क्यों कलह का शिकार होते हैं गायत्री मंत्र के साधक-1

जल्दबाजी में किया जाप रिश्ते तबाह कर देता है


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ग्रुप में इन दिनों गायत्री महामंत्र के प्रभाव पर चर्चा हो रही है. गुरु जी कहते हैं कि गायत्री मंत्र बड़ी उर्जाओं का भंडार है. नियमों का पालन करते हुए इसकी साधना की जाये तो व्यक्ति ब्रह्मांड के शक्तिशाली लोगों में से एक बन सकता है. नियमो की अनदेखी हो तो साधक दूसरों की खुशियों की भी तबाही का कारण बन जाता है.
कुछ लोग तर्क देते हैं कि कोई भी मां अपने बच्चों को तकलीफ नही दे सकती. इसलिये गायत्री मां भी गायत्री मंत्र का जाप करने वालों को कष्ट नही देतीं.
यहां दो बातें याद रखने की जरूरत है. कोई भी मां भक्ति के नाम पर नियम तोड़ने या शक्तियों से खिलवाड़ की इजाजत नही देती.
गुरू जी बताते हैं कि गायत्री मंत्र के साथ खिलवाड़ का मतलब है जिंदगी के साथ खिलवाड़. वैसे ही जैसे आग के साथ खिलवाड़. नियमों की अनदेखी मंत्र के साथ खिलवाड़ होता है.
गायत्री मंत्र से प्राप्त उर्जायें तादाद में बहुत अधिक होती हैं. इसीलिये उनमें मिलावट हो तो तबाही भी बहुत होती हैं. मिलावट नियमों की अनदेखी से होती है. गायत्री मंत्र के साधक को स्वेच्छाचारी कदापि नही होना चाहिये. अन्यथा वे अपने जीवन को तबाह कर डालेंगे. साथ ही उन सबके जीवन में उथल पुथल पैदा कर देंगे जो उनके करीबी हैं.

मृत्युंजय योग के सर्वे के मुताबिक 96 प्रतिशत से अधिक गायत्री साधक स्वेच्छाचारी ही होते हैं. खासतौर से वे साधक जो गायत्री परिवार से जुड़े हैं. जबकि उनके गुरू प्रकांड विद्वान और युग ऋषि पं श्री राम शर्मा ने इस मामले में अपने लोगों को स्वेच्छाचारी न होने की प्रबल हिदायत दे रखी है.
स्वेच्छाचारी का मतलब है मंत्र जाप में मनमानी करना.
आगे हम प्रमाणित कर रहे लोग कैसे मनमानी करते हैं. शायद इसका कारण उनकी अज्ञानता है.
हर मंत्र को जपने की एक लय होती है. उसी के मुताबिक मंत्र जाप से उर्जा की तरंगे निकलकर साधक का उद्देश्य पूरा करती हैं. ये लय मंत्र के उच्चारण का तरीका तय करती है. इसे मंत्र की छंद कहा जाता है. तय छंद के मुताबिक मंत्र का जाप किया जाये तो ही उसका फल मिलता है. अन्यथा मिलावटी उर्जायें उत्पन्न होकर अर्थ का अनर्थ कर डालती हैं.
निर्धारित छंद के मुताबिक मंत्र जपा जाये तो हर मंत्र का जाप निश्चित समय में पूरा होता है. किसी मंत्र के जाप में निर्धारित से कम या ज्यादा टाइम लगे तो वो स्वेच्छाचारी जाप होता है. उसके परिणाम हमेशा परेशानी पैदा करने वाले ही होते हैं. ठीक उसी तरह जैसे हमारे देश के राष्ट्रीय गान जन-गन-मन…को तय लय में किया जाये तो उसमें 52 सेकेंड लगते है. यदि इससे कम या ज्यादा टाइम लगे तो उस लय में किये गये राष्ट्रीय गान को दोष पूर्ण माना जाता है. इस तरह का गान करने वालों को सजा का भी प्रावधान है.
गायंत्री मंत्र की छंद भी गायत्री है. इस छंद की लय में जाप हो तो एक गायत्री मंत्र में लगभग 12 से 14 सेकेंड लगने चाहिये. इस तरह एक माला अर्थात् 108 मंत्र जाप में 23 मिनट से अधिक लगने चाहिये. एक घंटे में 3 माला से कम ही जपे जा सकते हैं.
मगर गायत्री के अधिकांश साधक इसके विपरीत जल्दबाजी और हड़बड़ी में जाप करते हैं. कुछ नियमित साधकों ने दावा किया कि वे 1 घंटे में 11 से 12 माला तक जाप कर लेते हैं.
शायद इसका कारण उनकी अज्ञानता है. उन्हें मंत्र जाप के अनिवार्य नियम भी नही बताये गये. एेसे अधिकांश लोगों ने पूछने पर बताया कि दीक्षा के समय उन्हें सिर्फ कितने माला मंत्र जाप करना है इतना ही बताया गया. उसे किस लय में करना है ये नही बताया गया.
ये तरीका गलत है. इससे विनाशकारी मिलावटी उर्जायें उत्पन्न होती हैं. जो साधक के मणिपुर चक्र व अग्नितत्व का संतुलन बिगाड़ देती हैं.
परिणाम स्वरूप साधक क्रोधी होने लगते हैं. उन्हें बात दर्दास्त नही होती. जिससे वे उत्तेजना भरे लहजे में बात करते हैं, बातों की मिठास खत्म हो जाती है. निकट सम्बंधी उनके द्वारा बार बार हर्ट किये जाते हैं. खासतौर से एेसे साधक अपने जीवनसाथी के प्रति बहुत असामान्य व्यवहार करते देखे गये हैं. हमेशा शिकायतें और दोषारोपण की कोशिश करते हैं.
अंततः उनके रिश्ते बिगड़ने लगते हैं. परिवार की शांति बिखर जाती है. हर समय कलह की स्थितियां बनती रहती हैं. क्योंकि ऐसी उर्जायें साधक को अपनी गल्ती मानने से रोकती हैं. कब ईगो के शिकार हो गये, उन्हें पता भी नही चलता. इन सबसे घर के दूसरे लोगों का भी मन खराब रहता है. खराब मन सदैव उन्नति रोक देता है. कई तरह की लाइलाज बीमारियों का कारण भी बनता है.
जो साधक निर्धारित छंद के अनुरूप गायत्री मंत्र का जाप करते हैं, देव शक्तियां हर पल उनके साथ रहती हैं.
मंत्र जाप के अन्य नियमों पर आगे चर्चा करेंगे.
क्रमशः….।
शिव गुरू को प्रणाम
मां गायत्री को प्रणाम
गुरुदेव को नमन
सत्य ही शिव हैं. शिव तो सत्य हैं ही…. टीम मृत्युंजय योग

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