एक गैर जरूरी साधना-2

चिता की लकड़ियों पर बनी चाय पीकर भुनें मांस का अहसास हुआ


15941283_352874605099294_7754342105412426950_nराम राम, मै शिवप्रिया
क्या गैरजरूरी साधनायें की जानी चाहिये. ये एक विचित्र मगर जरूरी सवाल है. इसका जवाब मुझे गुरु जी के निकट शिष्य शिवांशु जी के एक लेख में मिला. उनके लेख को मै यहां उन्हीं के शब्दों में शेयर कर रही हूं.

…………………..
शिवांशु जी का लेख…
अघोरी बाबा जोर जोर से मंत्रोचार करने लगे. उनके हाथ में एक मानव खोपड़ी का कपाल था. लगभग कूदते हुए से वे अपने उस शिष्य के पास गये, जिस पर बैताल सवार हो गया था. कपाल उसके सिर पर रखकर जोर से दबाने लगे. उनके मंत्रोचार की ध्वनि लगातार तेज होती जा रही थी. जैसे वे बहुत गुस्से में मंत्र जाप कर रहे हों.
मगर आश्वचर्य की बात ये थी कि उनके मंत्रोचार की लय में कोई बदलाव नही आ रहा था. आवाज तेज होती जाने के बावजूद लय एक जैसी ही थी. मुंह से निकल रहे अक्षरों के उच्चारण की रफ्तार कम ज्यादा नही हो रही थी.
उस शिष्य का नाम बिरजू सोंधे था. अघोरी बाबा के मुताबिक उस पर बैताल सवार हो गया था. बैताल अत्यधिक खतरनाक प्रजाति के प्रेत को कहा जाता है. बाबा के अनुसार बिरजू सोंधे ने एक गैर जरूरी साधना कर ली थी. बैताल उसी की सजा दे रहा था.
सजा भी एेसी जिसे देखकर बड़ी हिम्मत वाले भी दहल जायें. बिरजू सोंधे की हरकतें देखकर लग रहा था जैसे कोई उसे उठाकर पटक रहा हो. वह उछल उछल कर गिर रहा था. कई बार तो चार-पांच फीट तक हवा में उछल जाता था. वीडियो बनाया जाता तो वह जिमनास्टिक जैसा लगता. मुझे उसकी हरकतों पर शक हो रहा था.
मेरे विचार से वह पागलपन का शिकार था. या खुद की तरफ लोगों का ध्यान खींचने के लिये बेतुकी गतिविधयां कर रहा था. दूसरी तरफ मेरी खोजी सोच के विपरीत किसी और सच्चाई का संकेत मिल रहा था.
साथी साधुओं ने उसे शांत कराने के लिये पकड़ने की कोशिश की. बिरजू में जैसे हाथियों की ताकत आ गई हो. उसने उन्हें एेसे उछाल कर फेंक दिया जैसे सूखी घास के पुतले हों. उसके साथी डर के मारे दूर खड़े थे. किसी की हिम्मत उसके पास जाने की न हो रही थी.
इस उठा पटक के दौरान उसे कई गम्भीर चोटें लगीं. कुहनियों और घुटनों में चोट से खून बहने लगा. चेहरे पर घाव हो गये. उनसे बह रहा खून उसकी शक्ल को डरावना रूप दे रहा था. मुझे वो खुद ही बैताल सा नजर आ रहा था.
पूरा चेहरा ही खून से लथपथ हो गया. हर बार हवा में उछलने के बाद वो मुंह के बल ही जमीन पर गिर रहा था. प्रतीत हो रहा था कि उसे अपनी चोटों का अहसास ही नही हुआ. तेज आवाज में हुंकारें भरते हुए उछलता और गिर जाता.
अघोरी बाबा बिरजू सोंधे के पास जाकर उसकी ऊंचाई के बराबर उछले. और झपटकर उसके सिर पर मानव कपाल रख दिया. फिर कपाल से उसे दबाने लगे. वह छटपाटाता हुआ नीचे बैठने लगा. जैसे किसी सिकंजे में फंसकर ऊपर से दबा जा रहा हो. उसकी हुंकार धीमी होने लगीं. वह बैठता चला गया. फिर धड़ाम से गिर पड़ा. बेहोश हो गया.
अघोरी बाबा ने कपाल उसके सिर पर थोड़ी देर तक वैसे ही दबा. रखी. मंत्र भी पढ़ते रहे. जब उन्हें पूरा यकीन हो गया कि बिरजू शांत हो गया है. तब मंत्र जप रोका. सिर से कपाल हटा ली. मैने उनके चेहरे की तरफ देखा. वो पसीने से भीग गये थे. जैसे कड़ी मसक्कत की हो.
अब वातारण पास में मौजूद शमशान की तरह शांत था.
बिरजू बेहोश था. उसके साथी भयभीत थे. मै अचम्भित था, अघोरी बाबा बेचैन विजेता से दिख रहे थे. गुरुवर शांत थे.
अघोरी बाबा गुरुदेव के साथ अपनी धूनी की तरफ चल दिये. गुरुवर का इशारा पाकर मै भी उनके साथ हो लिया. धूनी शामशान की तरफ थी. अक्सर उसमें शामशान की चिताओं की बची लकड़ियां जलाई जाती थीं. ये बात बैताल वाली घटना से कुछ देर पहले ही उनमें से एक साधू ने मुझे बताई थी. अघोरी बाबा ने इशारे से अपने दूसरे शिष्य मेवा पंडित को पास बुलाया. उसे धूनी की गुनगुनी भस्म देकर बिरजू के घावों पर लगाने को कहा.
बाबा के इशारे पर मेवा पंडित ने बिरजू को उपचारित करने के बाद एक टूटे गंदे से भगोने में चाय बनाई. चाय अघोरी बाबा की धूनी पर बनी. मैने कभी नही सोचा था किसी चिता की लकड़ियों पर बनी चाय पीनी होगी. मन विचलित हुआ.
गुरुदेव को सामान्य भाव से उस चाय पीते देखा तो हिम्मत बढ़ी. फिर भी उस चाय को पीते हुए लग रहा था ये कोई और ही दुनिया है. चाय में कोई दोष नही था. फिर भी पीते समय लाशों के जल रहे मांस की सी बदबू का अहसास होता रहा.
क्राइम रिपोर्टिंग के दौरान पोस्टमार्टम हाउस में काटी चीरी जा रही लाशों के बीच चाय पीना, सरकारी अस्पतालों में दर्द से तड़प रहे अधमरे लोगों के बीच चाय पीना, दुर्घटना स्थल पर तड़प रहे घायलों या बिखरी पड़ी लाशों के बीच चाय पीना तो अक्सर ही होता रहता था. मगर एेसा अहसास कभी नही हुआ.
मुझे याद है, कुछ साल पहले पोस्टमार्टम हाउस के बाहर किसी केश में आये एक पुलिस अधिकारी ने वहां मौजूद रिपोर्टरों को चाय आफर की. उस समय आस पास कई लाशें थीं. उनके परिजन बिलख रहे थे. इस सबकी परवाह किये बिना सभी रिपोर्टरों व पुलिस वालों ने चाय पीनी शुरू कर दी. एेसे जैसे वहां के माहौल से उनकी कोई संवेदना ही न हो.
मै नया क्राइम रिपोर्टर बना था. मुझे ये सब बहुत बुरा लगा. लौटकर गुरुवर को बताया तो उन्होंने कहा था *जिंदगी जिस रंग में रंगना चाहे तुरंत रंग जाओ. तो उसे एंज्वाय कर लोगे, वर्ना हालात भारी पड़ जाएंगे. और दर्द से छटपटा उठोगे*. कुछ ही दिनों में मैने भी क्राइम रिपोर्टिंग के तौर तरीके सीख लिये थे. पता चल गया था कि रिपोर्टर या पुलिस वाले संवेदनहीन नही होते. बल्कि कठिन स्थितियों में खुद को काम करने लायक बनाये रखने की जरूरत अपनाते हैं. मैने गुरुदेव की जिंदगी के रंग में तुरत रंग जाने वाली बात को अपना लिया.
आज से पहले तक मै समझता था कि गुरुवर की इस सीख को मैने पूरी तरह अपना लिया है. मगर उस एक चाय ने मेरा अहम तोड़ दिया. मेरा मन पचा नही पा रहा था कि मैने चिता की लकड़ियों पर बनी चाय पी है. एेसा लग रहा था अब मेरे ही भीतर बैताल घुस गया है. आंतरिक तौर पर मै बहुत विचलित और असहज हुआ जा रहा था.
गुरुदेव ने मेरी मनोदशा भांप ली. मजाक के लहजे में बोले लगता है तुम्हें भी अघोरी बाबा के इलाज की जरूरत है.
मै कुछ नही बोला.
गुरुदेव समझ गये. मै असहज था. मेरा ध्यान बंटाने के लिये गुरुवर ने अघोरी बाबा से सवाल किया. पूछा बिरजू सोंधे ने कौन सी गैर जरूरी साधना कर डाली. बैताल उसे क्यों सजा दे रहा है. उसे सजा देने का अधिकार कहां से मिला.
यही सवाल मेरे भी दिमाग में घूम रहे थे. जल्दी ही मै शमशानी चाय भूलकर अघोरी बाबा का जवाब सुनने में तल्लीन हो गया.
उनकी बातें अविश्वसनीय किन्तु सच थीं.
…. क्रमशः

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