धर्म का परिहासः जिम्मेदार कौन-1

शिवलिंग पर दूधः ये इलाज है न कि भगवान को खुश करने का तरीका


17634289_396771600709594_5748305227391135182_nसभी अपनों को राम राम

मेरी आज की बात उन लोगों को उत्तेजित या आक्रोशित कर सकती है, जो मात्र श्लोक पढ़कर या भागवान की लीला का नाम लेकर धर्म की व्याख्या करते हैं.

धर्म और अध्यात्म का परिहास. विषय बहुत संवेदनशील है. अध्यात्मिक क्रियाओं पर सवाल उठाने वालों को नास्तिक या बेलगाम कहकर काम नही चलने वाला. कलियुग शिक्षितों का युग होता है. इस युग में दूसरे युगों की तुलना में पढ़े लिखें लोगों की संख्या काफी ज्यादा होती है. यहां लोग विज्ञान को अधिक महत्व देते हैं. एेसे में बात को श्लोक सुनाकर बताने की बजाय वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ पेश करना होगा. सिर्फ शास्त्रों का नाम लेकर अपनी बात कहने की बजाय विद्वानों को शास्त्र में छुपे विज्ञान को सामने लाना होगा.

अध्यात्मिक सच्चाई को जब तक वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नही किया जाता, तब तक विषय परिहास का शिकार होता रहेगा.

मै आगे जो कहुंगा उसे कभी भी वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित करने को तैयार हूं. शिवशिष्य होने के नाते दुनिया के सभी वैज्ञानिकों, सभी समीक्षकों, सभी धर्म गुरुओं, सभी विद्वानों को मेरा खुला आमंत्रण है कि वे जब चाहें मेरे साथ बैठकर वैज्ञानिक सच्चाई देख सकते हैं.

सबसे पहले ये जान लेना जरूरी है कि क्या शास्त्र सिर्फ ग्रंथ मात्र हैं या सुखी जीवन के विज्ञान की धरोहर हैं. निश्चित रूप से शास्त्रों को कहानियों के लिये नही लिखा गया. उनमें विशुद्ध रूप से जीवन का विज्ञान संजोया गया है. ऋगवेद में मानव शरीर की संरचना के गहरे रहस्य छिपे हैं. आज का विज्ञान उनमें से 17 प्रतिशत को ही खोज पाया है. जो वहां लिखा है, वही आज के मेडिकल साइंस में सिलसिलेवार सामने आता जा रहा है. गर्भ में भ्रुण रोपण से लेकर पैदा होने तक बच्चे का निर्माण और विकास कब, कितना होता है. उसकी कोशिकाओं, खून, मांसपेशियों, हड्डियों अंगों का निर्माण किस दिन कितना हुआ, कब किस अंग ने काम करना शुरू किया. पैदा होने से आयु पूरी होने तक शरीर और उसके अंगों के साथ क्या क्या होगा. इसका सम्पूर्ण विज्ञान हमारे शास्त्रों में लिखा है.

शरीर और मन के रोगों की शास्त्रों में वैज्ञानिक व्य्ख्या दी गई है. रोग और उसके उपचार से लेकर मेडिकल साइंस में एेसा कुछ भी नही है जिन्हें शास्त्रों में नही बताया गया है. यदि विज्ञान के रिसर्चकर्ता शास्त्रों में दी गई जानकारी को अपनायें तो आज का साइंस कई गुना अधिक असरदार नतीजे निकाल लेगा. कोई रोग असाध्य नही बचेगा.

इसी तरह अणु से लेकर परमाणु तक, पदार्थ की दिखने वाली और न दिखने वाली अवस्थाओं तक का विज्ञान वेद-शास्त्रों में व्यस्थित किया गया है. यहां तक कि शास्त्रों में गुरुत्वाकर्षण को निष्क्रिय कर देने तक का विज्ञान उपलब्ध है. राजनीक शास्त्र, समाज शास्त्र की सम्पूर्ण व्याख्या के ग्रंथ हैं शास्त्र. वहां दी राजनीति के फन अपनायें जायें तो कोई पछाड़ नही सकता. इससे कोई फर्क नही पड़ता कि विरोधी कितने छल कपट का सहारा ले रहा है.

विज्ञान को मात्र किसी श्लोक का अर्थ बताकर परिभाषित नही किया जा सकता. श्लोक से अनुवाद तो किया जा सकता है, मगर उसके भीतर छिपे वैज्ञानिक फार्मूलों को डिकोड नही किया जा सकता. हमारे शास्त्र कोड भाषा में लिखे हैं. उन्हें डिकोड किये जाने की जरूरत होती है न कि अनुवाद की.

आज अधिकांश विद्वान अनुवादक की भूमिका में हैं. उन्होंने विज्ञान नही पढ़ा. सिर्फ भाषा (संस्कृत ) के ज्ञाता हैं. उन्हें उसका अनुवाद आता है. अपने द्वारा किये अनुवाद को ही वे अंतिम सत्य मानते हैं. तर्क के दौरान जिस बात पर अटकते हैं उसे भगवान की लीला कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं.

ये सही नही है. एेसा नही होना चाहिये.

जो वर्ग सवाल उठा रहा है कि शिवलिंग पर हजारों लीटर दूध चढ़ाकर बर्बाद कर दिया जाता है. क्यों न उसे गरीबों में बांट दिया जाये. उनमें और इनमें अधिक फर्क नही है. ये कहते हैं शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से भगवान खुश हो जाते हैं. वे कहते हैं बांट दिया जाये तो गरीब खुश हो जाएंगे. ये कहते हैं हम एेसा करते हैं इसमें हमारी खुशी. वे कहते हैं ये रुढ़िवादी सोच हैं.

दोनो ही अध्यात्म के विज्ञान की बात नही कर रहे. दोनो ही प्रकृति के रहस्य से अंजान हैं.

मै इनमें से उन्हें ही दोषी मानता हूं जो खुद को विद्वान कहते हैं. मगर व्याख्या गलत कर रहे हैं. पहला वर्ग तो सिर्फ जिज्ञासु है. सही जवाब न मिलने के कारण कुतर्क तक पहुंच रहा है. दूसरा वर्ग खुद को विद्वान घोषित करके भी कुतर्क कर रहा है.

आगे मै प्रमाणित करूंगा कि शिवलिंग पर दूध चढ़ाना इलाज है न कि भगवान को खुश करने का तरीका.

तब तक की राम राम

हर हर महादेव.

 

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