मरने वाले का अदृश्य शरीर हमारे आस पास

मरने वाले का वायवीय शरीर। अंतरीक्ष में रहता है। मन की गति से चलता है। अदृश्य होने के कारण छिपा रहता है। बुलाने पर आ जाता है। भेजने पर चला जाता है। कई बार पूछने पर जवाब भी देता है। इसका निर्माण मृत्यु की दूसरी दुनिया में होता है। जल तत्व, अग्नितत्व, वायु तत्व इसके प्रमुख तत्व हैं।
Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस बृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें। भावुक श्रद्धालु बातों को अपने दिल दिमाग में हावी न होने दें। यह सब परमात्मा की दुनिया की सामान्य व्यवस्था है, ऐसा सोचें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या
मृत्यु की दूसरी दुनिया। बहुत फास्ट। फुली सिस्टमैटिक। सब अपने काम में व्यस्त। युगों से हर काम मशीनी गति से चलता जा रहा है। कोई किसी का इंतजार नही करता। सब अपने काम में जुटे। न कोई किसी से मदद मांगता है। न कोई किसी की मदद करता है। ब्रह्मांड के नियम-कानून की अदृश्य दुनिया। जो मानते हैं उनके लिये मौजूद। जो नही मानते उनके लिये भी सक्रिय। वहां के कानून से कोई अछूता नही, कोई छिपा नही। जहां कर्म की उर्जायें करोड़ों साल तक खत्म नही होतीं। उसी के आधार पर मृतात्मा की गति तय होती है।
उसी दुनिया में होता है मृत आत्मा के वायवीय शरीर का निर्माण।
बहुत मजेदार बात यह है कि न दिखने वाली मृत्यु के पार की उस दुनिया में वायवीय शरीर का निर्माण इस दुनिया के लोग करते हैं। वे खुद अपने द्वारा बनाये जा रहे सूक्ष्म शरीर को देख नही पाते। न ही उससे सम्पर्क कर पाते हैं। बस वे यहां शास्त्रों में दिये ऋषि विज्ञान एवं देव विज्ञान का उपयोग करते चले जाते हैं। दूसरी तरफ उस दुनिया में जीवात्मा का वायवीय शरीर तैयार होता जाता है। वायवीय शरीर मतलब उर्जाओं से बना सूक्ष्म शरीर। प्लाज्मा जैसे तत्वों से बना होने के कारण यह सामान्य आंखों से नही दिखता। अदृश्य होने के कारण बनाने वाले लोग अपने बीच होने के बावजूद इसे देख नही पाते। देखने के लिये दिव्य दृष्टि चाहिये। बातें करने के लिये सक्षम उर्जा सम्पर्क चाहिये।
मै इन दिनों मृत्यु की दूसरी दुनिया में चली गई पत्नी प्रीति के वायवीय शरीर का निर्माण कर रहा हूं। इसके लिये 100 से अधिक तरह की उर्जाओं का उपयोग कर रहा हूं। जिसमें विभिन्न वस्तुओं, धरती, जल, अग्नि, वायु, अंतरीक्ष, वनस्पति, नदियों, ऋषियों, देव, वास्तु, ग्रह नक्षत्र, मंत्र, संकल्प, पशु-पक्षी और स्वयं की उर्जाओं का उपयोग है। इस विज्ञान का शास्त्रीय विधान है। इसके अतिरिक्त हम आभामंडल और उर्जा चक्रों सहित सभी प्रमुख शक्ति केंद्रों की रचना डाइरेक्ट विधि से कर रहे हैं।
पहले दिन सर का निर्माण हुआ। जिसके लिये सहस्रार चक्र की स्थापना हुई। उससे जुड़े सभी अंग बने। सिर, अवचेतन मन, कपाल, बाल सहित सभी अंग बने।
दूसरे दिन सूक्ष्म शरीर निर्माण की प्रक्रिया में उनके आज्ञा चक्र और उससे जुड़े सभी छोटे बड़े अंगों का निर्माण हुआ। आंख, नाक, कान, चेहरा, कंधे, बाहें और अन्य अंग बनें।
तीसरे दिन सूक्ष्म शरीर में अनाहत चक्र का शक्ति केंद्र स्थापित हुआ। उससे जुड़े हृदय सहित सभी अंगों का निर्माण हुआ। साथ ही छाती से नीभि के ऊपर तक के अंगों का निर्माण हुआ।
चौथे दिन नाभि से स्वाधिष्ठान चक्र तक के शक्ति केंद्रों की स्थापना हुई। उनसे जुड़े पीठ, पेट, कटि, गुप्तांग और अन्य अंग बनें। यहीं से कुंडलिनी के शक्ति केंद्र की स्थापना के संकेत सामने आये।
पांचवे दिन मूलाधार चक्र के केंद्र और उससे जुड़े अंगों का निर्माण हुआ। कमर, जांघें, घुटने, पैर, पंजे और अन्य अंगों का निर्माण हुआ।
छठे दिन उर्जा शरीर में सभी सूक्ष्म उर्जा केंद्रों का निर्माण हुआ। उनके द्वारा सभी नाजुक अंगों, मर्म स्थानों के अंग बने।
सातवें दिन उनकी उर्जा नाड़ियों का निर्माण हुआ। समस्त शरीर की उर्जा नाड़ियों के बनने से सूक्ष्मन शरीर जीवंत होने की स्थिति में पहुंचा। सक्रियता प्रखर होती गई।
आठवें दिन उनके मुख का निर्माण होगा। मुख के अंदर दांत, जीभ सभी अंग बनेंगे। उसी दिन रोम रोम में उर्जा प्रवाहित होगी। रोम रोम का निर्माण पूरा होगा।
नवें दिन उनके भीतर रज, वीर्य का निर्माण होगा। उसके द्वारा शक्ति का संचरण होगा। अन्य शक्ति दृव्य बनेंगे। जिससे सम्पूर्ण स्वरूप दिव्य कांति को प्राप्त करेंगा।
दसवें दिन तृप्ति-संतृप्ति के शक्ति केंद्र स्थपित होंगे। जिस तरह बच्चा पैदा होते ही भूखा होता है। उसे तुरंत दूध चाहिये होता है। उसी तरह दसवें दिन पूर्णता मिलते ही वायवीय शरीर को भोजन चाहिये होगा। वह दसवें और ग्यारहवें दिन खूब भोजन करता है। तेहरवीं में खुद भोजन करके और दूसरे लोगों को भोजन करके संतुष्ट होते देखता है तो उसे पूर्ण संतुष्टि मिलती है।
उसके बाद वायवीय शरीर कहां जाता है। कौन उस पर कब्जा करता है। क्या उसे मृत्यु की दूसरी दुनिया से बाहर निकलने की परमीशन होती है। क्या वह इस दुनिया में आ पाता है। क्या वह इस दुनिया में छूटे अपनों से मिल पाता है। क्या उसे इस दुनिया में छूटे लोगों में कोई दिलचस्पी बचती है। यह हम अपने अंक में जानेंगे। साथ ही जानेंगे कि उस दुनिया में वायवीय शरीर के निमाण की जरूरत क्यों होती है। उसके निर्माण के लिये किन किन चीजों की जरूरत होती है। निर्माण का विज्ञान क्या है। क्या इसे कोई भी कर सकता है।
साथ ही जानेंगे मृत्यु की दूसरी दुनिया कैसी है। वहां कौन लोग काम करते हैं। पूरा ब्रह्मांड उनवसे क्यों डरता है। वे कभी थकते क्यों नही। वे कभी रुकते क्यों नहीं। उस दुनिया को हम अपनी आंखों से देख क्यों नही पाते।
क्रमशः।
से तत्वों से बना होने के कारण यह सामान्य आंखों से नही दिखता। अदृश्य होने के कारण बनाने वाले लोग अपने बीच होने के बावजूद इसे देख नही पाते। देखने के लिये दिव्य दृष्टि चाहिये। बातें करने के लिये सक्षम उर्जा सम्पर्क चाहिये।
मै इन दिनों मृत्यु की दूसरी दुनिया में चली गई पत्नी प्रीति के वायवीय शरीर का निर्माण कर रहा हूं। इसके लिये 100 से अधिक तरह की उर्जाओं का उपयोग कर रहा हूं। जिसमें विभिन्न वस्तुओं, धरती, जल, अग्नि, वायु, अंतरीक्ष, वनस्पति, नदियों, ऋषियों, देव, वास्तु, ग्रह नक्षत्र, मंत्र, संकल्प, पशु-पक्षी और स्वयं की उर्जाओं का उपयोग है। इस विज्ञान का शास्त्रीय विधान है। इसके अतिरिक्त हम आभामंडल और उर्जा चक्रों सहित सभी प्रमुख शक्ति केंद्रों की रचना डाइरेक्ट विधि से कर रहे हैं।
पहले दिन सर का निर्माण हुआ। जिसके लिये सहस्रार चक्र की स्थापना हुई। उससे जुड़े सभी अंग बने। सिर, अवचेतन मन, कपाल, बाल सहित सभी अंग बने।
दूसरे दिन सूक्ष्म शरीर निर्माण की प्रक्रिया में उनके आज्ञा चक्र और उससे जुड़े सभी छोटे बड़े अंगों का निर्माण हुआ। आंख, नाक, कान, चेहरा, कंधे, बाहें और अन्य अंग बनें।
तीसरे दिन सूक्ष्म शरीर में अनाहत चक्र का शक्ति केंद्र स्थापित हुआ। उससे जुड़े हृदय सहित सभी अंगों का निर्माण हुआ। साथ ही छाती से नीभि के ऊपर तक के अंगों का निर्माण हुआ।
चौथे दिन नाभि से स्वाधिष्ठान चक्र तक के शक्ति केंद्रों की स्थापना हुई। उनसे जुड़े पीठ, पेट, कटि, गुप्तांग और अन्य अंग बनें। यहीं से कुंडलिनी के शक्ति केंद्र की स्थापना के संकेत सामने आये।
पांचवे दिन मूलाधार चक्र के केंद्र और उससे जुड़े अंगों का निर्माण हुआ। कमर, जांघें, घुटने, पैर, पंजे और अन्य अंगों का निर्माण हुआ।
छठे दिन उर्जा शरीर में सभी सूक्ष्म उर्जा केंद्रों का निर्माण हुआ। उनके द्वारा सभी नाजुक अंगों, मर्म स्थानों के अंग बने।
सातवें दिन उनकी उर्जा नाड़ियों का निर्माण हुआ। समस्त शरीर की उर्जा नाड़ियों के बनने से सूक्ष्मन शरीर जीवंत होने की स्थिति में पहुंचा। सक्रियता प्रखर होती गई।
आठवें दिन उनके मुख का निर्माण होगा। मुख के अंदर दांत, जीभ सभी अंग बनेंगे। उसी दिन रोम रोम में उर्जा प्रवाहित होगी। रोम रोम का निर्माण पूरा होगा।
नवें दिन उनके भीतर रज, वीर्य का निर्माण होगा। उसके द्वारा शक्ति का संचरण होगा। अन्य शक्ति दृव्य बनेंगे। जिससे सम्पूर्ण स्वरूप दिव्य कांति को प्राप्त करेंगा।
दसवें दिन तृप्ति-संतृप्ति के शक्ति केंद्र स्थपित होंगे। जिस तरह बच्चा पैदा होते ही भूखा होता है। उसे तुरंत दूध चाहिये होता है। उसी तरह दसवें दिन पूर्णता मिलते ही वायवीय शरीर को भोजन चाहिये होगा। वह दसवें और ग्यारहवें दिन खूब भोजन करता है। तेहरवीं में खुद भोजन करके और दूसरे लोगों को भोजन करके संतुष्ट होते देखता है तो उसे पूर्ण संतुष्टि मिलती है।
उसके बाद वायवीय शरीर कहां जाता है। कौन उस पर कब्जा करता है। क्या उसे मृत्यु की दूसरी दुनिया से बाहर निकलने की परमीशन होती है। क्या वह इस दुनिया में आ पाता है। क्या वह इस दुनिया में छूटे अपनों से मिल पाता है। क्या उसे इस दुनिया में छूटे लोगों में कोई दिलचस्पी बचती है। यह हम अपने अंक में जानेंगे। साथ ही जानेंगे कि उस दुनिया में वायवीय शरीर के निमाण की जरूरत क्यों होती है। उसके निर्माण के लिये किन किन चीजों की जरूरत होती है। निर्माण का विज्ञान क्या है। क्या इसे कोई भी कर सकता है।
साथ ही जानेंगे मृत्यु की दूसरी दुनिया कैसी है। वहां कौन लोग काम करते हैं। पूरा ब्रह्मांड उनवसे क्यों डरता है। वे कभी थकते क्यों नही। वे कभी रुकते क्यों नहीं। उस दुनिया को हम अपनी आंखों से देख क्यों नही पाते।
क्रमशः।