साधना की दुनिया में पहला कदम- 4

प्रणाम मै शिवांशु,

साधना करने के लिये हम कार से केदारनाथ जा रहे थे। लखनऊ से चलकर हम हरिद्वार पहुँच गए. थका होने के कारण मै सो गया. गुरुदेव मुझे सोता छोड़कर कहीं चले गए. मै उठा तो कागज की चिट मिली. कागज पर लिखा था मै कल लौटुंगा. लिखावट गुरुदेव की थी.

अब आगे……

गुरुवर अगले दिन दोपहर 3 बजे के बाद लौटे।

उनके साथ साधु वेषधारी एक व्यक्ति भी थे। उम्र तकरीबन 26 साल। बाल छोटे थे। हल्का गुलाबी कुर्ता धोती पहने थे। गले में मोतियों की माला थी। हाथ में रुद्राक्ष और वैजंती की मलायें थीं। माथे पर हल्का पीला तिलक था। चेहरे पर प्रभावित करने वाला तेज भी था। बांयी कलाई पर रोलेक्स की घड़ी थी। उसमें डायमंड की जड़ावट नजर आ रही थी। जिसे देखकर मै समझ गया कि या तो वे खुद किसी अमीर परिवार से हैं, या उनके फालोवर अमीर हैं।

उनके दायें पैर पर चोट थी। जिसके कारण थोड़ा लगड़ाकर चल रहे थे।

गुरुवर अपने साथ फर्स्ट+एड का सामान लाये थे। जिसे मुझे पकड़ाकर बोले प्रभात की पट्टी बदल दो। इन पर भालू ने हमला किया है।

उनका नाम प्रभात था। मैने पैर की पुरानी पट्टी हटाकर नई ड्रेसिंग कर दी। इसी बीच प्रभात जी से पता चला कि वे साफ्टवेयर इंजीनियर थे। चार साल पहले उनका प्रेमिका से ब्रेक अप हो गया। वे खुद को संभाल न सके। विचलित होकर घर छोड़ आये। यात्रायें करने लगे। अमीर परिवार से थे। सो उनका ए.टी.एम. अभी भी उनके खर्चे चलाता था। रोलेक्स की घड़ी उनकी प्रेमिका ने गिफ्ट की थी। उसे अभी भी खुद से अलग न कर पाये थे।

दो साल लगे उन्हें ब्रेक अप के दर्द से उबरने में। उसी बीच रामेश्वरम् में उन्हें एक सन्यासी मिले। उन्होंने प्रभात जी को साधनायें सिखायीं। साधनाओं में उनका मन एेसा लगा कि अब घर नही जाना चाहते थे। वे परिवार की अकेली संतान थे। सो उनके सन्यास वास से घर के लोग बहुत चिंतित व दुखी थे।

प्रभात जी ने डेढ़ साल पहले घर के लोगों से कह दिया था कि अब वे कभी भी घर नही लौटेंगे। साल भर पहले उन्होंने वो सिम फेंक दिया था जिसका नम्बर घर के लोगों के पास था। क्योंकि घर वाले उन पर वापस लौटने का दबाव डालते थे। अब घर वालों को नहीं पता था कि वे कहां और कैसे हैं। घर के लोग उनके एकाउंट में हमेशा कुछ लाख रुपये जमा करके रखते थे। ताकि उन्हें पैसे के कारण कोई तकलीफ न हो।

इन दिनों वे हरिद्वार में रहकर साधनायें कर रहे थे। साधना करने के लिये उपयुक्त स्थान की तलाश में कल एक पहाड़ी पर चढ़ते चले गये। चढ़ते चढ़ते पहाड़ी जंगल में पहुंच गये। वहीं शाम को एक भालू ने उन पर हमला कर दिया।

इत्तिफाक से गुरुदेव भी अपने एक साधक मित्र के साथ उसी तरफ गये थे। दोनों लोगों ने किसी तरह से प्रभात जी को भालू से बचाया। फिर भी उनके पैर में गहरी चोट आ गयी। गुरुवर इलाज के लिये उन्हें डा. के पास ले गये।

आज अपने साथ होटल ले आये।

गुरुदेव ने प्रभात जी को समझाया कि जीवन का उद्देश्य साधनायें करना नही होता। बल्कि जिम्मेदारियां निभाना होता है। जिम्मेदारियां ठीक से निभा लें इसके लिये अपनी क्षमताओं को जगाने के लिये कई बार साधनाओं की जरुरत पड़ती है। साधनाओं के लिये घर छोड़ना जरूरी नही। जो भी साधनायें करना चाहते हैं, वे घरेलु जीवन के साथ भी कर सकते हैं। इसलिये आप अपने घर वापस चले जाओ।

प्रभात जी ने गुरुवर से वादा लिया कि वे साधनाओं में उनका मार्गदर्शन करेंगे। गुुरुदेव के वादा करने पर वे अपने घर वापस लौटने को तैयार हो गये। ये खबर जब मैने फोन पर प्रभात जी के घर वालों को सुनाई। तो आप कल्पना भी नही कर सकते वहां क्या हुआ होगा। फोन प्रभात की बूढ़ी दादी ने पिक किया था। मेरी बात सुनकर विलख विलख कर रो पड़ीं। उनसे जब घर के दूसरे लोगों ने सुना तो खुशी का कोहराम सा मच गया। मै फोन पर सिर्फ लोगों के रोने सिसकने की आवाजें ही सुन पा रहा था। जैसे वे लोग भूल गये कि मै इंतजार कर रहा हूं।

कुछ मिनट लगे उन्हें सम्भलने में। फिर प्रभात जी के पिता जी की आवाज सुनाई दी। वे भी लगातार रोये जा रहे थे। बड़ी मुश्किल से बोल पाये। उनकी आवाज थरथरा रही थी। जैसे इस पल पर वे यकीन ही न कर पा रहे हों। बस इतना ही कहा आप कहां से बोल रहे हैं, वहां हम अभी आना चाहते हैं। मैने उन्हें एस.एम.एस. पर अपनी लोकेशन दे दी।

वे लोग प्राइवेट चार्टर प्लेन से उसी रात आ गये।

मगर तब तक हम होटल छोड़ चुके थे। प्रभात जी ने गुरुवर को अपने गुरु के रूप में मान लिया था। इसलिये उनकी हर बात मान रहे थे। इसी भरोसे पर गुरुदेव ने उन्हें होटल में अपने घर के लोगों का इंतजार करने के लिये छोड़ दिया।

आगे के सफर पर रवाना होते वक्त मैने गुरुदेव से पूछा प्रभात जी के घर वालों से क्यों नही मिले आप। मिलते तो उन्हें और ज्यादा खुशी होती। फोन पर खुशी के मारे बेचारे कैसे बिलख बिलख कर रो रहे थे।  

हमारा सफर लम्बा है, हम किसी का इंतजार नही कर सकते। गुरुदेव का जवाब दोअर्थी था।

हम चल पड़े।

जब हम ऋषीकेश पार कर रहे थे तभी मेरे मोबाइल पर प्रभात जी के पिता का फोन आया। वे होटल पहुंच चुके थे। प्रभात जी ने उन्हें गुरुवर के बारे में बता दिया था। सो उन्होंने गुरुवर से बात कराने की विनती की।

मगर गुरुदेव ने कहा उनको बोलो अभी प्रभात पर ध्यान दें। मै उनसे कभी बाद में बात कर लूंगा।

ऋषीकेश पार करते ही पहाड़ी रास्ते शुरू हो गये। घुमावदार पहाड़ी रास्ते मेरे लिये नये व खतरनाक थे। रात में इन पर ड्राइव करना अधिक खतरनाक हो जाता है। सो गुरुवर ने स्टेयरिंग सम्भाल ली। वे पहले भी एेसी यात्रायें कर चुकेे थे।

कुछ जगह सुरक्षा के नजरिये से पुलिस के बैरियर मिले।

दरअसल शाम ढलते ही जंगली जानवर पहाड़ी जंगलों से निकलकर रास्तों पर आने लगते हैं। जिनमें हाथियों के झुंड और भालू बड़े खतरनाक होते हैं। हाथियों के झुंड वाहनों की लाइट देखकर भड़क जाते हैं। एेसे में वहां से गुजरने वाले वाहनों को रौदते चले जाते हैं। जबकि भालू इंशानों पर सीधे हमले कर देते हैं। कई जगह पहाड़ी जंगलों के शेर चीते भी निकलकर सड़क पर आते हैं। उनके द्वारा भी राहगीरों पर हमले किये जाने का खतरा रहता है। इसी कारण रात में सुरक्षा कर्मी जगह जगह बैरियर लगा देते हैं। रास्ते के खतरों से बचाने के लिये मुसाफिरों को रोकर दिन में ही चलने के लिये कहते हैं।

मगर हम नही रुके।

इसके लिये वहां गुरुवर ने मुझे अपना प्रेस कार्ड यूज करने की छूट दे दी। जिसके कारण पुलिस से हमें आगे बढ़ते रहने की इजाजत मिलती रही।  

…. क्रमशः

सत्यम् शिवम् सुंदरम्

शिव गुरु को प्रणाम

गुरुवर को नमन.

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