मेरी पहली उच्च साधना….5

12814597_159046211148802_5413239348754047654_n.jpgप्रणाम मै शिवांशु

महाशिव रात्रि की आप सभी को शुभकामनायें।

शिव गुरु की कृपा और गुरुवर की प्रेरणा से आपका जीवन सुखी हो, यही हमारी कामना है।

ब्रह्मांड विलय साधना.

विषय अभी भी टेकनिकल बना हुआ है. क्योंकि गुरुदेव ने इस साधना में मंत्र या योग का उपयोग नही कराया. सीधे अध्यात्म के विज्ञान और शरीर के विज्ञान को माध्यम बनाया. इसीलिये साधना की चर्चा करते हुए विज्ञान की चर्चा करनी पड़ रही है. इस कारण हो सकता है कहीं कही सब्जेट उबाऊ लग पड़े. मगर पढ़ी लिखी पीढ़ी का होने के कारण ये सब जानना भी आप जैसे साधकों के लिये जरूरी होता है.

भौतिक जीवन के अस्तित्व की सीमाओं के पार निकल जाना ही ब्रह्मांड विलय साधना का आधार था. ये सीमायें पंचतत्वों की उर्जाओं के नियंत्रण में होती हैं. इन्हीं सीमाओं में रहकर ही जीवन सम्भव होता है. अन्यथा एक पल भी शरीर काम नही कर सकता.

मगर यहां हम बात कर रहे हैं, जीवन संरक्षक सीमाओं को लांघ जाने की. मकसद है ब्रह्मांड से अपने सवालों के जवाब हासिल करना. तरीका है खुद को ब्रह्मांड में विलीन करके उसके भीतर की बातें जान लेना.

गुरुवर ने मुझे तंत्रिका तंत्र का एक चार्ट दिया. जिससे मिलता जुलता चार्ट मै यहां पोस्ट कर रहा हूं.

चार्ट को देखकर मेरे मुंह से निकला था, गुरुदेव मुझे साधना करनी है या मेडिकल की पढ़ाई.

दोनों. गुरुवर ने संक्षिप्त सा जवाब दिया.

मगर क्यों.

क्योंकि तुम एक उर्जा उपचारक हो. उर्जा उपचारक को शरीर और मन के काम करने के तौर तरीकों की अधिक से अधिक जानकारी होनी चाहिये. तभी मनचाहे नतीजे निकाल सकते हो.

क्या एेसा पहले भी था. मेरे सवाल का तात्पर्य दूसरे युगों से था.

हां. ऋग वेद, त्रिस्ता उपनिषद, गरुण पुराण, योग विज्ञान, आयुर्वेद शास्त्र, प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के ग्रंथों सहित तमाम पौराणिक विधाओं में इसकी व्यापक जानकारी है. जो बातें आज मेडिकल साइंस आपरेशन के तौर तरीकों से जान पाया है. उनसे भी कहीं अधिक वैज्ञानिक जानकारी पौराणिक शास्त्रों में मौजूद है. बस तब की और अब की शब्दावली में फर्क है. जिन्हें आज हम ऋषि कहते हैं, वे रिसर्चर होते थे. आज के वैज्ञानिकों की तरह उनका काम अनुसंधान करना ही था. उन्होंने मानव शरीर के बारे में जितना जाना, मेडिकल साइंस अब तक उसका 17 प्रतिशत तक ही जान पाया है. क्योंकि ऋषियों की रिसर्च लाखों सालों की थी. जबकि मेडिकल साइंस की रिसर्च कुछ सौ सालों की ही है. मगर इसमें कोई शक नही कि एक समय मेडिकल साइंस शरीर के अधिकांश रहस्यों को जान लेगा. तब मशीनी इंशान बनने लगेंगे. यानी एेसे इंशान जिनके भीतर मशीनें, पुर्जे लगे होंगे.

वे बहुत ही शक्तिशाली और क्षमतावान होंगे. हो सकता है उनकी किसी गलती के कारण ही भगवान को कलियुग का अवतार लेना पड़े। वो समय बहुत बुरा होगा. क्योंकि उस लड़ाई में इंशानों की रक्षा के लिये विज्ञान के अधिकांश निर्माण और उसकी तकनीक को नष्ट कर दिया जाएगा. जिससे इंशान के सुख तो बने रहेंगे, मगर सुविधायें नष्ट हो जाएंगी.

गुरुदेव ने तंत्रिका तंत्र का जो चार्ट दिया, वह मेरी साधना का रूट चार्ट था. उसके साथ तंत्रिकाओं के परिचय वाला एक चार्ट और दिया. उन्हें अच्छी तरह से याद कर लेना था. साधना के दौरान मुझे इन्हीं सूक्ष्म तंत्रिकाओं में प्रवेश करना था. बिना रास्ता भटके मुझे इस सफर को हर मिनट में पूरा करना था.

हमारे शरीर में खून के प्रवाह की जो नाड़ियां यानी नसें, धमनियां आदि हैं, उन सबको एक के बाद एक जोड़ दिया जाये तो, उनकी कुल लम्बाई 96460 किलोमीटर से भी अधिक होती है. यानि अगर इन नसों के भीतर घुसकर कोई सफर करना पड़े, तो एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाने में 96 हजार किलोमीटर से भी अधिक दूरी तय करनी पड़ेगी.

बताता चलूं कि पृथ्वी के एक सिरे से दूसरे सिरे की लम्बाई तकरीबन 40075 कि.मी. है। यानी एक व्यक्ति की सभी नसों को जोड़कर धरती के सिरों पर लपेटा जाये तो 2 चक्कर लग जाएंगे.

इसी तरह उर्जा की नाड़ियों की लम्बाई भी इतनी ही होती है. क्योंकि वे नसों के समतुल्य चलती हैं. या यूं कहें कि नसें उर्जा नाड़ियों के समतुलय चलती हैं तो ज्यादा सही होगा।

गुरुदेव ने बताया कि साधना के दौरान मुझे इन्हीं उर्जा नाड़ियों और नसों की अलग अलग यात्रा करनी है. वह भी पंचतत्वों की उर्जाओं द्वारा संचालित तंत्रिका तंत्र की कार्य प्रणाली से दो गुना तेज रफ्तार में.

तुम सोच रहे होगे इससे क्या होगा. गुरुवर मेरे मन में उठे प्रश्न को जान गये थे.

जवाब में बताया तंत्रिका तंत्र ही पंचतत्वों की व्यवस्था का सबसे तेज सिस्टम है. जब तुम इसमें घुस कर इससे दो गुनी अधिक रफ्तार से घूम रहे होगे. तब इसकी सीमायें तुम्हारी गति से पीछे छूट जाएंगी. एेसे में तुम अनंत ब्रह्मांड के अवयेव हो जाओगे. ठीक उसी तरह जैसे पानी की बूंद समुद्र में मिलकर समुद्र बन जाती है. और तब उसे समुद्र के भीतर की सारी बातें मालुम होती हैं. उसी तरह ब्रह्मांड से मिलकर तुम ब्रह्मांड हो जाओगे. और तब तुम्हें ब्रह्मांड के भीतर की सारी बातें मालुम होंगी.

ये सुनकर मन रोमांच से भर उठा था.

मगर सच कहूं तो मै उलझन में भी था. एक सवाल यक्ष प्रश्न की तरह परेशान कर रहा था. क्या ये सम्भव होगा. होगा तो कैसे.

गुरुदेव दोबारा मेरे मनोभावों को जान गये थे. उन्होंने कहा बहुत आसान है. बस तुम इन चार्ट को ठीक से याद कर लो. फिर मै तुम्हे बताउंगा कि करना कैसे है.

मै चार्ट को याद करने में जुट गया. व्रत और मौन व्रत के बीच 9 दिन लगे मुझे उन्हें याद करने में.

अब मै दोनों चार्ट बिना देखे कागज पर बना सकता था. दरअसल कागज पर बना-बनाकर ही मैने उन्हें याद किया था.

आप भी दिये गये चार्ट को याद करने की कोशिश करिये.

किसी मंत्र का जाप किये बिना, तंत्रिका तंत्र के भीतर की यात्रा की तकनीक मै आगे बताउंगा.

तब तक की राम राम.

….. क्रमशः।

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