गायंत्री मंत्र जापः क्या करें क्या न करें

धन की कामना से इसका जाप कभी न करें.


20228268_446578499062237_5713163023740171085_nसभी को राम राम
गायत्री मंत्र जाप करने से ईश्वर की प्राप्ति होती है। ये दो वेदों के संगम से निर्मित है. यजुर्वेद के मंत्र *ॐ भूर्भुवः स्वः* और ऋग्वेद के *तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्* (छंद 3.62.10) को जोड़कर बना है. मंत्र में सवित्र (सूर्य) देव की उपासना है, इसलिए इसे सावित्री मंत्र भी कहा जाता है। यह बहुत तेजी से काम करता है. सदुपयोग हो तो तीब्र स्रजन, दुरुपयोग हो तो तीखा विनाश.
पूर्व काल में कई बार ऋषियों ने पाया कि अनाड़ी साधकों द्वारा गायत्री मंत्र का जाप करने से मानसिक अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो रही है. इसके दुरुपयोग से पीढ़ियां बिगड़ने लगीं. तो उन्हें कठोर कदम उठाने पड़े. उन्होंने गायत्री मंत्र को श्रापित (प्रभावहीन) कर दिया.
गायत्री मंत्र के रचनाकार ऋषि खुद विश्वामित्र ने भी ऐसे ही कारणों से इसको श्रापित किया. दुनिया रचने वाले ब्रह्मा जी ने भी इसे श्रापित किया. ऋषि वशिष्ठ ने भी गायत्री मंत्र को श्रापित किया. कुछ विद्वानों का मत है कि शुक्राचार्य ने भी इस मंत्र को श्रापित किया.
इन्हीं वजहों से हमने भी गायत्री मंत्र जाप को लेकर चर्चा शुरू की. ताकि साधक खुद को गायत्री मंत्र श्राप का शिकार होने से बचा सकें.
इसकी साधना में कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिये.

1. निर्धारित छंद *लय* में किया गया गायत्री मंत्र जप साधक को लाखों में एक बना देता है.
गायत्री मंत्र का जाप आत्मशोधन, ज्ञान और आत्मजागृति के लिये ही किया जाना चाहिये.
2 . जिस तरह महामृत्युंजय मंत्र का जाप धन की कामना से नही किया जाना चाहिये.
3. उसी तरह गायत्री मंत्र का जाप धन प्राप्ति के लिये कभी नही करना चाहिये. धन की कामना प्रायः आत्मशोधन की मूल भावना के विपरीत होती है. इसलिये धन के इच्छुक लोगों को अक्सर विपरीत परीणाम मिलते हैं.
किसी भी मंत्र की कामना और साधक की कामना में भेद हो तो परिणाम बिगड़ ही जाते हैं. गायत्री मंत्र में निहित कामना आत्मशोधन की प्रेरणा (प्रचोदयात्) की है.
*वास्तव में गायत्री मंत्र की साधना खुद को तपाकर निखारने की साधना है न कि सुविधाभोगी होने की*.
इसीलिये पूर्व में गायत्री साधक जनेऊधारी ब्राह्मणों को भिक्षा यापन करना होता था. भिक्षा यापन से उन्हें धन की आवश्यकता नही पड़ती थी, दूसरे इससे उनका अहंकार मिटता था.
गायत्री साधक का अहंकार उसके जीवन में प्रलय पैदा करता है. आज भी यगोपवीत संस्कार के मौके पर गायत्री धारण करते ही ब्राह्मण को भिक्षा मांगने की औपचारिकता निभानी होती थी.
4. सदैव शांत मन से ही गायत्री मंत्र का जाप करें. शांत मन से किया गया जाप चमत्कारिक परिणाम देता है. मन खराब हो तो इसका जाप बिल्कुल न करें. अन्यथा अस्थिरता और दूसरों को नीचा दिखाने की भावना उत्पन्न होती है.
5. गायत्री मंत्र जाप से 6 घंटे पहले और 6 घंटे बाद तक गुस्सा, आलोचना या कुतर्क बिल्कुल न करें. अन्यथा अहंकार बढ़कर बेकाबू हो जाता है.
6. उद्देश्य प्राप्ति के लिये गायत्री मंत्र का जाप बिना रुकावट हर दिन होना चाहिये. अन्यथा शरीर की शक्तियों (उर्जाओं) में भारी उतार चढ़ाव होता है. फलस्वरूप मानसिक और शारीरिक बीमारियां पनपती हैं.
इसी कारण महिलाओं को इससे अलग रहने की सलाह दी जाती है. क्योंकि हर महीने माहवारी के दिनों में उन्हें मंत्र जाप रोक देना होता है. यह सलाह महिलाओं और उनके परिवार की सुरक्षा के लिये दी जाती है. अन्यथा उन्हें बार बार अपमान का सामना करना पड़ता है. जिससे वे चिड़चिड़ेपन का शिकार होती हैं.
7. गायत्री मंत्र जाप बच्चों और युवाओं के लिये बहुत हितकारी होता है.
8. गायत्री मंत्र जाप के लिये सक्षम गुरू ही धारण करें. उनके बताये नियमों का सदैव पालन करें.

शिव गुरू को प्रणाम
मां गायत्री को प्रणाम
सूर्य भगवान को प्रणाम
गुरुदेव को नमन
…. टीम मृत्युंजय योग

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