जीवन की चौथी दुनियाः 24

शिव की दुनिया में प्रवेश

शिव की दुनिया में पहुंचोगी तो हर तरफ भारी सुरक्षा देखोगी। हर जगह कड़ी सुरक्षा पार करनी होगी। मै दिवंगत पत्नी प्रीति की सूक्ष्म चेतना को शिव धाम जाने की राह बता रहा था। वे ध्यान से सुन और समझ रही थीं। जल्दी ही उन्हें देवताओं की दुनिया से निकलकर शिव की दुनिया में प्रवेश करना था। जहां जाना देवताओं के लिये भी बहुत कठिन है। लगभग असम्भव जैसा। मगर समर्पित शिव भक्तों के लिये आसान है। क्योंकि उन्हें लेने शिव धाम के विमान खुद आ जाते हैं। आज मै प्रीति को वह विधान बताने वाला हूं, जिससे शिव धाम के विमान उन्हें लेने आयें। क्योंकि उनके बिना शिव की दुनिया में प्रीति का प्रवेश असम्भव होगा।

मरने से पहले प्रीति ने भगवान शिव को अपना गुरू बनाया था। उन्हीं से अपने सवालों के जवाब लिया करती थीं। कुछ सवाल मेरे साथ भी डिसकस करती थीं। मुझे पति के साथ अपना गुरू जैसा भी मानती थीं। बीती गुरू पूर्णिमा पर उन्होंने भगवान शिव को दोबारा गुरू धारण किया। तभी से गुरू (शिव) दर्शन का आग्रह करती रहीं। उनके आग्रह पर मैने शिव की उपलब्धता और स्थान पर चर्चा की। वे समझ रही थीं कि कैलाश पर्वत पर बसे शिव लोक जाने पर उनका काम हो जाएगा। चूंकि वे मन की गति से कहीं भी आ जा सकती हैं। इसलिये कैलाश में शिव के समक्ष पहुंचना उन्हें आसान लगा।

लेकिन कैलाश जाकर उनकी बात नही बनने वाली। कैलाश में सिर्फ कामकाजी लोगों की आवाजाही है। जो शिव के रुद्र स्वरूप के लिये काम करते हैं। शिव वहां रुद्र रूप में विराजमान हैं। मां भगवती उनके साथ रुद्रानी रूप में रहती हैं। रुद्र मतलब मानव कल्याण के लिये धारण किया गया शिव का एक रूप।

मानव कल्याण के लिये जहां मानव है वहां रहने की जरूरत पड़ी। धरती ही मानव के रहने का स्थान है। इसलिये शिव ने रुद्र रूप में कैलाश निवास का निर्णय लिया। यहां अपने कामकाजी लोगों को साथ रखा। आवाजाही की डिस्टरवेंस से बचाने के लिये कैलाश को बर्फ के पीछे छिपा लिया।

इसी तरह एक और कैलाश है। मैने प्रीति को बताया। वह यहां से 28 डाइमेंशन ऊपर है। वहां भगवान शिव महेश्वर स्वरूप में रहते हैं। मां भगवती महेश्वरी रूप में उनका साथ देती हैं। महेश्वर ने उस कैलाश को घनी उर्जाओं के पीछे छिपा रखा है। कारण वही कि गैर जरूरी आवाजाही न हो सके। महेश्वर मतलब महा ईश्वर। जो देवताओं के कल्याण के लिये धारण किया गया शिव का रूप है। उस कैलाश में भी कामकाजी लोग ही आते जाते हैं।

उससे भी ऊपर सत्य लोक (ब्रह्म लोक) और बैकुंठ लोक के पार 56 डाइमेंशन की ऊंचाई पर है शिव की दुनिया। शास्त्रों में इसे परम शिव धाम कहा गया है। शिव वहां सदाशिव रूप में रहते हैं। वहीं उनका स्थाई वास है। मां भगवती वहां आदि शक्ति के रूप में रहती हैं। असंख्य आकाश गंगाओं के बीच यह पहली दुनिया है। यहीं से दूसरी दुनियाओं की शुरूआत होती है। जो क्रमशः नीचे के आयामों में बनती चली गईं। पाताल लोक तक कुल 56 आयाम। हर आयाम में एक दुनिया, एक लोक।

शिव की दुनिया में जाना कोई सामान्य यात्रा नही है। वहां दो तरह से जाते हैं। एक ध्यान साधना के द्वारा। दूसरा बिना शरीर जीवात्मा के द्वारा। वे लोग जो शरीर में हैं। शिव की दुनिया में जाना चाहते हैं। उन्हें चेतना की यात्रा करनी होती है। उनके लिये शास्त्रों में विधान दिया गया है। मैने प्रीति को बताया। इसकी पात्रता के तौर पर साधक का शिव के प्रति सम्पूर्ण समर्पण अनिवार्य है।

सबसे पहले उन्हें विशेष विधि से ॐ नमः शिवाय मंत्र का पांच लाख जप करना होता है। सहस्त्र (एक हजार) रुद्राभिषेक पूरे करें। आवश्यकतानुसार रुद्राभिषेक कई बार दोहराने होते हैं। इसके साथ गहन ध्यान का अभ्यास करना होता है। इच्छाओं का त्याग करना होता है। सूक्ष्म चेतना का जागरण करना होता है। साथ ही कुछ भौतिक अभ्यास भी होते हैं। जिनमें जरूरत मंदों को भोजन कराना। उनकी सहायता करना। शिव भक्तों के साथ रहना। उनकी सेवा करना। शामिल है।

इन विधानों से साधक इच्छानुसार शरीर छोड़कर शिव धाम की तरफ चल पड़ता है। प्रीति की जीवात्मा मेरी बातों को बड़े ध्यान से सुन, समझ रही थीं। मैने आगे बताया। यह यात्रा मन की गति से होती है। ब्रह्म लोक, बैकुंठ लोक सहित तमाम लोकों को पार करती साधक की चेतना शिव धाम तक पहुंचती है। वहां सुरक्षा द्वारों को पार करना होता है। उसके बाद अंदर प्रवेश पर सब कुछ वैसा ही मिलता है जैसा मृत्यु के बाद वहां पहुंचे शिव भक्तों को दिखता है। मतलब यह कोई काल्पनिक यात्रा नही। दोनो ही विधियों से जाने वाले एक ही जगह पहुंचते हैं।

शिव की दुनिया में पहुंचने वाले दूसरे वे लोग होते हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है। जैसे कि तुम। मैने प्रीति से कहा। वे पूरा ध्यान लगाकर सब सुन, समझ रही थीं। जिनकी भक्ति पूरी तरह शिव को समर्पित होती है। उन्हें शिव धाम जाने का अधिकार मिलता है। अक्सर तो मरने के समय ही शिव दूत उन्हें अपने साथ ले लेते हैं। यमराज की दुनिया में नही जाने देते। विमान पर बैठाकर शिव धाम ले जाते हैं।

जहां अप्सरायें, परियां उनका स्वागत करती हैं। शिव धाम में प्रवेश का अधिकार पाने के लिये देवता उनका गुणगान करते हैं। मां आदि शक्ति उन्हें आशीर्वाद देती हैं। भगवान शिव मुस्कराकर उनकी भक्ति स्वीकार करते हैं।

फिर उन्हें किसी कल्पवृक्ष के नीचे आत्मा उत्थान की साधना के लिये बैठा दिया जाता है। मैने आगे बताया। शिव की दुनिया में भूख, प्यास, बीमारी, मृत्यु, दुख, तकलीफ, माया, मोह, गुस्सा, अहंकार, ईष्या, बदला, इच्छा आदि नही होती। जीवात्मा लम्बे समय तक एक ही मनः स्थिति में बैठी रहती है।

उसका उत्थान हो जाता है। उसके सभी कर्म बंधन पीछे छूट जाते हैं। क्योंकि शिव धाम की टाइम संरचना के मुताबिक जीवात्मा लाखों युग आगे निकल चुकी होती है। शिव धाम में जब एक पल बीतता है, तब तक तमाम ब्रह्मा जन्म लेकर मर चुके होते हैं। हर ब्रह्मा के साथ उनका लेखा जोखा भी मिट जाता है। इस तरह शिव धाम में जीवात्मा के कर्मों का हिसाब किताब खत्म हो जाता है। उसकी स्थिति ठीक उस समय की हो जाती है, जब परमात्मा ने अपने अंश के रूप में उसे खुद से अलग करके आत्मा बनाया था। ऐसे में आत्मा जीवन मरण के चक्र से अलग हो जाती है।

शिव पूछते हैं अब तुम्हें क्या चाहिये। अधिकांश आत्मायें वहीं रह जाना चाहती हैं। किन्तु ऐसा सम्भव नही। क्योंकि इससे वहां भारी जनसंख्या का असंतुलन उत्पन्न होगा। उन्हें सलाह दी जाती है या तो परमात्मा में विलीन होकर मोक्ष को प्राप्त कर लें। या शिव भक्ति से पूर्ण नया जन्म लें। उनमें ज्यादातर आत्मायें मोक्ष को अपनाती हैं। जो अगला जन्म लेना चाहती हैं उन्हें धरती पर बड़ी जिम्मेदारियां निभाने के लिये तैयार किया जाता है।

उसके बाद धरती पर उन्हें शिव के कर्म क्षेत्र कैलाश में भेजा जाता है। जिसे सामान्य भाषा में लोग शिव लोक कहते हैं। शिव लोक में उन आत्माओं को शिव कार्य हेतु तैयार किया जाता है। फिर वे जन्म लेते हैं। असंख्य ऋषि, मुनि, गुरू, साधु, संत, सिद्ध, साधक, वैज्ञानिक, नेता, अभिनेता, अध्यापक व अन्य जिम्मेदार इनमें से होते हैं। वे अपनी ही धुन में काम करते जाते हैं। सफलतायें उनमें दूर नही रहतीं। अध्यात्म उनके जीवन की नीव में होता है। चाल चरित्र कैसे भी हों। किन्तु एक चीज उनसे कभी नही छूटती। वह है लोगों की सेवा करना। उनकी सहायता करना।

मै तो दोबारा धरती पर लौटुंगी। देव संकल्प पूरा करुंगी। आपसे मिलुंगी। प्रीति ने मासूम बच्चे की तरह अपनी बात कही। आप मुझे वहां तक पहुंचने की राह बताइये। वहां पहुंचकर सुरक्षा द्वारों के पार जाने के तरीके बताइये। अगर मेरे लिये जरूरी है तो शिव धाम के विमान की यात्रा का विधान बताइये। कुछ भी करने के लिये तैयार हूं। इसी सावन मै वहां जाउंगी।
क्रमशः।


Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या