकेश्वर ब्लाक की सीमा है। यहां के पर्वतीय वनों में मार्कंडेय ऋषि ने महामृत्युंजय की सिद्धि पायी थी। अब उस जगह को यमकेश्वर आश्रम के नाम से जाना जाता है।

मणिकूट की पहाड़ियां सूखी हैं। यहां पानी की बहुत दिक्कत है। कई कई किलोमीटर तक पानी का कोई स्रोत नही मिलता। 

देवी पार्वती वे अपने पति शिव जी के प्राणों की रक्षा के लिये जहां 40 हजार साल तक तप किया था। वहां सूखे पहाड़ों को चीरकर गंगा का एक स्रोत प्रकट हुआ। उसे भुवन कुण्ड कहते हैं। पार्वती माँ के तपस्थल का नाम भुवन है। इसी नाम पर पास का गांव है। मेरी कुटिया वहीं थी। 

क्षेत्र में पानी का दूसरा प्राकृतिक  स्रोत झिलमिल गुफा पर है। मान्यता है कि गुरु गोरखनाथ ने अपने सिद्ध मन्त्रों के परीक्षण से वहां सूखे पहाडों को भेदकर गंगा का स्रोत बना लिया। आज भी क्षेत्र में पीने वाले पानी के लिये इसी का सहारा है। इसे गुप्त गंगा कहा जाता है। वैज्ञानिक परीक्षण में इसका पानी भी भुवन कुण्ड की तरह गंगा का ही पानी मिलता है। जबकि ये दोनों ही जगहें गंगा की धारा से कई हजार फ़ीट की ऊंचाई पर है।

स्थितियों से लगता है कि पानी न होने के कारण पहले ये जगह निर्जन रही होगी। इसी कारण गुरु गोरखनाथ ने इसे मन्त्रों के परीक्षण के लिये चुना। मन्त्र परीक्षण के दौरान वे लंबे समय तक गुफा में रहे। वहां धूनी जलाई। गुफा में रहने वाले साधु सन्यासियों का कहना है कि जो धूनी अभी जल रही है। वह गुरु गोरखनाथ द्वारा जलाई धूनी ही है।

गुफा पहुंचकर मैंने उसी धूनी के समक्ष शिव सहस्त्र नाम का पुश्चरण किया। हालाँकि कुछ साधुओं ने मेरे धूनी के पास जाने पर एतराज़ किया। मगर मै नही माना। धूनी के पास जाकर बैठ गया। विरोध की परवाह किये बिना धूनी की अग्नि पर त्राटक करते हुए शिव सहस्त्र नाम का जाप शुरू कर दिया।

धूनी और गुफा की व्यवस्था साधुओं के हाथ में है। सामान्य भेष भूषा वाले व्यक्ति को धूनी के सामने बैठकर साधना करते देख साधुओं में हलचल सी मची थी। उनमें से कुछ ने खबर वहां के कर्ता धर्ता महंत साधू तक पहुंचाई। 

वे आये और मेरी तरफ देखकर मुस्करा पड़े। वे सिद्ध तांत्रिक थे।

मैंने उनकी तरफ ध्यान दिए बिना अपनी साधना जारी रखी। इस कारण उनके शिष्यों में असंतोष सा नजर आया। उन्हें लग रहा था कि उनके गुरु जो कि सिद्ध गुफा के उत्तराधिकारी हैं और सिद्ध तांत्रिक भी, मै उनका अपमान कर रहा हूँ। 

जबकि ऐसा नही था। बात बस इतनी थी कि मै किसी के भी लिये शिव सहस्त्र नाम जाप बीच में नही छोड़ सकता था। वे बाद में आये। जाप मैंने पहले शुरू कर दिया था। त्राटक के कारण मेरी आँखें खुली थीं। जिससे गलतफहमी हो रही थी कि मै देखकर अनदेखी कर रहा हूँ।

जाप पूरा हुआ तो मैंने महंत जी को अभिवादन किया। तब तक धूनी के पास कई साधू इकट्ठे हो गए थे। उनमें से कुछ ने मुझे सीख दे डाली, तुमको गुरु की जरूरत है।

मै मुस्करा दिया।

मन में कहा शिव से बड़ा कोई मिले तो बताना।

पता नही क्या सोचकर महंत जी ने मुझे धूनी के पास बैठे रहने को कहा। जिससे  साधु शांत हो गए। महंत जी ने साधुओं से कहा इनके लिये चाय लेकर आओ। अब साधू मेरे प्रति सामान्य दिख रहे थे। उनमें से दो जाकर चाय ले आये। 

मगर मैंने चाय नही पी, बल्कि आँखे बन्द करके पुनः साधना में खो गया। दोबारा पुश्चरण पूरा हुआ। आँखें खोलीं तो महंत जी को यज्ञ की तैयारी करते देखा। मै समझ गया कि वे तांत्रिक यज्ञ करने जा रहे हैं। क्योंकि यज्ञ सामग्री में घी के साथ सरसों का तेल भी मिला रहे थे। प्रायः ऐसे यज्ञ उच्च मारक क्षमता वाले तांत्रिक अनुष्ठान के तहत किये जाते हैं। 

चाय ठंठी हो चुकी थी। मैंने एक साधू से इशारा किया, तो वह चाय उठाकर बाहर फेंक आया। 

इसी बीच महंत जी ने धूनी की अग्नि में आहुतियां देते हुए अपना तांत्रिक यज्ञ शुरू कर दिया। 

शिव गुरु से सुरक्षा लेकर मैंने अपनी आँखे बंद कर लीं। और गहरे ध्यान में डूबता चला गया।

क्रमशः …।

… अब मै शिवप्रिया। 

आपके लिये गुरु जी द्वारा बताया आगे का वृतांत जल्दी ही लिखुंगी।

तब तक की राम राम।

शिव गुरु जी को प्रणाम।

गुरु जी को प्रणाम।

3 responses

  1. DR A. K MAURYA | Reply

    Guru gorakhnath jaise sidhdha guru ki dhuni par param guru shiv ke aradhak ko kotisha pranam.Apki is tapsya ko jankar hi jivan dhanya ho. Gaya.Ram Tam guruji.Har har mahadev shivlriya ji

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  2. DR A. K MAURYA | Reply

    Guru gorakhnath jaise sidhdha guru ki dhuni par param guru shiv ke aradhak ko kotisha pranam.Apki is tapsya ko jankar hi jivan dhanya ho. Gaya.Ram Tam guruji.Har har mahadev shivlriya ji.Gurudev mujhe to aapke saxat darshan hue hai

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  3. ram ram, very very eager to know more

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