गुरुदेव की हिमालय साधना-6

18 जून 17
गुरुदेव की हिमालय साधना का तीसरा दिन- श्मशान के संतो के साथ


19225500_430851757301578_4785068458805877447_n.jpgप्रणाम मै शिवांशु
आज गुरुदेव की मौन साधना का तीसरा दिन था।
कल वे मौन ही थे, सो आपके साथ मेरा “शेयर” भी मौन रहा। दरअसल मुझे उनकी साधना की गतिविधियों की जानकारी ही न मिल सकी।
मै ऋषिकेश में था। वहां से गुरुवर से मिलने हरिद्वार आया भी। मगर जैसा मैंने पहले बताया मौन साधना के दौरान उन्हें ढूंढ पाना बहुत मुश्किल होता है।
उनका मोबाइल बंद, कमरा बन्द, वाट्सअप बन्द। घण्टों गंगा जी के घाटों पर ढूंढा। नही मिले।
हम लौट गए।
आज भी सुबह से कमरे पर नही थे। लेकिन तीसरे दिन की साधना का एक अंश शमशान के संतो के साथ बीतेगा ये मुझे पता था। इसलिये आश्रम में इंतजार करने की बजाय गंगा किनारे के शमशान तलासने लगा।
पास वाले शमशान गया।
गुरुवर अघोरी साधुओं की एक टोली में बैठे मिले।
इस बीच बताता चलूँ कि मौन साधना के दौरान वे लगभग 20 किलोमीटर रोज पैदल चल रहे हैं। उनका भ्रमण गंगा किनारे ही होता है।
बात चली है तो गुरुवर की इस साधना की दिनचर्या भी जान लेते हैं।
दिन की साधना-
रोज 8 घण्टे
रात की साधना-
रोज 4 घण्टे
पैदल चलना-
रोज 20 किमी से ज्यादा, अधिकांशतः धुप में।
सोना-
4 घण्टे
खाना-
भोजन नही करते।
उसकी जगह रोज 1 सेव, 2 छुहारा, 4 बादाम, 1 चाय।
दूध की वहां उपलब्धता नही है।
3 दिन का उनका खर्च-
3 चाय पी उनका 30 रूपये
700 रु. भिखारियों को बाँटें
सेव,बादाम,छुहारा पहले से रख दिया गया था।
बातें-
मौन।
चलते फिरते किसी ने कुछ कहा या पूछा तो “राम राम” कह कर काम चला लेते हैं।
अपनी बात-
पिछले 3 दिनों में अपनी बात कहने के लिये उन्हें किसी से न तो कोई इशारा करने की जरूरत पड़ी और न ही कुछ लिखकर देने की जरूरत पड़ी।
मतलब ये की उन्होंने अपनी जरूरतें शून्य सी कर रखी हैं।
सेवादार-
विशाल उपलब्धता और मौन के बावजूद अपनी सेवा में किसी को नही रखा है। न किसी काम के लिये न ही किसी बात को दूसरों तक पहुँचाने के लिये।
मैंने कोशिश की थी साथ रहूँ या किसी अन्य को साथ रख दूँ, मगर ठुकरा दिया।
सफाई-
अपने कपड़े खुद धोते हैं। कमरे की सफाई भी खुद करते है।
संपर्क-
17 जून को अपनी शादी की सालगिरह पर गुरु माँ को सुभकामना सन्देश और आशीर्वाद दिया।

ऐसे चल है गुरुवर की साधना।
तीसरे दिन उन्हें ढ़ुढ़ते हम श्मशान पहुंचे।
वे अघोरी साधुओं की टोली में बैठे थे। कुछ साधू चिलम पी रहे थे, कुछ बीड़ी।
गुरुवर बस बैठे थे।
हमें देखकर वे मुस्कराये और अलग एक पेड़ के नीचे बैठने का इशारा किया।
हम वहां जाकर बैठ गए।
जलती चिताओं की गन्ध वातावरण में नशे की तरह फैली थी।
श्मशान साधनाएं करने वालों को जलते मांस की ये गन्ध नशे जैसी लगती है।
ये गन्ध उन्हें साधनाओं की गहराई में उतारती चली जाती है। इसके प्रभाव में वे भूल जाते हैं उनके पास कोई शरीर भी है।
वे खुद को शरीर से अलग देखने लगते हैं।
वे अपने शरीर को चिताओं में रखे जा रहे शरीरों जैसा ही मानने लगते हैं।
सही मायने में उन्हें अपने शरीर और उसके रिश्तों से मोह भंग हो जाता है।
शमशान के कई साधक खुद के शरीर से बिलकुल मोह नही करते। शरीर में पीड़ा हो तो वे उसके प्रति और कठोर हो जाते हैं।
अघोरी साधू शरीर से मोह को बन्धन जैसा मानते हैं। डॉक्टर के पास जाना पड़े तो वे इसे पापों का फल कहते हैं।
हम दूर पेड़ की छाँव में बैठकर गुरुदेव और साधुओं को देख रहे थे।
2 अघोरी साधू उनसे कुछ बातें कर रहे थे।
गुरुदेव उन्हें ध्यान से सुन रहे थे। कभी कभार हाँ या न में सिर हिला देते। मगर साधुओं की बातें देखकर कोई नही कह सकता था कि वे एक मौन व्यक्ति से बातें कर रहे हैं।
बीच में एक अघोरी साधू ने अपनी झोली से निकाल कर गुरुदेव को कुछ वस्तुवें दीं।
दूर होने के कारण मै उन वस्तुओं को देख न सका। गुरुवर ने सम्मान सहित उन वस्तुओं को अपनी टी शर्ट की जेब में रख लिया।
हम गुरुवर और अघोरी साधुओं की मुलाकात पूरी होने का इंतजार करने लगे।
सत्यम शिवम् सुंदरम
शिव गुरु को प्रणाम
गुरुवर को नमन

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