गुरुदेव की हिमालय साधना-1

साधना का उतावलापनः जान जाने का खतरा


18698522_421223064931114_6666984007569405850_n.jpgप्रणाम मै शिवांशु
मै अब स्वस्थ हुआ. पिछली हिमालय साधना के अंतिम दौर में बर्फीली ठंड ने मुझे हरा दिया. मेरे हाथों पैरौं में गलन शुरू हो गई थी. उंगलियों में सड़न पैदा हो गई. मै बीमार हो गया.
गुरुवर को खबर मिली तो उन्होंने वापस लौटने का आदेश दिया.
मै लौट आया.
5 माह से मै इलाज करा रहा था.
अब दोबारा पहाड़ों की बर्फ से टकराने लायक हो गया हूं.
पिछली बार अति उत्साह में मुझसे कई गलतियां हुईं. प्रकृति गलतियों के लिये माफ नही करती. किसी के लिये बदलती भी नही. मेरे मन में विचार था कि मै उच्च साधनायें कर रहा हूं. प्रकृति की दुशवारियां मेरा कुछ न बिगाड़ पाएंगी.
मेरी सोच गलत थी.
साधना मै कर रहा था, मेरा शरीर नही.
प्रकृति की मार शरीर पर हुई. मै शरीर में था. सो मैै भी मारा गया.
मुश्किल हालातों में जब शरीर ने साथ देने से इंकार कर दिया, तब होश आया कि मैने गुरुदेव से मिली कई चेतावनियों को भुला दिया था. शायद ये एक साधक का अहम था. जिसे बीमार होकर शरीर ने तोड़ दिया.
पहाड़ों में साधनाओं के दौरान हर पल लगता था कि शिव गुरु मेरे साथ हैं. गुरुवर की उर्जाओं से हर पल जुड़ा हूं.
इस अहसास ने मुझे दबंग साधक बना दिया था.
नेचर के प्रति इसी दबंगई में मुझसे गलती हो गई. मै बर्फ की गुफा में साधना करने पहुंच गया.
गुरुवर ने उस गुफा से 1 किलोमीटर पहले ही रुक जाने की चेतावनी दे रखी थी.
मगर मै चूक गया. वहां के दो नियमित साधकों के साथ गुफा में चला गया.
नियमानुसार मुझे बर्फ की गुफा में रहने के लिये कम से कम एक साल का अभ्यास करना चाहिये था. इसी अभ्यास के लिये ही गुरुवर ने हिमालय की उन दुर्गम कंदराओं में भेजा था.
साधना का मद में एेसा बहका कि गुरुदेव की चेतावनी भूल गया.
परिणामस्वरूप 5 दिन के भीतर ही मरणासन्न हो चला. हाथों पैरों ने काम करना बंद कर दिया. दिल की धड़कन कम हो गई. सांसें छोटी हो गईं. इतनी छोटी कि जीना मुश्किल लगने लगा. न मै अपना संजीवनी उपचार करने लायक बचा न ही गुरुवर से मानसिक सम्पर्क करने के लायक. मुझे लगा कि बर्फ समाधि का समय आ गया है. अब जिया नही जा सकता.
उसी बीच गुफा के एक पुराने साधक ने मेरी खबर गुरुदेव तक पहुंचाई. उन्होंने मुझे गुफा से निकालकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की व्यवस्था की.
मै जिंदा बच गया.
मेरी ये हालत होने से पहले वहां के साधकों ने भलीभांति समझाया था कि एेसा हठयोग जान ले सकता है. यहां आकर साधना करने वाले कई लोगों का शरीर छूट चुका है. पर मै नही माना था.
मुझे दंभ था कि हालात बिगड़ने से पहले अपनी संजीवनी हीलिंग करके मै खुद को ठीक कर लूंगा. मगर बर्फीली ठंड ने एेसा करने का मौका ही नही दिया.
जब मृत्यु करीब दिखी तब लगा गुरू की छोटी से छोटी बात भी साधक की रक्षा के लिये होती है. आप में से जो साधक हैं वे इस बात का विशेष ध्यान रखें. दिमाग लगाकर कभी भी साधना का रुख अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश न करें. ये गैरजरूरी और निराशाजनक ही साबित होगा. कभी भी गुरु द्वारा तय साधना के टाइम टेबल को बदलने की कोशिश न करें. इससे साधना और साधक दोनों ही खतरे का शिकार हो सकते हैं. साधना के लिये कभी भी उतावलापन न दिखायें. ये घातक हो सकता है.
अब हिमालय साधना के लिये पुनः तैयार हूं.
इस बार गुरुवर के साथ जा रहा हूं. वहां वे मुझे अपने कुछ खास अध्यात्मिक मित्रों से मिलवाएंगे. आगे की साधना उनके साथ रहकर करनी है.
किसी भी दिन गुरुवर हिमालय की ओर रवाना हो सकते हैं.
वहां मै जब तक उनके साथ रहुंगा तब तक उनकी हिमालय साधना आपके साथ शेयर करता रहुंगा.
शिव गुरु को प्रणाम
गुरुवर को नमन.

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