धर्म का परिहासः जिम्मेदार कौन- 10

सिर्फ मूर्तियां इकट्ठी होने से भगवान की कृपा का केंद्र बनता तो 
देवी देवताओं की मूर्तियां और फोटो बेचने वाली दुकानें स्वर्ग बन जाती हैं.


17990920_404653096588111_6514113163485111889_nसभी अपनों को राम राम
धर्म का परिहासः जिम्मेदार कौन- 9 के बारे में कुछ कमेंट एेसे हैं जो दर्शाते हैं कि लोग किस हद तक रूढ़ियों की जकड़न में हैं. इन पर बात करते हुए आगे बढ़ेंगे, ताकि सभी साथी कंफ्यूजन से आगे निकल सकें.
कमेंट नीचे पढ़ें….

Kamesh Kumar राम-राम गुरु जी
इस कहानी में ,मैं यह कहना चाहता हूं , कि इसे पढ़ने के बाद तो यही लगता है कि जैसे भगवान की मूर्तियां, चित्र, रुद्राक्ष, शिवलिंग, तांबे पर बने हुए यंत्र , इत्यादि क्या घर में नहीं रखने चाहिए।
अगर हमारे देवी देवता कृपा करने वाले हैं ,उनकी ऊर्जा हमें शक्ति प्रदान करने वाली है शुभता देने वाली है तो क्या कारण है कि मंदिर में वे हमें शुभता प्रदान करेंगे और जैसे ही हम उन्हें घर में लाएं वे अशुभ हो जाएंगे और नकारात्मक प्रभाव देना शुरू कर देंगे ? यह तो बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसा कैसे हो सकता है?
मैं एक दुकान पर जाता हूं और वहां केक खा लेता हूं ।अब यही केक मैं दुकान से घर में लाऊं और खाऊं तो मेरे लिए हानिकारक है यदि मैं इसे दुकान में खाऊं तो मेरे लिए हानिकारक नहीं है मेरे लिए बहुत लाभदायक है यह बात कुछ जचती नहीं है।
पर यह भी सत्य है कि आपका विश्लेषण गलत तो हो नहीं सकता आपने कुछ सोच समझकर ही और कुछ देख कर ही यह विश्लेषण प्रस्तुत किया है
गुरु जी आप भक्तों की मन की व्यथा को देखिए इसे पढ़ने के बाद और तो कुछ नहीं श्रद्धा का तो अंत हो कर रहेगा। जो भी इसे पढ़ेगा वह सोचेगा कि शायद हमारे देवी देवता बेकार हैं, इनकी पूजा पाठ करना गलत है ज्यादा देवी देवताओं का सम्मान करना गलत है और हमारे देवी देवता ineffective useless harmful injurious हैं,बेकार हैं ,नुकसान पहुंचाने वाले हैं। ज्यादा पूजा पाठ करने का कोई फायदा नहीं है पूजा पाठ करना ही नहीं चाहिए यह एक बेकार की चीज है दूसरे धर्मों के देवता अच्छे हैं हमारे देवी देवता बेकार के हैं इत्यादि इत्यादि।

मैं यह कहना चाहता हूं की आप जो विधि बता रहे हैं पूजा करने की वह तो वैसे ही है जैसे इस्लाम में। वे लोग घर पर किसी प्रकार की कोई चीज नहीं रखते हैं अपने घर में वो सिर्फ नमाज ही पढ़ते हैं और हफ्ते में एक बार या बीच-बीच में वह मस्जिद में जाकर ही नमाज़ पढ़ते हैं । आप की विधि भी वैसी ही है कि अपने घर में किसी प्रकार के पूजा के उपकरण ना रखे , देवी-देवताओं के चित्र ना रखे ,केवल मंदिरों में जाकर देवी-देवताओं की पूजा की जाए ।
आप यदि यह सब बता रहे हैं तो कुछ सोच कर ही बता रहे हैं परंतु हमारे पुराने ऋषि-मुनियों और मनीषियों ने इस बात को क्यों नहीं कहा है।

अब हमारी बात…
पहली बात तो ये कि भक्ति और भगवान की धार्मिक हदबंदी की शरारत इंशानी दिमाग का फितूर है, न कि ऊपर वाले की डिमांड।
किसी भी धर्म के मूल में जाने पर वहां सनातन ही मिलता है।
मंदिर और मस्जिद में बहुत फर्क है इसे कहने की जरूरत नही। जब मंदिर जाने की बात कही जाये मगर उसे मस्जिद जाने जैसा करार दिया जाये तो आगे कुछ कहना शेष नही बचता।

भगवान और केक में भी फर्क किया जाना चाहिये। जब विषय जीवन से जुड़ा हो तो टिप्पड़ी में उत्तेजना की जगह धैर्य अधिक उपयोगी होता है।

अब समझें मूर्तियों का विज्ञान…..
पहली बात तो हम यहां भक्ति के विज्ञान की बात कर रहे हैं. न कि उसके खिलाफ.
हम मानते हैं कि भक्ती करना ही काफी नही है, बल्कि जरूरी है भक्ती के परिणामों तक पहुंचना. जब तक कोई व्यक्ति नासमझी, पाखंड, प्रपंच, रुढ़ियों और परम्पराओं में उलझा है तब तक उसकी भक्ती फलदायी नही हो सकती.
घर में मंदिर बनाना इसी तरह की एक क्रिया है.
किसी जगह को मंदिर का नाम दे देने भर से वहां भगवान पैदा नही हो जाते. बल्कि उस जगह को भगवान की उर्जाओं के साथ जोड़ने से उनका आशीर्वाद मिलता है.
इसी तरह किसी वस्तु को भगवान का नाम दे देने भर से उसमें भगवान वास नही करने लगते, बल्कि उस वस्तु को भगवान की उर्जाओं से जोड़कर उसे दैव उर्जाओं का केंद्र बनाया जाता है.
प्राण प्रतिष्ठायुक्त मंदिरों में पूजा प्रार्थना करने से व्यक्ति की नकारात्मक उर्जाओं का शमन होता है. क्योंकि शास्त्रों के विधान में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करके उन्हें नकारात्मकता हटाने और सकारात्मकता देने के लिये तैयार किया जाता है. इसी को देव आशीर्वाद कहते हैं.
ये प्रक्रिया घर के मंदिर में नही अपनाई जा सकती. धन खर्च करके कोई घर में एेसे अनुष्ठान करा भी ले तो भी सामूहिक पूजा पाठ कैसे होगा. बिना सामूहिक पूजा प्रार्थना के देव उर्जायें स्थायित्व नही ग्रहण करतीं.
घरों में पहले से ही समस्याग्रस्त नकारात्मक उर्जायें होती हैं. उन्हीं के बीच बैठकर पूजा पाठ करने से समस्यायें घटने की बजाय बढ़ती हैं. क्योंकि पूजापाठ से प्राप्त सकारात्मक उर्जायें भी नकारात्मक उर्जाओं में मिलकर नकारात्मक हो जाती हैं.
इसे एेसे समझें जैसे एक बाल्टी जहरीले पानी में दो बाल्टी साफ पानी मिला दिया जाये तो तीन बाल्टी जहरीला पानी तैयार हो जाएगा. जिससे नुकसान खतरा बढ़ जाएगा.
सही मायने में घरों में मंदिर पूजा पाठ के बिगड़े स्वरूप का साक्ष्य हैं. सिर्फ मूर्तियां इकट्ठी होने से भगवान की कृपा का केंद्र बनता तो देवी देवताओं की मूर्तियां और फोटो बेचने वाली दुकानें स्वर्ग बन जाती हैं.
अब बात करते हैं कि ऋषियों मुनियों ने इस बारे में कुछ क्यों नही बोला.
ऋषियों मुनियों के काल में लोग घरों में मंदिर बनाते ही नही थे. इसलिये उन्हें इस बारे में कुछ कहने की जरूरत नही पड़ी. इस काल में आश्रम पद्धति थी. वहीं मंदिर थे. लोग वहीं जाकर प्रार्थनायें करते थे. जो लोग अधिक प्रभावशाली थे वे अपने लिये अलग मंदिर बनवाते थे. वहां सामूहिक पूजा न होने के कारण उनके कुल विनाश को प्राप्त हो जाते थे. जैसे रावण का कुल.
इन बातों को समझने के लिये आप सबको लाजिक से निकलकर अध्यात्म के विज्ञान को समझना होगा. भगवान ने इसे विज्ञान के रूप में ही स्थापित किया है. उसी रूप में समझें और अपनायें तो पूजा पाठ और भक्ती को कभी विफलता का मुंह नही देखना पड़ता.
अन्यथा भक्त ही वो कौम है जो भगवान के नाम पर जान देने का शोर मचाते हैं मगर भगवान को ही कोसने से बाज नही आते. वे ये कहने में क्षण मात्र भी नही लगाते कि भगवान तो उनकी प्रार्थना नही सुनते. या भगवान उन्हें दुख दे रहे हैं. ये बातें भक्ती की नही आलोचकों की हैं. गलती या नासमझी हम करें और जिम्मेदार भगवान को ठहराएं, ये कैसी भक्ती. ये कैसा धर्म.

Yashpal Sajwan Guru ji agar hum sirf nirankar bajgwan ko mane to kya murti pooja ki jarurat .padegi aapke rai mai kya uchit hai.nirankar ka astitv hai ki ni
19 April at 22:56
………
एक बात और मानस पूजा यानी बिना वस्तुओं के मन से भगवान को प्राप्त करना, इसका निराकार या साकार पद्धति से कुछ लेना देना नही. पद्धतियां इंशान बनाते हैं भगवान नही. भगवान मूर्तियों, वस्तुओं में नही बल्कि मन के मंदिर में ही होते हैं. मन मैला होगा तो भगवान को उलझन होती है. यही उलझन समस्याओं के रूप में लोगों के सामने आती है. ये हम आगे प्रमाणित करेंगे.
तब तक की राम राम.
हर हर महादेव.

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