जब मैने गुरुदेव से प्रेत देखने की इच्छा जताई…..8

प्रणाम मै शिवांशु

गतांक से आगे……..

जब मैने संजीवनी शक्ति उपचार सीखना शुरू किया था, तब एेसा लगता था जैसे ये कोई तिलस्मी काम है. अपनी आंतरिक शक्तियों कुंडली, आभामंडल, उर्जा चक्रों का उपयोग करना. उससे अदृश्य दुनिया पर कंट्रोल करना. ऊपरी बाधा, तंत्र की नुकसान देनी वाली उर्जाओं को जला कर भस्म कर देना. बिना अनुष्ठान ग्रहों की उर्जाओं को कंट्रोल कर लेना. बिना तोड़फोड़ वास्तु के नुकसान को रोक देना. समस्याओं की उर्जाओं को खत्म करना. सुख की उर्जाओं को स्थापित करना. बिना सामग्री,  बिना पूजा पाठ, बिना उपाय, बिना यज्ञ दुखों को समाप्त कर लेना. लाइफ के सुखों को जगा लेना. बिना दवायें स्वास्थ पर कंट्रोल, बिना मंत्र जाप सिद्धी पा लेना. बिना आयोजन उत्सव मना लेना.

ये सब सुनकर लगता था किसी और ही दुनिया की बातें हैं.

धरती पर तो एेसा होते पहले न सुना था.  

गुरुवर का दावा था कि ये सब उतना ही आसान है जितना गिलास उठाकर पानी पीना. बस खुद का उपयोग सीख लो.

आज गुरुदेव के दावे की सच्चाई सामने थी. जिस प्रेत को देख नही सकता था, उसे मैने हरा दिया. अब वो मेरे पास आने की हिम्मत नही कर पा रहा था. अपने मालिक के पास आने के लिये उसे मेरी इजाजत की जरूरत थी.

ये सब मैने बिना मंत्र जाप के कर लिया था. बिना किसी अनुष्ठान के कर लिया था. बिना किसी तंत्र के कर लिया था. बिना जाने समझे कर लिया था. बिना देख कर लिया था. जितनी देर में आप अपने मोबाइल से किसी को नम्बर मिला सकते हैं, उससे भी जल्दी कर लिया था.

गुरुदेव के कहने पर मैने कुटिया के भीतर से इलेक्ट्रिक वायलेट एनर्जी का उर्जा क्षेत्र हटा दिया.

प्रेत निरंजन कुटी के भीतर आ गया. मै उसे देख नही पा रहा था.

गुरुदेव से पूछा क्या आप निरंजन को देख सकते हैं. उन्होंने कहा हां. क्योंकि वो अपनी इच्छा से मुझे दिख रहा है. तुम्हेें पता है वो इस समय कहां है.

नही मै उसे नही देख पा रहा. मैने बेबसी से कहा.

दिखेगा तो वे अपनी मर्जी से ही. गुरुदेव ने बताया, मगर उससे एनर्जी को लिंक करके तुम उसकी गतिविधियों को जान सकते हो.

वो कैसे करूं. मैने पूछा. ये मेरे लिये संजीवनी उपचार का नया लेशन था.

संजीवनी रुद्राक्ष से कहो वे तुम्हें प्रेत की उर्जा से लिंक कर दें. गुरुदेव ने तरीका बताया.

मैने हाथ में पकड़े बड़े साइज के रुद्राक्ष से निरंजन की गतिविधियों को जानने के लिये उससे लिंक करने का आग्रह किया. साथ ही शिव गुरु से प्रार्थना की कि वे मेरी हिफाजत के लिये देवदूतों की नियुक्ति करें. मै प्रेत का दूसरा हमला झेलने के मूड में बिल्कुल न था. वैसे भी गुरुदेव का स्थाई निर्देश है कि जब कभी अदृश्य शत्रु से सामना हो तो देवदूतों की सुरक्षा तुरंत ले लो.

मैने ले ली.

यहां आपको बताता चलूं कि जब गुरुवर ने देवदूतों की सहायता लेना सिखाया तो मै बड़ा कंफ्यूज था. सोच रहा था देवदूत तो बहुत बड़ी शक्तियां होते हैं. वे मेरी बातें क्यों मानेंगे. भगवान शिव उन्हें मेरा काम करने के लिए बार बार क्यों नियुक्त करेंगे. मानसिक रूप से इस बात को स्वीकार ही नही कर पा रहा था.

तब गुरुदेव ने उदाहरण दिया था. एक व्यक्ति नाकाबिल या अनपढ़ है. किसी से उसको जान का खतरा है. वो खुद से बहुत ज्यादा काबिल और क्षमतावान पुलिस अधिकारी के पास जाकर सुरक्षा की मांग करता है. तय नियम के मुताबिक पुलिस अधिकारी को उसकी सुरक्षा करनी ही होगी. अन्यथा अधिकारी के अधिकार छिन सकते हैं. इसी तरह देवदूतों का काम इंशानों की सुरक्षा करना भी होता है. वे अपनी ये जिम्मेदारी हर हाल में निभाते हैं. बस हमें उनकी मदद लेना का तरीका आना चाहिये.  

रही बात भगवान शिव की तो दुनिया चलाने के जितने भी प्राकृतिक नियम बने हैं, सबके रचयिता वही हैं. उनके नियमों में ये भी शामिल है कि ब्रह्मांड का कोई भी जीव जिस भी देवता से मदद मांगे, देवता को मदद करनी ही होगी. बस मांगने का तरीका सही होना चाहिये. शिव खुद भी अपने नियम में बंधे हैं. सो उचित मांग पर वे तुरंत देवदूतों की नियुक्ति कराते हैं.

मुझे बड़ा अचरज हुआ था, जब गुरुदेव द्वारा सिखाई तकनीक का उपयोग पहली बार किया. पहली बार में ही मुझे देवदूतों की मदद मिल गई. संजीवनी रुद्राक्ष को देवदूतों की सहायता प्राप्त करने के लिये विशेष रूप से प्रोग्राम किया जाता है. इसलिये ये उनकी सहायता हासिल कर ही लेता है.

अब इस पर कोई आश्चर्य नही होता. मांग पर देवदूत आते हैं अपना काम करके चले जाते हैं. कीमत के रूप में उन्हें धन्यवाद दे देता हूं. सब कुछ सामन्य दिनचर्या की तरह लगता है.

 

अभी भी मेरी सुरक्षा और सहायता के लिये देवदूत नियुक्त हो चुके थे.

गुरुदेव ने उनकी एनर्जी रीड कर ली. बोले इनकी जरूरत नही है, इन्हें जाने को कहो. मैने देवदूतों को धन्यवाद देकर विदा किया.

अब बात शुरू हुई निरंजन से मेरी दोस्ती की. एनर्जी लिंक होने के बाद अब मै  जान पा रहा था कि प्रेत कहां है. वह गुरु बाबा के बाईं तरफ बैठा हुआ प्रतीत हो रहा था. मुझे उसकी हलचल का भी आभास हो रहा था. मगर दिख नही रहा था.

गुरुदेव के कहने पर गुरु बाबा ने निरंजन को कुछ निर्देश दिये.

कुछ ही क्षणों बाद निरंजन मुझे दिखने लगा. वह ठीक उसी जगह बैठा था, जहां लिंक होने के बाद मुझे उसकी एनर्जी फील हो रही थी.

 

बिल्कुल इंशान जैसा.

एक एेसा इंशान जिसके भीतर आत्मा नही थी.  

उसने कपड़े भी पहन रखे थे. माथे पर लाल तिलक लगा था.

मै कुछ देर तक विचार शुन्य होकर देखता रहा. ये प्रेत है, यकीन ही नही हो रहा था. बस देखता ही रहा.

एक प्रेत की जो छाप मस्तिष्क में थी. उससे बिल्कुल उलट. न उसके कान बड़े बड़े थे. न उसके पैर उल्टे थे. न उसके दांत बाहर निकले थे. न उसके मुंह से खून टपक रहा था. न उसके सिर पर सींग थीं. न वह डरावना था. न वह लुभावना था. एक साधारण इंशान जैसा दिखता है, वह वैसा ही था. अगर थोड़ी देर पहले वह अदृश्य न रहा होता, तो मुझे ये स्वीकार कर पाना कठिन होता कि ये प्रेत है.

मैने चकित भाव से गुरुवर की तरफ देखा और पूछा ये…

हां यही निरंजन है. गुरुदेव ने चुटकी ली. तुमने क्या सोचा था इसके पूछ निकली होगी, या सिर पर सींग होंगे.

क्या मै इससे बातें भी कर सकता हूं. मैने पूछा.

हां कर लो. गुरुदेव ने कहा.

मैने झिझकते हुए निरंजन से पूछा आपका नाम क्या है. जैसे किसी बच्चे से पहली बार मिलने पर पूछते हैं. बात की शुरुआत के लिये मुझे और कुछ सूझा ही नही. उसने अपना नाम बताया.

यानी हम एक दूसरे को सुन भी सकते थे.

निरंजन मुझे अच्छा लगा. मै उसके साथ कुटिया से बाहर जाकर घंटों बातें करता रहा.

शायद आप लोग जानना चाहें कि मैने उससे क्या बातें कीं.

….. क्रमशः.

सत्यम् शिवम् सुंदरम्

शिव गुरु को प्रणाम

गुरुवर को नमन

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