धर्म का परिहासः जिम्मेदार कौन-4

मनौती का प्रसादः समस्यायें बढ़ा सकता है


17883500_398263730560381_6761871977594106376_n.jpgसभी अपनों को राम राम

क्या भगवान के नाम पर बांटा गया प्रसाद समस्यायें बढ़ा सकता है.

आज का विषय बहुत संवेदनशील है. इसे समझने के लिये मै अध्यात्म के प्रसाद विज्ञान पर चर्चा करुंगा.

पूरा पढ़ें फिर खुद फैसला लें क्या करें क्या न करें.

वास्तव में ये अध्यात्म का बड़ा और सरल विज्ञान है. इसकी तकनीक घरेलु और सामान्य होती है. जिसे अब विज्ञान की बजाय परम्पराओं या रूढ़ियों के रूप में बताया या उपयोग किया जा रहा है.

अध्यात्म का धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, आस्तिक-नास्तिक, जाति-वर्ग, छोटे-बड़े, देश-विदेश से कोई ताल्लुक नहीं. साधारण लोगों के लिये इसका उपयोग बिल्कुल वैसा ही है जैसे डाक्टर से दवा लेना.

मेरी ये बात उन लोगों को जरूर उत्तेजित या आक्रोशित कर रही होगी, जो शास्त्रों का नाम लेकर धर्म की व्याख्या करते हैं.

मै उनकी प्रतिक्रया को गैर जरूरी नही करार दे रहा. बस आग्रह है कि पूरी बात पढ़ें, जो नया लगे उसे समझें. जो न समझ में आये उसे किसी भी विधि से समझने की कोशिश करें.

सिर्फ इस बात पर आक्रोशित न हों कि आपको जो जानकारी है उसमें ये शामिल नही था. हो सकता है आपने विज्ञान न पढ़ा हो. सिर्फ एक भाषा संस्कृत पढ़कर शास्त्रों का अनुवाद मात्र कर रहे हैं. जबकि शास्त्र विशुद्ध रूप से उत्तम जीवन के विज्ञान को समेटे हैं. विज्ञान को अनुवादित नही किया जा सकता. उसे डिकोड करने पर ही उसका मर्म सामने आ पाता है. वहां लिखी जिन कथाओं को आप सबकुछ मानते हैं वे मात्र उदाहरण हैं.

शास्त्रों को समझने और समझाने के लिये देव भाषा संस्कृत का ज्ञान, उर्जा विज्ञान तथा तकनीकी विज्ञान की उच्च जानकारी होना अनिवार्य है. वर्ना पता ही नही चलेगा कि घी में कैलेस्ट्राल होता है और बंद जगह में उसका दीपक जलाने से जीवन तबाह हो जाते हैं.

अब आज के विषय पर चर्चा करते हैं.

जैसा कि उर्जा विज्ञान का एक सूत्र मैने पहले बताया कि समधर्मी एनर्जी एक दूसरे को आकर्षित करती हैं. आगे बढ़ने से पहले इसे याद रख लीजिये.

इससे पहले दोहरा दूं भगवान को सिर्फ भाव यानि भावनायें चाहिये. जब उन्हें भाव अर्पित करने हों तो उसके लिये किसी वस्तु की जरूरत नही होती. हमारे भावों की उर्जायें मिलावट न होने के कारण क्षण भर में उन तक पहुंच जाती हैं. और क्षण भर में ही उनकी उर्जाओं का सागर लेकर हमारे पास वापस आ जाती हैं.

भक्ति मार्ग का इससे अच्छा कोई साधन नही.

जब हम किसी वस्तु के द्वारा अपने भावों को अर्पित करते हैं तो हमारी भावनाओं की उर्जा में उस वस्तु की उर्जा की मिलावट हो जाती है. एेसे में संसय होता है कि हमारे भाव भगवान तक पहुंचे या नहीं.

जो लोग वस्तुओं की बजाय भगवान को भावनायें अर्पित करते हैं उनकी प्रार्थनायें दूसरों की तुलना मे अधिक पूरी होती हैं.

यदि कोई भक्त भगवान पर प्रसाद या पैसा न चढ़ाये तो भगवान की खुशी नाखुशी पर कोई फर्क नही पड़ता.

सिवाय इसके कि पूजास्थलों में चढ़ावा कम हो जाएगा. जिससे वहां की व्यवस्था प्रभावित होगी.

पूजास्थलों के विज्ञान पर हम फिर कभी बात करेंगे. आज सिर्फ इतना जान लेतें हैं कि भगवान किसी पूजास्थल में नही होते. पूजा या प्रर्थनास्थलों की उर्जायें भगवान की उर्जाओं से गहनता से जुड़ी होती हैं. वहां जाने वाले भक्तों को उन्हीं उर्जाओं का लाभ मिलता है.

प्रसाद दो तरह के होते हैं. एक जिन्हें चार्ज किया जाता है. दूसरा जिससे नकारात्मक उर्जाओं को हटाया जाता है.

पूजा स्थलों में नियमित लगाया जाने वाला भोग, सत्यनारायण कथा का प्रसाद, भजन-कीर्तन का प्रसाद आदि का प्रसाद दैवीय उर्जा से चार्ज होकर लाभकारी बन जाता है. भगवान को भोग लगाकर जब सामूहिक रूप से पूजा पाठ, भजन कीर्तन, उत्सव किये जाते हैं. उस दौरान भोग का प्रसाद वहीं रखा रहता है. तो वो दैवीय उर्जाओं से उर्जित हो जाता है. उसे ग्रहण करके देव उर्जायें प्राप्त होती हैं. जिन्हें भगवान का आशीर्वाद कहते हैं.

इसके विपरीत मनौती का प्रसाद, ज्योतिषीय उपाय का प्रसाद, तांत्रिक उपाय का प्रसाद, झाड़फूंक वाले प्रसाद, जादू-टोने के तहत चढ़े प्रसाद, वास्तु निवारण का प्रसाद, निरोगी होने का प्रसाद, समस्या मुक्ती का प्रसाद, भूत-प्रेत निवारण का प्रसाद, श्राद्ध का प्रसाद आदि नकारात्मकता हटाने के लिये चढ़ाया जाता है. इसे प्रभावित व्यक्ति ईष्ट को अर्पित करता है. तो संकल्प करते ही उसके भीतर की नकारात्मक उर्जायें प्रसाद की वस्तुओं द्वारा अपने भीतर खींच ली जाती हैं. जिससे वे वस्तुवें नकारात्मक उर्जाओं से भर जाती हैं.

उनकी नकारात्मकता हटाने के लिये उन्हें देवस्थान पर भेट किया जाता है. प्रायः प्राण प्रतिष्ठायुक्त देव स्थानों की उर्जाओं में नकारात्मक उर्जाओं का पातालीकरण कर देने की भी क्षमता होती है.

फिर प्रसाद की वस्तुओं में कुछ नकारात्मकता रह ही जाती है. उन्हें ग्रहण करने से समस्यायें बढ़ती हैं. इसीलिये समस्या निकारण के लिये प्रसाद चढ़ाने वाले से कहा जाता है कि वो खुद प्रसाद न खाये, न ही उसे घर ले जाये. सारा प्रसाद दूसरों को बांट दे.

आजकल 95 प्रतिशत से अधिक लोग इसी तरह का प्रसाद चढ़ा रहे हैं.

मनौती के लिये चढ़ाया गया प्रसाद कामना पूरी होने में रुकावट उत्पन्न करने वाली नकारात्मक उर्जाओं को हटाता है. इसलिये उसे भी ग्रहण करने से नुकसान होता है.

वैसे ये मनौती पूरी होने के पहले चढ़ाया जाना चाहिये. ताकि कामना में बाधा बनी उर्जायें हट जायें, और मनौती पूरी हो जाये. यही इसका विज्ञान है.

मनौती पूरी होने के बाद प्रसाद चढ़ाने का कोई मतलब नही, यही वो नदानी है जिसमें लोग समझते हैं कि प्रसाद चढ़ाने से भगवान खुश होते हैं.

आगे हम चर्चा करेंगे कि हवन में उपयोग के बावजूद घर में घी का दीपक क्यों न जलायें.

तब तक की राम राम

हर हर महादेव.

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