एक अनुष्ठान सम्मानजनक मृत्यु के लिये

जिनी ने अपनों की वफादारी में जान दी


17424897_388918868161534_4716364596655716609_n.jpgप्रणाम मै शिवांशु,
मृत्यु से बचने की बजाय मृत्यु को सम्मानजनक बनाकर अपनाना कब जरूरी हो जाता है. इससे आने वाले जन्मों पर क्या असर पड़ता है. इन सवालों की जानकारी से हम ब्रह्मांड के तमाम रहस्यों को जान सकते हैं. इसके लिये मै एक घटना का संदर्भ दे रहा हूं.
गुरुदेव के अनुष्ठान से पीड़ा से छटपटा रही जिनी को सम्मानजनक मृत्यु मिल गई. वह शिवलोक की तरफ विदा हो गई.

आगे…
मै मणिनाथ जी के आश्रम से दिल्ली आश्रम पहुंचा तो गुरुवर वहां अकेले ही थे.
जिनी उनके हाथें में थी.
जिनी एक गिनीपिग थी. गिनीपिग खरगोश, गिलहरी और चूहों की मिलावट वाले जीवों की एक पालतू प्रताजि है. वैसे तो वैज्ञानिकों ने इन्हें अपने एक्सपेरीमेंट के लिये तैयार किया. मगर उनकी चंचलता और अपनापन इंशानों को हमेशा ही आकर्षित करता है. उनके नाम में पिग जुड़ा है मगर उनका पिग से दूर दूर का कोई रिश्ता नही.
जिनी की उम्र लगभग एक साल थी. उसके माता पिता दिल्ली आश्रम में ही पले. जब जिनी पैदा हुई तो दिल्ली आश्रम में आने वाले तामाम साधकों ने उसे अपने घर पालने का आग्रह किया. वो मिली शिवप्रिया टीम की ख्याति को. ख्याति जिनी व उसके भाई को अपने घर ले गईं. दोनो उस परिवार के दुलारे बन गए.
जो जीव अधित संवेदनशील होते हैं, वे उर्जाओं के बहुत अच्छे रीडर भी होते हैं. गिनीपिग भी उनमें से एक हैं. एेसे जीव अपना पालन पोषण करने वालो को अपना मानते हैं. उन पर आने वाली मुसीबतों की उर्जाओं को रीड कर लेते हैं. और उन्हें बचाने के लिये मुसीबतों की उर्जा आकर्षित करके अपने आभामंडल में ले लेते हैं. जिसके कारण कई बार उनकी मृत्यु भी हो जाती है. इस बात को जानते हुए भी ये जीव वफादारी निभाते हैं. और अपना पालन पोषण करने वालों की मुसीबतें अपने ऊपर लेते रहते हैं.
जिनी ने भी एेसा ही किया.
जिस परिवार में उसका सुखद पालन पोषण हो रहा था, उसके सदस्यों पर आ रही बड़ी मुसीबतों की उर्जा अपनी तरफ खीच ली. शायद वह उनका सामना भी कर लेती. मगर वह गर्भवती थी. घातक उर्जा ने उसके नाजुक गर्भ पर तीब्र प्रहार किया. गर्भ में पल रहे बच्चे एेसी उर्जाओं के आसान शिकार होते हैं. तेज प्रहार ने जिनी के गर्भ को बड़ी क्षति पहुंचाई और वो भारी पीड़ा में पहुंच गई.
पीड़ा में देख घर के लोग उसे डाक्टर के पास ले गये. डाक्टर चूक गया. वह समझ न पाया कि जिनी गर्भ से है. उसने कहा उसका लीवर बढ़ गया है. इसलिये उसने लीवर के लिये इंजेक्शन लगा दिये. जिसने जिनी को भारी हानि पहुंचाई.
उसका गर्भपात हो गया. दो बच्चे मृत पैदा हुए.
गर्भपात के बाद भी जिनी पर इंजेक्शन का दुष्प्रभाव बना रहा.
उसका नर्वस सिस्टम क्षतिग्रस्त होने लगा.
अंततः वह paralysis का शिकार हो गई.
paralysis का अटैक बहुत घातक था. रीढ़ की हड्डी विकार ग्रस्त हो गई. हाथों पैरों ने काम करना बंद कर दिया. जिससे वह चलने फिरने में असमर्थ हो गई. उसे रेंगकर चलना पड़ रहा था. जबड़े और दांत नियंत्रण से बाहर हो गए. जिस कारण उसका खाना पीना मुश्किल हो गया. शरीर के अधिकांश अंगों में पीड़ा व्याप्त हो गई.
दिल्ली आश्रम पहुंचने पर गुरुदेव ने मुझे उसका संजीवनी उपचार करने को कहा.
मै कई महीनों से हिमालय क्षेत्र की साधना कर रहा था. पिछले दिनों गुरुवर का संदेश मिला. उन्होंने हिमालय में पाई जाने वाली देव बूटी एकत्र करके लाने को कहा था. देव बूटी के द्वारा देवत्व साधना होनी है. विनोदानंद जी के साथ मै यहां देव बूटी देने ही आया था. अगले दिन सुबह 9 बजे दिल्ली आश्रम से वापसी थी. शिवप्रिया जी से पहली भेट की भी मंशा थी. गुदेव ने बताया था कि मनोविज्ञान की उच्च शिक्षा के लिये वे लंदन जाने वाली हैं. लम्बे अर्से बाद अरुण जी से भी मुलाकात की लालसा थी. आखिरी बार हम 2000 में मिले थे. लेकिन इत्तिफाक से दोनोजन उस दिन मुम्बई गए थे. सो उनसे भेट न हो सकी.
संजीवनी उपचार के बीच मेरे पूछने पर गुरुदेव ने जिनी के बारे में जानकारी दी.
मैने लगभग एक घंटे जिनी का संजीवनी उपचार किया.
उसमें काफी सक्रियता दिखने लगी. वह तेज आवाज में चहकने लगी. अपने माता पिता और भाई बहन के साथ खेलने के लिये उतावली सी दिखने लगी.
गुरुदेव ने उसे उन लोगों के साथ छोड़ दिया. और उसकी एनर्जी की जांच करने लगे.
कुछ मिनटों की जांच के बाद गुरुवर ने मुझसे कहा संजीवनी बंद कर दो. अब इसे मृत्यु की आवश्यकता है.
मुझे आश्चर्य हुआ. मैने कहा गुरुवर ये रिकवरी की तरफ है. हम इसे बचा सकते हैं.
नही अब इसे सम्मानजनक मृत्यु की तरफ ले जाना होगा. गुरुदेव के शब्दों में सख्ती थी.
क्यों, हम इसे ठीक कर सकते हैं. मैने कहा.
ठीक होने के बाद भी इसके हाथ पैर पूरी तरह स्वस्थ नही हो पाएंगे. गुरुवर ने बताया शेष जीवन कष्टों में बिताना पड़ सकता है. इसलिये मृत्यु का अनुष्ठान ही उचित होगा.
मै चुप हो गया. मुझे मृत्युंजय मंत्र की ब्याख्या याद आने लगी. जिसमें प्रार्थना की गई है … उर्वा रुक मिव बंधनात्… अर्थात् यदि शरीर स्वस्थ होने लायक नही बचा तो प्राणों को शरीर के बंधन से इस तरह मुक्त कर दें, जैसे उर्वा (ककड़ी का फल) पकने पर बिना कष्ट के अपने पौधे से मुक्त हो जाता है.
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

गुरुदेव ने जिनी को सम्मानजनक मृत्यु दिलाने के अनुष्ठान की तैयारी शुरू कर दी.
सम्मानजनक मत्यु का अनुष्ठान कैसा होता है. किन लोगों को इसकी जरूरत पड़ती है. इसके क्या क्या दोष होते हैं. उनसे कैसे बचा जाता है. अगले जन्म पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है. जब एेसे वफादार जीव अपने पालने वालों की मुसीबत अपने ऊपर लेकर जान खतरे में डाल देते हैं. तब पालने वालो का उनके प्रति का क्या फर्ज होता है. इसकी चर्चा हम आगे करेंगे.
शिवगुरु को प्रणाम
गुरुवर को नमन.
क्रमशः.

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