सुनसान के साधक…2

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सुनसान के साधक…2
भैरवी के साधक से हुई भेंट

सभी अपनों को राम राम।
【कुछ साधकों ने सुनसान पहाड़ी जंगलों में साधनाएं कैसे होती हैं? वहां के साधक कैसे होते हैं? उन्हें किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है? इस बारे में जानने का अनुरोध किया है।
छोटे से दिखने वाले इन सवालों के जवाब बहुत बड़े हैं। इसलिये हिमालय साधना के दौरान मणिकूट की पहाड़ियों में मिल रहे कुछ खास साधकों के साथ बीते लम्हों का जिक्र कर रहा हूँ। साथ ही यहां पूर्व में सिद्ध हुए साधकों के वृतांत भी बताता चलुंगा। इससे उक्त सवालों के जवाब मिलने की संभावना है।】
वह साधना का दूसरा दिन था। खड़ी साधना के तहत 4 घण्टे तक मुझे न बैठना था, न लेटना। इसलिये पहाड़ों के जंगलों में घूमते हुए जप कर रहा था। मन्त्र जपता हुआ मणिकूट पर्वत के जंगलों में लगभग 3 किलोमीटर तक अंदर चला गया।
रोज की तरह हाथ में बेंत का डंडा था। जो राह में आने वाली झाड़ियों के बीच रास्ता बनाने में कारगर होता है। कई बार राह में आ गए सांपों को खिसकाकर रास्ते से हटाने में डंडा बड़ा मददगार साबित होता है। ऊंचाइयां चढ़ते समय शरीर के बोझ को बांटने में सहायक होता है। अचानक कोई जंगली जानवर सामने आ जाये तो उन्हें धमकाने के लिये डंडा साथ होना ही चाहिये।
रास्ते लगातार ऊंचे होते जा रहे थे।
एक जगह पत्थर की शिला पर कोई बैठा दिखा। शिला पगडंडी से अलग थी। वहां जाने के लिये घनी झाड़ियों से होकर गुजरना था।
मै उधर जाने की बजाय सीधा चलता गया।
परन्तु वह व्यक्ति मुझे अघोषित रूप से आकर्षित कर रहे थे। काफी आगे चले जाने के बाद भी मन में उनके ही विचार चलते रहे। इस कारण मन्त्र जप की एकाग्रता प्रभावित हुई।
यह ठीक नही।
मैने अपने आप से कहा। मन्त्र भगवान का जप रहा हूँ और सोच रहा हूँ किसी और के बारे में। इस चैप्टर को बंद करके ही आगे बढ़ना ठीक रहेगा।
ऐसा विचार करके मै वापस मुड़ गया।
वे अभी वहीं थे।
उन तक पहुंचने के लिये काफी संघर्ष करना पड़ा झाड़ियों में उलझता, डंडे से रास्ता बनाता शिला तक पहुंचा।
पास पहुंचा तो अचरज वाला दृश्य था।
उनके पूरे शरीर पर तितलियां बैठी थीं। इतनी कि उन्हें गिना न जा सके। अधिक अचरज इस बात का था कि उतनी तितलियां आसपास के पेड़ों पर भी न थीं। पालतू जीवों की तरह उनके हाथ पैर कन्धें पेट पीठ सिर चेहरे यहां तक कि कानों और भौहों पर भी उड़ उड़कर बैठ रही थीं।
वे आंखे बंद किये बैठे थे।
उम्र 50 से कम , साधारण व्यक्तित्व, सांवला रंग, बढ़े हुए दाढ़ी बाल, पीला कुर्ता, सफेद पैजामा। देखने में ऐसा कुछ भी न था, जिससे आकर्षण उत्पन्न हो। फिर भी मै खिंचा चला गया।
यूं तो मै सावन की मौन साधना में चल रहा था। फिर भी तय किया था निर्जन जंगलों में जरूरत पड़ी तो बोल लूंगा।
मैने राम राम करके उन्हें संबोधित किया।
कोई जवाब नहीं।
उनकी आंखें बंद रहीं।
कई बार का सम्बोधन बेकार गया।
कुछ मिनट यूं ही गए।
उस बीच तितलियां उनके ऊपर हठखेलियाँ करती रहीं।
फिर आंखें खुलीं।
मुझे देखा। मगर गुमसुम।
न आंखों में कोई भाव न चेहरे पर।
मेरे हाथ में पानी की बोतल थी। उनकी तरफ बढ़ा दिया। पानी पीकर बोतल वापस कर दी। किंतु स्थिति भाव हीन बनी रही। उनके ऊपर तितलियां बैठी हैं, इस तरफ भी ध्यान नही।
एक बार तो ऐसा लगा जैसे किसी गहरे नशे के प्रभाव में हैं।
मगर वह नशा नही था।
मेरे कई सवाल अनुत्तरित रहे।
परन्तु इतना समझ में आ चुका था कि वे किसी शक्ति के प्रभाव में हैं।
कुछ देर मुझे देखते रहे। उनकी आंख से आंसू टपक पड़ा।
यानि कि वे कुछ कहना चाह रहे थे मगर कह नही पा रहे थे। मैने पानी की बोतल फिर से उन्हें पकड़ा दी। इस बार वे पूरा पानी पी गए।
इस बीच तितलियां न तो खुद विचलित हुईं और न ही उन्होंने तितलियों को अपने ऊपर से हटाने की कोशिश की।
मुझे बैठने का इशारा किया।
मैने अपनी खड़ी साधना के बारे में बताकर न बैठने की असमर्थता जता दी। वे बैठे रहे।
साधकों की एनर्जी को बिना उनकी सहमति के नही छूना चाहिये। परंतु मुझे लगा कि उन्हें आध्यात्मिक सहयोग की आवश्यकता है। इसलिये बिना बताए उनकी एनर्जी को चेक कर लिया। सिद्धि की एनर्जी मिली। ऐसी सिद्धि जिसमें इष्ट देवी उनके साथ आ गयी थीं। किंतु वे उनसे जुड़ नही पा रहे थे।
मैने उनसे पूछा कोई देवी सिद्धि की है आपने?
उन्होंने आश्चर्य के साथ मेरी तरफ देखा।
उनके कंधे पर खादी का झोला लटका था। उसमें से कागज पेन निकाला और एक मन्त्र लिखकर दिया।
भैरवी सिद्धि का मन्त्र था वह।
यानि कि उन्हें भैरवी सिद्ध हो गईं थीं।
किंतु वे उनसे सम्बद्ध नही हो पा रहे थे।
देवी भैरवी की ऊर्जाओं तले उनकी ऊर्जाएं दब गयी थीं। इस कारण वे अपने आप में खो से गए थे।
मैने कहा आपको तत्काल अपने गुरु से संपर्क स्थापित करना चाहिये, अन्यथा अनर्थ हो जाएगा।
उनकी आंखों से फिर आंसू टपके।
जैसे वे बेबस हों।
लिखकर बताया उनके गुरु ने 2 बरस पहले अपना शरीर छोड़ दिया। उन्होंने 12 बरस पहले यह मन्त्र जपने को दिया था। तबसे जप रहा हूँ। साल भर से जहां जाता हूँ तितलियां आकर मेरे ऊपर बैठने लगती हैं।
गुरुदेव ने साधना शुरू करने से पहले बताया था कि जब सिद्धि मिलेगी तब तितलियां तुम्हारी तरफ आकर्षित होने लगेंगी।
अब गुरुदेव शरीर में नही हैं। समझ नही आ रहा क्या करूँ कहां जाऊं? बैठे बैठे होश खो देता हूं। दिन दिन भर अकेला बैठा रहता हूँ, मन्त्र मन में अपने आप चलता रहता है। मुझे खुद ही लगता है कि शायद मै पागल हो गया हूँ। दिमाग काम नही करता। बोलना चाहता हूं तो ठीक से ज़बान नही चलती। जैसे किसी ने उस पर सवारी कर रखी हो।
बहुत विनती की तो गुरुदेव ने स्वप्न में आकर कहा कि मणिकूट पर्वत पर भ्रमण करूँ। भगवान शिव कृपा करेंगे। वहीं रास्ता मिल जाएगा। एक साल से मै यहीं भटक रहा हूँ। बहुत बार तो रात में भी यहीं पड़ा रहता हूँ।
उनकी ऊर्जाओं में भैरवी की शक्तिशाली ऊर्जाएं भरी पड़ी थीं।
मैने कभी भैरवी सिद्धि नही की।
किंतु एक सिद्ध संत ने मुझे देवी भैरवी की शक्तियों के उपयोग का तरीका बताया था।
मैंने वही तरीका उन्हें बता दिया।
साथ ही उनके विशुद्धि चक्र, मूलाधार चक्र और कुण्डलिनी चक्र को उर्जित करके सक्रिय किया।
वे व्यक्तित्व में लौट आये।
बोलकर बात करने लगे। मेरी खड़ी साधना के 2 घण्टे शेष थे।
उस बीच मै उनके साथ बना रहा।
मै अपनी साधना करता रहा। वे मेरे बताए तरीके से अपने सिद्ध मन्त्र का उपयोग करने लगे।
लगभग डेढ़ घण्टे बाद तितलियां उनके ऊपर से उड़ने लगीं। वे लगातार कम होती जा रही थीं।
2 घण्टे बीतते बीतते उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई। जैसे उन्होंने पा लिया हो।
अपनी सिद्धि का रहस्य सुलझा लिया हो।
मै चलने को हुआ तो भावुक हो गए। बोले मुझे आपसे दोबारा मिलते का इंतजार रहेगा।
मुझे पता था अब वे बहुत बड़ी शक्ति के मालिक हैं।
मैने पुनः अपना मौन धारण कर लिया।
वापस लौट पड़ा।
आगे मै आपको मणिकूट क्षेत्र के एक ऐसे साधक के बारे में बताऊंगा जो अपनी सिद्धि से गंगाजल को घी बनाने में सक्षम थे।
क्रमशः
शिव शरणं!

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